भारत में बैंक लॉकर को लंबे समय से गहने, जमीन-जायदाद के कागजात, वसीयत और अन्य कीमती सामान को महफूज रखने का सबसे भरोसेमंद जरिया माना जाता रहा है। मगर अब यह तस्वीर तेजी से बदल रही है। एक ओर सरकारी बैंकों में लॉकर की भारी किल्लत है और इंतजार करने वालों की सूची लगातार लंबी होती जा रही है, तो दूसरी ओर निजी वॉल्ट कंपनियां भारी-भरकम शुल्क वसूलकर प्रीमियम स्तर की सुरक्षा बेचने में जुटी हैं।
क्या सुरक्षा अब एक लग्जरी बनती जा रही है
इन हालात के बीच यह सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या अपनी ही मेहनत की कमाई और संपत्ति को सुरक्षित रखने का अधिकार धीरे-धीरे एक लग्जरी सेवा में तब्दील होता जा रहा है। संपन्न वर्ग सालाना हजारों और लाखों रुपये खर्च कर बेहतर सुरक्षा खरीदने की स्थिति में है, जबकि मध्यम वर्ग आज भी बैंकों की लंबी कतारों और सीमित सुविधाओं के सहारे ही टिका हुआ है।
सुविधा से बड़ा मुद्दा बनती असमानता
यह स्थिति केवल सहूलियत तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि आर्थिक असमानता और वित्तीय सुरक्षा से जुड़ा एक बड़ा मसला बनती जा रही है। जिस तरह निजी कंपनियां इस क्षेत्र में पैर पसार रही हैं, उससे आम लोगों के लिए अपनी पूंजी और जरूरी दस्तावेजों को सुरक्षित रखने की चुनौती और गहराती दिख रही है।
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