वकालत से पुलिस सेवा तक का चुनौतीपूर्ण सफर
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में तैनात यातायात प्रभारी बृहस्पति कुमार साकेत की सफलता की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है। एक समय था जब उनका लक्ष्य देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में एक सफल वकील बनना था। उन्होंने दिल्ली से एलएलएम की पढ़ाई पूरी की और वहां वकालत की प्रैक्टिस भी की। हालांकि, नियति को कुछ और ही मंजूर था। पिता के असमय निधन के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते उन्हें वर्ष 2012 में अनुकंपा नियुक्ति के तहत मध्य प्रदेश पुलिस में सूबेदार के पद पर ज्वाइन करना पड़ा। आज वे न केवल अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रहे हैं, बल्कि अपनी मेहनत और नवाचारों से छतरपुर की यातायात व्यवस्था की तस्वीर भी बदल रहे हैं।
पिता का सपना और यूपीएससी की तैयारी
बृहस्पति कुमार मूल रूप से रीवा के रहने वाले हैं, लेकिन उनकी शिक्षा-दीक्षा भोपाल और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में हुई। उनके पिता खुद मध्य प्रदेश पुलिस में आईपीएस अधिकारी थे, जिनकी इच्छा थी कि उनका बेटा भी सिविल सेवा में जाकर देश की सेवा करे। पिता के आग्रह पर उन्होंने वकालत की प्रैक्टिस को विराम दिया और दिल्ली के मुखर्जी नगर में रहकर यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के लिए कड़ी मेहनत शुरू की। वे वर्ष 2011 में इंटरव्यू के चरण तक भी पहुंचे, लेकिन अंतिम चयन में कुछ अंकों से चूक गए। इसके बाद उन्होंने फिर से तैयारी शुरू की, लेकिन इसी दौरान उनके पिता का देहांत हो गया, जिससे उनके करियर की दिशा पूरी तरह बदल गई।
पुलिस की नौकरी में शुरुआती संघर्ष
जब वे सूबेदार के रूप में पुलिस विभाग में आए, तो उन्हें यह नौकरी अपने अनुकूल नहीं लगी। वकालत और अकादमिक पृष्ठभूमि होने के कारण उन्हें लगता था कि वे इस तंत्र में सामंजस्य कैसे बिठाएंगे। इस कठिन दौर में उनकी माताजी ने उन्हें संबल दिया। उन्होंने बृहस्पति को समझाया कि पुलिस विभाग में रहकर भी वे सम्मानजनक काम कर सकते हैं। एक और बड़ी चुनौती भाषा की थी। उनकी पूरी पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम में हुई थी, जिसके कारण उन्हें हिंदी लिखने और बोलने में काफी कठिनाई होती थी। पुलिस की नौकरी में आधिकारिक कामकाज मुख्य रूप से हिंदी में होता है, जो उनके लिए एक बड़ी बाधा थी।
हिंदी भाषा और काम करने का नया तरीका
अपनी इस कमी को दूर करने के लिए बृहस्पति साकेत ने एक अनुशासित तरीका अपनाया। उन्होंने अपने गुरु यानी रक्षित निरीक्षक से सलाह ली। उन्होंने तय किया कि वे हर दिन अपने ड्यूटी के बाद दो घंटे पुलिस विभाग के कामकाज की डायरी (ऑर्डरली बुक) में हिंदी में लिखेंगे। यह सिलसिला करीब 12 महीने तक चला। इस मेहनत का परिणाम यह हुआ कि न केवल उन्होंने हिंदी में महारत हासिल कर ली, बल्कि पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली को भी गहराई से समझ लिया।
यातायात सुधार के लिए किए नवाचार
बृहस्पति साकेत की पहली पोस्टिंग होशंगाबाद में हुई, जहां उन्होंने सबसे पहले रोड इन्फ्रास्ट्रक्चर और अतिक्रमण हटाने पर जोर दिया। वर्ष 2014 में उन्होंने होशंगाबाद के चौराहों पर पहली बार माइक सिस्टम लगवाए थे। इसके बाद रायसेन, अनूपपुर और निवाड़ी जैसे जिलों में उन्होंने अपनी सेवाएं दीं। उन्होंने अनूपपुर में पहली बार ट्रैफिक वार्डन सिस्टम की शुरुआत की और युवाओं को यातायात प्रबंधन से जोड़ा।
फरवरी 2024 से वे छतरपुर में यातायात प्रभारी के रूप में तैनात हैं। यहां उन्होंने यातायात को सुगम बनाने के लिए कई प्रभावी कदम उठाए हैं:
- ट्रैफिक पार्क की स्थापना: यातायात नियमों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए उन्होंने ट्रैफिक पार्क का निर्माण किया।
- हेलमेट बैंक: हेलमेट के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए हेलमेट बैंक की अनूठी पहल शुरू की।
- सुरक्षा ऑडिट: सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए रेड और ब्लैक स्पॉट्स की पहचान की गई है, जिससे हादसों की संख्या में भारी कमी आई है।
- कठोर कार्रवाई: नियमों का उल्लंघन करने वाले और मॉडिफाइड साइलेंसर वाले बाइक सवारों के खिलाफ सख्त अभियान चलाया जा रहा है।
सकारात्मक परिणाम और भविष्य
बृहस्पति साकेत के प्रयासों का ही नतीजा है कि छतरपुर के यातायात थाना को आईएसओ सर्टिफिकेट भी मिला है। उनके जागरूकता अभियानों और सड़क सुरक्षा नवाचारों के कारण जिले में सड़क हादसों और उनमें होने वाली मौतों की दर में 30 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई है। सूबेदार से लेकर रक्षित निरीक्षक तक का यह सफर उनके धैर्य और चुनौतियों को स्वीकार करने की क्षमता को दर्शाता है। वे आज न केवल एक पुलिस अधिकारी हैं, बल्कि छतरपुर के लोगों के लिए एक ऐसे उदाहरण हैं जिन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपनी काबिलियत को साबित किया है।
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