सीखने की कोई उम्र नहीं होती
उम्र सिर्फ एक संख्या है और यदि व्यक्ति के मन में कुछ नया सीखने की दृढ़ इच्छाशक्ति हो, तो कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। इस बात को एक बार फिर से सच साबित कर दिखाया है 78 साल के त्वरकवि चंगल प्रसाद ने। इसरो (ISRO) के सिविल कंस्ट्रक्शन विंग से सेवानिवृत्त हुए प्रसाद ने तेलंगाना इंजीनियरिंग कॉमन एंट्रेंस टेस्ट (TG ECET) में तीसरी रैंक हासिल करके पूरे देश को चौंका दिया है। आमतौर पर 78 साल की आयु में लोग अपने जीवन के आरामदायक पड़ाव पर होते हैं, लेकिन प्रसाद ने इस उम्र में न केवल परीक्षा दी बल्कि उसमें शानदार सफलता भी दर्ज की। उनकी यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि ज्ञान अर्जित करने की ललक किसी उम्र की मोहताज नहीं होती।
इसरो के साथ जुड़ा शानदार सफर
त्वरकवि चंगल प्रसाद का जीवन भारत के अंतरिक्ष विज्ञान के स्वर्णिम इतिहास का हिस्सा रहा है। उन्होंने महज 21 साल की उम्र में सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा पूरा करने के बाद इसरो में कदम रखा था। वे इसरो के संस्थापक सदस्यों में से एक माने जाते हैं। अपने 35 साल के लंबे करियर में उन्होंने संगठन के साथ कई ऐतिहासिक क्षण साझा किए। चाहे श्रीहरिकोटा में रॉकेट लॉन्च के दौरान लंबी शिफ्ट में काम करना हो या फिर देश के पहले लॉन्च पैड्स, तकनीकी इमारतों और वेधशालाओं के बुनियादी ढांचे को तैयार करना, प्रसाद ने अपनी मेहनत से इसरो के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
महान वैज्ञानिकों के साथ काम करने का अनुभव
प्रसाद को देश के उन महान वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में काम करने का सौभाग्य मिला, जिन्होंने भारत को अंतरिक्ष के क्षेत्र में दुनिया भर में पहचान दिलाई। उन्होंने भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई, देश के मिसाइल मैन और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और ख्याति प्राप्त स्पेस साइंटिस्ट सतीश धवन जैसे दिग्गजों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया है। इसरो से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) लेने के बाद भी उनकी ऊर्जा में कोई कमी नहीं आई। वे अपनी सेवानिवृत्ति के बाद भी लगातार सीखने और काम करने के प्रति समर्पित रहे।
कोरोना काल और उसके बाद की सक्रियता
सेवानिवृत्ति के बाद भी त्वरकवि चंगल प्रसाद घर पर खाली नहीं बैठे। उन्होंने दिल्ली, नेपाल और हैदराबाद जैसे शहरों में कई प्रमुख निर्माण कंपनियों के साथ जुड़कर काम किया। इतना ही नहीं, कोरोना महामारी के दौरान भी उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया और सक्रिय भूमिका निभाई। खाली समय का सदुपयोग करने के लिए उन्होंने न केवल नई तकनीकों का ज्ञान हासिल किया, बल्कि प्राचीन वेदों का भी गहराई से अध्ययन किया। हैदराबाद के नाचाराम इलाके में रहने वाले प्रसाद के परिवार में उनके तीन बच्चे हैं। उनकी पोती डॉ. अनन्या ने अपने दादाजी की इस सफलता पर गर्व व्यक्त करते हुए कहा कि उनके दादा हमेशा से परिवार के लिए प्रेरणा के सबसे बड़े स्रोत रहे हैं और उनका समर्पण हर किसी को नई सीख देता है।
TG ECET परीक्षा और तैयारी की रणनीति
तेलंगाना इंजीनियरिंग कॉमन एंट्रेंस टेस्ट (TG ECET) उन छात्रों के लिए आयोजित की जाती है जिन्होंने डिप्लोमा पूरा किया हो या बीएससी (मैथ्स) की डिग्री ली हो। इस परीक्षा के माध्यम से सीधे बीई या बीटेक के दूसरे वर्ष में लेटरल एंट्री मिलती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस परीक्षा में शामिल होने के लिए कोई अधिकतम आयु सीमा तय नहीं है, जिसका लाभ उठाते हुए प्रसाद ने इसमें भाग लेने का फैसला किया। परीक्षा में अपनी सफलता सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने परीक्षा से 2 महीने पहले ही अपनी कमर कस ली थी। उन्होंने रोजाना 12 घंटे से अधिक समय तक कड़ी मेहनत की और किताबों के साथ अपनी पुरानी दोस्ती को फिर से ताजा किया। उनकी अटूट लगन और अनुशासन ने यह दिखा दिया है कि यदि हौसले बुलंद हों, तो उम्र की तमाम बाधाएं भी छोटी पड़ जाती हैं।
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