धान की फसल में पीली पत्तियां: जिंक डालने से पहले जान लें पहचान का सही तरीका

धान की फसल में पत्तियों का पीला पड़ना किसी गंभीर पोषक तत्व की कमी की ओर इशारा हो सकता है, जिसे समझकर आप अपनी पैदावार को बर्बाद होने से बचा सकते हैं।

धान की सेहत का राज पत्तियों के रंग में छिपा है

खेती-किसानी करने वाले किसानों के लिए धान की फसल में पत्तियों का पीलापन एक बड़ी मुसीबत बन सकता है। कई किसान इस समस्या को महज मौसम के बदलाव या सामान्य प्रक्रिया समझकर अनदेखा कर देते हैं, लेकिन यह एक बड़ी भूल हो सकती है। अगर आपके खेत में धान के पौधों की ऊपर या नीचे की पत्तियां पीली पड़ रही हैं, तो सतर्क हो जाएं। यह फसल में किसी खास पोषक तत्व की कमी का साफ संकेत है। यदि समय रहते इसकी सही पहचान कर ली जाए, तो फसल को होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है।

विंध्य क्षेत्र में फसलों की स्थिति

मध्य प्रदेश के विंध्य इलाके में इन दिनों किसानों के बीच धान की पत्तियों के पीले पड़ने की समस्या काफी चर्चा में है। बरसात के मौसम के बाद खेतों में बड़ी संख्या में पौधों का रंग बदल रहा है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि पत्तियों के पीलेपन के पीछे कीट या बीमारियों का हमला हो सकता है, लेकिन इसके अलावा मिट्टी में जरूरी पोषक तत्वों की कमी होना भी एक बड़ा कारण है। सीधी कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक डॉ. शैलेंद्र गौतम के मुताबिक, किसान अक्सर बीमारी और कीट के लक्षणों को तो पकड़ लेते हैं, लेकिन पोषक तत्वों की कमी को पहचानना उनके लिए थोड़ा कठिन होता है। पत्तियों के पीले होने की जगह को देखकर कमी का अंदाजा लगाया जा सकता है।

नाइट्रोजन और सल्फर की कमी की पहचान

डॉ. शैलेंद्र गौतम ने बताया कि पत्तियों के रंग बदलने की स्थिति के आधार पर समस्या को दो भागों में बांटा जा सकता है। यदि आपके धान के पौधे की निचली पत्तियां पीली नजर आ रही हैं और ऊपर की पत्तियां हरी-भरी बनी हुई हैं, तो यह सीधे तौर पर नाइट्रोजन यानी यूरिया की कमी को दर्शाता है। ऐसी स्थिति में किसान को खेत में नाइट्रोजन की मात्रा का प्रबंधन करना चाहिए। इसके उलट, यदि ऊपर की नई पत्तियां पीली हो रही हैं और नीचे की पत्तियां हरी हैं, तो यह सल्फर की कमी का संकेत है। इस तरह की स्थिति में जिंक सल्फेट का प्रयोग किया जाता है, लेकिन इसके सही इस्तेमाल के लिए विशेषज्ञ की सलाह बहुत जरूरी है।

जिंक का चुनाव और इस्तेमाल का सही तरीका

कृषि विशेषज्ञ अवनीश पटेल ने किसानों को सलाह दी है कि वे जिंक के फॉर्मूलेशन को ध्यान में रखते हुए ही इसका उपयोग करें। बाजार में मिलने वाले जिंक के अलग-अलग प्रकारों के हिसाब से इसका छिड़काव या प्रयोग अलग तरीके से करना चाहिए:

  • 12 प्रतिशत वाला जिंक: जो किसान 12 प्रतिशत जिंक का इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें इसे सीधे टॉप ड्रेसिंग की तरह नहीं डालना चाहिए। इसके बजाय 150 ग्राम EDTA जिंक को 200 लीटर पानी में घोलकर फसल पर अच्छी तरह छिड़काव करना अधिक प्रभावी रहता है।
  • 21 प्रतिशत वाला जिंक: यदि आपकी धान की फसल 20 से 25 दिन की हो गई है, तो 21 प्रतिशत वाले जिंक की 8 से 10 किलोग्राम मात्रा प्रति एकड़ के हिसाब से टॉप ड्रेसिंग के रूप में दी जा सकती है।
  • 33 प्रतिशत वाला जिंक: इस श्रेणी के जिंक का इस्तेमाल 4 से 5 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से किया जाना पर्याप्त रहता है।

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बिना लक्षण देखे और जरूरत समझे खेतों में जिंक का अंधाधुंध उपयोग न करें, क्योंकि इससे लाभ के बजाय नुकसान होने की संभावना भी बनी रहती है।

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