निवेश के पारंपरिक विकल्प फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और डेट म्यूचुअल फंड (Debt Fund) में से किसे चुनें, यह सवाल कई निवेशकों को उलझन में डालता है। टैक्स एक्सपर्ट गौरी चड्ढा ने एक चर्चित टैक्स शो में लक्ष्मण रॉय के साथ बातचीत में इन दोनों विकल्पों की तुलना विस्तार से समझाई और बताया कि टैक्स के नजरिए से दोनों में बड़ा फर्क है।
एफडी और डेट फंड में टैक्स का अलग गणित
चड्ढा के मुताबिक, फिक्स्ड डिपॉजिट और डेट म्यूचुअल फंड पर टैक्स लगने का तरीका एक जैसा नहीं होता। एफडी में हर साल मिलने वाले ब्याज पर उसी साल टैक्स चुकाना पड़ता है। इसका असर कंपाउंडिंग पर पड़ता है, क्योंकि टैक्स कटने के बाद बची हुई रकम पर ही आगे का रिटर्न जुड़ता है।
दूसरी ओर, डेट फंड में स्थिति अलग रहती है। इसमें निवेश पर टैक्स तभी लगता है जब निवेशक अपना पैसा निकालता है। यानी निकासी तक पूरी रकम पर रिटर्न बढ़ता रहता है, जिससे लंबी अवधि में कंपाउंडिंग का लाभ ज्यादा मिल पाता है।
एक उदाहरण से समझें फर्क
अपनी बात को आसान बनाने के लिए चड्ढा ने एक उदाहरण भी रखा। उन्होंने बताया कि अगर 7% रिटर्न पर 10 लाख रुपये का निवेश किया जाए, तो 10 साल में यह रकम एफडी में लगभग 16.13 लाख रुपये तक पहुंच सकती है। वहीं, इतनी ही अवधि और रिटर्न पर डेट फंड में यह रकम करीब 16.77 लाख रुपये हो सकती है।
इस अंतर की मुख्य वजह टैक्स लगने का समय है। एफडी में हर साल टैक्स कटने से कंपाउंडिंग का दायरा घटता है, जबकि डेट फंड में निकासी तक टैक्स टलने से रकम पर रिटर्न का असर बना रहता है।
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