सोलर सिस्टम की बढ़ती लोकप्रियता
जब से केंद्र सरकार ने पीएम सूर्य घर योजना की शुरुआत की है, पूरे भारत में रूफटॉप सोलर सिस्टम लगवाने वालों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। बिजली के भारी भरकम बिलों से राहत पाने के लिए आम नागरिक अपनी जरूरत के अनुसार 1kW, 3kW या 5kW का सोलर सिस्टम इंस्टॉल करवा रहे हैं। हालांकि, इन सिस्टम्स को लगवाने से पहले एक सबसे बड़ा सवाल जो लोगों के मन में आता है, वह यह है कि इसमें निवेश की गई राशि कितने समय में वसूल होगी।
लागत और सब्सिडी का तालमेल
सोलर सिस्टम लगाने का खर्च उसकी क्षमता पर निर्भर करता है। बाजार में अलग-अलग क्षमता के हिसाब से पैनल और अन्य उपकरणों की कीमतें तय होती हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस पर आकर्षक सब्सिडी भी प्रदान करती हैं। किसी भी सोलर सिस्टम को लगवाने के लिए होने वाला वास्तविक खर्च, सरकारी सब्सिडी को घटाने के बाद ही पता चलता है। यदि आप अपनी जरूरत के मुताबिक सही क्षमता का चुनाव करते हैं, तो सब्सिडी और बिजली बचत के माध्यम से आप अपनी लगाई गई पूंजी को एक निश्चित समय सीमा में वापस प्राप्त कर सकते हैं।
निवेश की वसूली और बचत
सोलर सिस्टम लगवाने के बाद जो सबसे बड़ा फायदा होता है, वह है मासिक बिजली बिल में होने वाली कमी। यह बचत ही वह जरिया है जिससे आपका शुरुआती निवेश धीरे-धीरे वसूल हो जाता है। यदि आप 1kW का सिस्टम लगवाते हैं, तो उसकी लागत और बिजली उत्पादन की क्षमता के अनुसार उसे रिकवर करने का समय अलग होगा। इसी तरह, 3kW और 5kW के बड़े सिस्टम्स की लागत अधिक होती है, लेकिन उनसे उत्पन्न होने वाली बिजली की मात्रा भी काफी ज्यादा होती है, जिससे बड़े घरों या संस्थानों के लिए यह सौदा किफायती साबित होता है।
निष्कर्ष
किसी भी सोलर प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले अपनी बिजली की खपत का सही आकलन करना जरूरी है। यदि आप सही क्षमता का सोलर सिस्टम चुनते हैं, तो सरकारी सहायता का लाभ उठाकर आप न केवल पर्यावरण के अनुकूल बिजली का उपयोग कर पाएंगे, बल्कि लंबे समय में अपने बिजली खर्च को शून्य के करीब भी ला सकते हैं। सब्सिडी के आंकड़ों और बिजली दर के अंतर को समझकर निवेश करना ही समझदारी है।
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