बिना वसीयत किए मौत होने पर किसे मिलती है संपत्ति? जानिए पत्नी, बच्चों और नॉमिनी के अधिकारों का पूरा कानूनी नियम

यदि किसी व्यक्ति की बिना वसीयत बनाए मृत्यु हो जाए, तो उसकी संपत्ति पर किसका अधिकार होगा? कानून विशेषज्ञ से जानिए नॉमिनी और कानूनी वारिस के बीच का अंतर और संपत्ति बंटवारे के नियम।

पारिवारिक संपत्ति और उसके उत्तराधिकार को लेकर अक्सर आम लोगों के मन में कई तरह के भ्रम और सवाल बने रहते हैं। सबसे बड़ा संशय इस बात को लेकर होता है कि नॉमिनी और कानूनी वारिस में क्या अंतर होता है? क्या किसी बैंक खाते या संपत्ति में नॉमिनी होने मात्र से वह व्यक्ति उसका पूर्ण मालिक बन जाता है? यदि किसी व्यक्ति की अचानक मृत्यु हो जाए और उसने अपने जीवनकाल में कोई वसीयत न लिखी हो, तो उसकी संपत्ति का बंटवारा किस प्रकार होगा? इसके अलावा, यदि किसी डीमैट खाते या बैंक खाते में कोई नॉमिनी दर्ज नहीं है, तो उस पैसे पर किसका अधिकार होगा?

इन तमाम जटिल और महत्वपूर्ण कानूनी सवालों को समझने के लिए फरीदाबाद के सेक्टर-12 न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता दीपु सिंह रावत से विस्तृत बातचीत की गई। आपको बता दें कि अधिवक्ता दीपु सिंह रावत डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन फरीदाबाद के पूर्व वाइस प्रेसिडेंट रह चुके हैं और वर्ष 2010 से लगातार वकालत के पेशे में सक्रिय हैं। उन्होंने संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े इन उलझे हुए कानूनी नियमों को बेहद सरल और व्यावहारिक भाषा में समझाया है, जिसे हर नागरिक को जानना बेहद जरूरी है।

नॉमिनी और कानूनी वारिस: दोनों में क्या है बुनियादी अंतर?

अधिवक्ता दीपु सिंह रावत के अनुसार, आम तौर पर लोग नॉमिनी और कानूनी वारिस को एक ही समझ लेते हैं, जबकि कानून की नजर में इन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर होता है। इन दोनों के मुख्य अंतर को इस प्रकार समझा जा सकता है:

  • नॉमिनी (Nominee): यह वह व्यक्ति होता है, जिसे कोई खाताधारक या संपत्ति का मालिक अपने जीवनकाल में अपनी संपत्ति या खाते की देखरेख के लिए नामांकित करता है। कोई भी व्यक्ति अपनी मर्जी से किसी को भी अपना नॉमिनी बना सकता है। नॉमिनी आपका कोई पड़ोसी हो सकता है, कोई करीबी रिश्तेदार हो सकता है, कोई मित्र हो सकता है या फिर कोई ऐसा अन्य व्यक्ति भी हो सकता है जिसके प्रति आपका विशेष लगाव हो। नॉमिनी केवल एक ट्रस्टी या संरक्षक की तरह होता है, जिसे संपत्ति को संभालकर असली वारिसों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी मिलती है।
  • कानूनी वारिस (Legal Heir): इसका निर्धारण किसी व्यक्ति की इच्छा से नहीं, बल्कि देश में लागू संबंधित कानूनों के अनुसार होता है। उदाहरण के तौर पर, हिंदू परिवारों में उत्तराधिकार से जुड़े सभी मामलों का फैसला हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (हिंदू सक्सेशन एक्ट) के तहत किया जाता है। इसी तरह, देश के अन्य धर्मों के नागरिकों के लिए उनके संबंधित पर्सनल लॉ के अनुसार कानूनी वारिस का निर्धारण होता है। संपत्ति का असली मालिकाना हक कानूनी वारिसों का ही होता है।

संपत्ति की प्रकृति से तय होते हैं अधिकार

अधिवक्ता दीपु सिंह रावत बताते हैं कि किसी भी संपत्ति पर किसका कितना अधिकार होगा, यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि संपत्ति का मालिक अपनी संपत्ति के हस्तांतरण के लिए किस प्रकार का दस्तावेज तैयार करता है। कोई भी व्यक्ति अपने जीवनकाल में अपनी स्व-अर्जित संपत्ति के संबंध में किसी भी व्यक्ति के पक्ष में कानूनी व्यवस्था कर सकता है। हालांकि, जब बात पैतृक संपत्ति की आती है, तो नियम बदल जाते हैं।

पूर्वजों से चली आ रही वैसी संपत्ति, जिसे आम बोलचाल की भाषा में दादा-लाई या पैतृक संपत्ति कहा जाता है, उसके मामले में कानून काफी अलग है। पैतृक संपत्ति में परिवार के अन्य सदस्यों के अधिकार भी जन्म से ही जुड़े हो सकते हैं। इसलिए ऐसी संपत्ति को लेकर विशेष कानूनी नियम लागू होते हैं और कोई भी व्यक्ति अपनी मर्जी से पूरी पैतृक संपत्ति को किसी एक व्यक्ति के नाम नहीं कर सकता।

बिना वसीयत के मृत्यु होने पर कैसे तय होता है संपत्ति का अधिकार?

यदि कोई व्यक्ति अपने जीवनकाल में कोई वसीयत (वसीयतनामा) किए बिना ही इस दुनिया से चला जाता है, तो कानून की भाषा में इस स्थिति को इंटेस्टेट कहा जाता है। अधिवक्ता दीपु सिंह रावत के अनुसार, ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने पर मृतक की संपत्ति और उसके वित्तीय अधिकारों का निर्धारण संबंधित उत्तराधिकार कानून के तहत किया जाता है।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में इस संबंध में बेहद स्पष्ट और विस्तृत प्रावधान दिए गए हैं। इस कानून के अंतर्गत उत्तराधिकार तय करने के लिए कई तरह के कानूनी श्रेणियों का उपयोग किया जाता है, जिनमें शामिल हैं:

  • इंटेस्टेट: बिना वसीयत बनाए मृत्यु होने की कानूनी स्थिति।
  • एग्नेट और कॉग्नेट: उत्तराधिकार तय करने के लिए रक्त संबंधों की विभिन्न श्रेणियां।
  • हाफ-ब्लड और फुल-ब्लड: सौतेले और सगे पारिवारिक संबंधों के आधार पर अधिकारों का वर्गीकरण।

यदि किसी बैंक खाते या डीमैट खाते में कोई नॉमिनी दर्ज नहीं है, तो उस खाते में जमा राशि पर अधिकार पाने के लिए उत्तराधिकारियों को एक तय कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है और उत्तराधिकार कानून के अनुसार ही अंतिम फैसला होता है।

पत्नी और दो बच्चों के बीच संपत्ति का बंटवारा: एक व्यावहारिक उदाहरण

इस पूरी प्रक्रिया को और अधिक स्पष्ट करने के लिए अधिवक्ता दीपु सिंह रावत ने एक व्यावहारिक उदाहरण साझा किया। मान लीजिए कि किसी परिवार में एक व्यक्ति है, जिसके परिवार में उसकी पत्नी और दो बच्चे शामिल हैं। यदि उस व्यक्ति की बिना कोई वसीयत लिखे अचानक मृत्यु हो जाती है, तो सामान्य कानूनी नियमों के अनुसार उसकी संपत्ति को कुल तीन बराबर हिस्सों में विभाजित किया जाएगा।

इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि मृतक की पत्नी और उसके दोनों बच्चों को संपत्ति में एक-एक तिहाई (1/3) हिस्सा प्राप्त होगा। हालांकि, अधिवक्ता रावत ने यह भी साफ किया कि यह एक सामान्य उदाहरण मात्र है जो आम लोगों को समझाने के लिए दिया गया है। वास्तविक मामलों में संपत्ति का बंटवारा संपत्ति की प्रकृति, उसके अर्जन के तरीके और उस समय की विशिष्ट परिस्थितियों एवं संबंधित कानूनों के आधार पर ही तय किया जाता है।

पति की संपत्ति में पत्नी और बच्चों का अधिकार कब बनता है?

पति की संपत्ति में पत्नी और बच्चों के अधिकारों को लेकर भी कई भ्रांतियां हैं। अधिवक्ता दीपु सिंह रावत स्पष्ट करते हैं कि पति की संपत्ति पर परिवार के दावों को समझने के लिए सबसे पहले यह देखना जरूरी है कि वह संपत्ति किस श्रेणी की है और उसे पति ने किस प्रकार प्राप्त किया था।

उदाहरण के लिए, यदि कोई संपत्ति दादा की है और वह विरासत के रूप में उनके बेटे यानी अगली पीढ़ी को हस्तांतरित होती है, तो वहां उत्तराधिकार के नियमों के तहत ही हिस्सेदारी तय होगी। इसके बाद, जब उस व्यक्ति की मृत्यु होती है, तभी उसके बच्चों और पत्नी के अधिकार उत्तराधिकार कानून के तहत सृजित होते हैं। इसलिए, पति की संपत्ति में पत्नी और बच्चों का अधिकार हर परिस्थिति में एक जैसा नहीं माना जा सकता। संपत्ति का कानूनी स्वरूप और उस पर लागू होने वाला विशिष्ट कानून ही यह तय करता है कि किसे कितना अधिकार मिलेगा।

वसीयत और नॉमिनेशन में विवाद हो तो किसे मिलती है प्राथमिकता?

वसीयत और नॉमिनेशन के बीच के अंतर और उनके बीच होने वाले विवादों पर भी अधिवक्ता दीपु सिंह रावत ने महत्वपूर्ण जानकारी दी। उनका कहना है कि यदि किसी व्यक्ति ने अपने जीवनकाल में अपनी संपत्ति के संबंध में एक वैध वसीयत तैयार की है, तो कानूनी तौर पर वसीयत के प्रावधानों को ही सर्वोपरि महत्व दिया जाता है।

वसीयत को कभी भी नॉमिनेशन के बराबर नहीं आंका जाना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति ने वसीयत या किसी अन्य वैध कानूनी दस्तावेज के माध्यम से अपनी संपत्ति के बंटवारे की कोई व्यवस्था सुनिश्चित की है, तो न्यायालय उसी के आधार पर अधिकारों का निर्धारण करता है। ऐसे मामलों में उस वसीयतनामा दस्तावेज की कानूनी वैधता और संबंधित उत्तराधिकार कानूनों के प्रावधानों की सूक्ष्मता से जांच की जाती है। अंततः, कानूनन वसीयत के प्रावधान ही नॉमिनेशन पर भारी पड़ते हैं, क्योंकि नॉमिनी केवल संपत्ति का संरक्षक होता है, वास्तविक मालिक नहीं।

https://hindi.news18.com/news/haryana/faridabad-pati-ki-maut-ke-baad-wife-aur-children-ka-property-mein-kitna-haq-demat-account-mein-nominee-nahi-to-paise-kiska-hoga-local18-10882346.html