वैश्विक संकट के पीछे क्या है 4F का गणित? एस. जयशंकर ने अमेरिका में समझाया होर्मुज और अर्थव्यवस्था का गहरा नाता

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिका दौरे के दौरान दुनिया के मौजूदा संकटों को 4F के जरिए परिभाषित किया है और भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर खुलकर अपनी राय रखी है।

4F संकट और वैश्विक अस्थिरता

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर इन दिनों अमेरिका के दौरे पर हैं और वहां विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उन्होंने मौजूदा वैश्विक चुनौतियों पर बेबाक टिप्पणी की है। न्यूयॉर्क में एशिया सोसायटी के एक विशेष कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने दुनिया के सामने मौजूद विकट परिस्थितियों को जटिल और एक दूसरे से जुड़ी हुई चुनौतियों का दौर बताया है। जयशंकर ने अपने संबोधन में 4F के सिद्धांत का जिक्र करते हुए कहा कि आज का समय खाद्य, ईंधन, उर्वरक और वित्त के संकट से घिरा हुआ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दुनिया में चल रहे विभिन्न संघर्षों के कारण ये चार प्रमुख संकट और भी अधिक गहरे होते जा रहे हैं।

परस्पर निर्भरता और प्रतिस्पर्धा का विरोधाभास

विदेश मंत्री ने मौजूदा विश्व व्यवस्था में एक गहरे विरोधाभास को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि एक तरफ जहां दुनिया के देशों के बीच प्रतिस्पर्धा तेजी से बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ उनकी एक-दूसरे पर निर्भरता भी उतनी ही गहरी होती जा रही है। एस. जयशंकर ने जोर देकर कहा कि आज की वैश्विक स्थितियां आपस में गहराई से जुड़ी हैं, इसलिए किसी भी बड़ी चुनौती से निपटने के लिए एकजुट और समग्र दृष्टिकोण अपनाने की बहुत आवश्यकता है। हालांकि उन्होंने ईरान और पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का सीधे तौर पर नाम नहीं लिया, लेकिन उनके द्वारा ईंधन और उर्वरक का जिक्र करना सीधे तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य और आसपास के क्षेत्र में जारी संघर्षों से प्रभावित आपूर्ति श्रृंखला की ओर स्पष्ट संकेत था। वैश्विक स्तर पर वित्तीय स्थिरता और खाद्य आपूर्ति की स्थिति भी इन्हीं जारी युद्धों से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो रही है।

भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता की जटिलताएं

व्यापार संबंधों पर चर्चा करते हुए विदेश मंत्री ने स्वीकार किया कि भारत और अमेरिका के बीच एक प्रस्तावित व्यापार समझौता संबंधों को नई गति देने में मददगार साबित होगा। उन्होंने बताया कि इस समझौते को तेजी से आगे बढ़ाने की उम्मीदें अपनी जगह हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कई जटिल वास्तविकताएं सामने आई हैं। एस. जयशंकर ने भारतीय-अमेरिकी समुदाय और नीति विशेषज्ञों के सामने यह स्पष्ट किया कि व्यापार वार्ता में अब काफी प्रगति हुई है और दोनों पक्ष एक आपसी समझ तक पहुंचने में कामयाब रहे हैं।

भारत की आर्थिक संरचना की विशिष्टता पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि हमारा देश छोटे कृषि उत्पादकों, छोटे उद्यमियों और छोटी फैक्टरियों का देश है। इसके अलावा, भारत और अमेरिका के बीच प्रति व्यक्ति आय का भारी अंतर और सामाजिक ढांचे में भिन्नता व्यापार वार्ताओं को स्वाभाविक रूप से जटिल बनाती है। ऐसे में किसी भी समझौते को अंतिम रूप देने के लिए धैर्य और विस्तृत विमर्श की आवश्यकता है।

टैरिफ और भविष्य की राह

समझौते में देरी के कारणों पर उन्होंने विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने याद दिलाया कि फरवरी में दोनों देशों ने समझौते के पहले चरण के ढांचे को अंतिम रूप देने की घोषणा की थी, लेकिन बाद में अमेरिका की टैरिफ व्यवस्था में आए बदलावों के कारण बातचीत की प्रक्रिया लंबी खिंच गई। उन्होंने विशेष रूप से सेक्शन 301 प्रक्रिया का जिक्र किया और कहा कि भारत के लिए यह देखना महत्वपूर्ण है कि इसका समझौते पर आगे क्या प्रभाव पड़ता है।

अंत में एस. जयशंकर ने उम्मीद जताई कि अगर यह समझौता पूरी तरह अमल में आता है, तो पिछले वर्ष संबंधों में आई कुछ अड़चनों को दूर करने में बड़ी सफलता मिलेगी। उन्होंने यह भी माना कि सोशल मीडिया के इस दौर में जनमत का प्रभाव बढ़ गया है और अमेरिकी घरेलू राजनीति के साथ पेशेवरों की आवाजाही जैसे मुद्दे भी द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित करते हैं। विदेश मंत्री ने दृढ़ता के साथ कहा कि दोनों देश वर्तमान मुद्दों को समझते हैं और आगे मिलकर संबंधों को एक नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

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