बिना बिजली के भी कैसे ठंडे रहते थे पुराने जमाने के घर? जानिए वह खास तकनीक जो आज भी कारगर है

छतरपुर जिले के हंसारी गांव में बने पारंपरिक घर अपनी विशेष बनावट के चलते भीषण गर्मी में भी ठंडे रहते हैं, जहां कूलर या पंखे की जरूरत नहीं पड़ती। मोटी मिट्टी की दीवारें और लकड़ी की संरचना अंदर का तापमान संतुलित बनाए रखती है।

आज के दौर में जहां गर्मी से राहत पाने के लिए लोग कूलर और एयर कंडीशनर पर निर्भर हैं, वहीं छतरपुर जिले में आज भी कुछ ऐसे पारंपरिक घर मौजूद हैं, जो भीषण गर्मी के बीच भी अंदर से ठंडे बने रहते हैं। इन घरों में रहने वाले लोगों को पंखे या कूलर की जरूरत तक महसूस नहीं होती। जिले के लवकुशनगर जनपद के हंसारी गांव में बने ये पुराने घर अपनी अनोखी बनावट के कारण हर मौसम के अनुकूल साबित होते हैं।

दादा-परदादा के जमाने का घर आज भी देता है राहत

गांव के निवासी लखन द्विवेदी बताते हैं कि उनके बाबा के समय में बना घर आज भी गर्मियों में ठंडक और सर्दियों में गर्माहट देता है। उनके मुताबिक पहले गांवों में दोहरे खंड वाले घर बनाने का चलन था, जिन्हें बुंदेलखंड की तीखी गर्मी को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता था।

मोटी दीवारें और लकड़ी की संरचना है खास वजह

इन घरों की मोटी मिट्टी से बनी दीवारें और लकड़ी की संरचना अंदर के तापमान को संतुलित बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। यही वजह है कि बाहर चाहे जितनी गर्मी हो, घर के भीतर का माहौल सुहावना बना रहता है।

धूप को रोकने के लिहाज से होती थी बनावट

इन घरों को इस तरह डिजाइन किया जाता था कि सूरज की रोशनी सीधे अंदर तक न पहुंच सके। इसी सोच-समझकर की गई बनावट के चलते घरों में प्राकृतिक रूप से ठंडक बनी रहती थी और बिजली से चलने वाले किसी उपकरण की आवश्यकता नहीं पड़ती थी।

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