हरतालिका तीज का महत्व और व्रत नियम
हिंदू धर्म में हरतालिका तीज का पर्व अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और सुखद वैवाहिक जीवन की कामना के लिए कठिन निर्जला व्रत धारण करती हैं। इस खास दिन पर माता पार्वती, भगवान शिव और गणेश जी की पूजा करने का विधान है। श्रद्धालु महिलाएं इस दिन हरतालिका तीज की व्रत कथा का पाठ करती हैं और पूरी रात भजन-कीर्तन व जागरण के माध्यम से ईश्वर की भक्ति में लीन रहती हैं। इस व्रत की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसमें सोने की मनाही होती है। वर्ष 2026 में हरतालिका तीज का व्रत 14 सितंबर को है और इसका पारण अगले दिन 15 सितंबर 2026 को सूर्योदय के बाद पूजा संपन्न करने के उपरांत किया जाएगा।
पारण के दिन सबसे पहले क्या ग्रहण करें
व्रत का पारण करना एक महत्वपूर्ण धार्मिक प्रक्रिया है। सबसे पहले आपको भगवान शिव, माता गौरी और गणेश जी की विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। पूजा के बाद ही व्रत खोलना शुभ माना जाता है। पारण करते समय सबसे पहले पूजा में अर्पित किए गए भीगे हुए चने और गुड़ का सेवन करना चाहिए। कई क्षेत्रों में खीरा खाकर भी व्रत खोलने की परंपरा है। एक विशेष सावधानी यह है कि पारण के समय नमक वाली चीजों का सेवन बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए।
पारण का शुभ मुहूर्त 2026
धार्मिक परंपरा के अनुसार, हरतालिका तीज के व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही किया जाना चाहिए। 15 सितंबर 2026 को सूर्योदय का समय सुबह 6 बजकर 54 मिनट है। इस समय के पश्चात आप अपनी पूजा विधि पूर्ण करके व्रत का पारण कर सकती हैं।
व्रत खोलते समय इन बातों का रखें ध्यान
- पारण की प्रक्रिया शुरू करने से पहले मिट्टी से बने शिवलिंग, गणेश जी और माता पार्वती की मूर्तियों का विधिपूर्वक विसर्जन करें।
- व्रत तोड़ने से पूर्व घर के बड़े-बुजुर्गों का पैर छूकर आशीर्वाद लेना न भूलें।
- यदि संभव हो, तो अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को दान अवश्य दें। दान देने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
- व्रत खोलने के बाद भोजन पूरी तरह सात्विक होना चाहिए। भोजन में भूलकर भी प्याज, लहसुन या अत्यधिक मिर्च-मसालों का उपयोग न करें।
- यह व्रत सदैव भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को सूर्योदय के उपरांत और विसर्जन की अंतिम पूजा पूरी होने पर ही खोला जाना चाहिए।
हरतालिका तीज व्रत का पौराणिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करने के लिए यह कठिन व्रत किया था। यही कारण है कि सुहागिन महिलाएं अपने सौभाग्य की वृद्धि के लिए और कुंवारी कन्याएं उत्तम वर की प्राप्ति के लिए इस व्रत का पालन करती हैं। इस दिन पूर्ण निष्ठा के साथ पूजा-अर्चना करने से भगवान शिव और माता पार्वती का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।
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