BRICS Summit: क्या नई दिल्ली घोषणापत्र भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत है? जानिए अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की राय

नई दिल्ली में संपन्न हुए दो दिवसीय BRICS शिखर सम्मेलन के बाद वैश्विक मामलों के विशेषज्ञों ने इसे भारत की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता बताया है। उनका मानना है कि तमाम भू-राजनीतिक मतभेदों के बावजूद 'नई दिल्ली डिक्लेरेशन' पर सहमति बनाना भारतीय विदेश नीति की एक शानदार उपलब्धि है।

नई दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय BRICS शिखर सम्मेलन का समापन हो चुका है। रूस के राष्ट्रपति पुतिन और चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग सहित दुनिया भर के तमाम बड़े नेता अपने-अपने देशों के लिए रवाना हो चुके हैं। इस महत्वपूर्ण बैठक के बाद अब अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों के बीच इस शिखर सम्मेलन की सफलता और इसके दूरगामी परिणामों को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। वैश्विक कूटनीति पर बारीक नजर रखने वाले विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि तमाम सदस्य देशों के बीच मौजूद गंभीर मतभेदों और भू-राजनीतिक विरोधाभासों के बावजूद 'नई दिल्ली डिक्लेरेशन' (घोषणापत्र) पर आम सहमति बन जाना भारतीय कूटनीतिक कौशल की एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक जीत है।

भारतीय कूटनीति की एक बेमिसाल सफलता

ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के जिंदल स्कूल ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स के डीन प्रोफेसर डॉक्टर श्रीराम चौलिया ने इस सम्मेलन के परिणामों को भारतीय विदेश नीति और बहुपक्षीय जुड़ाव के लिए एक बेहद शानदार सफलता करार दिया है। श्रीराम चौलिया ने अपने विश्लेषण में कहा कि यह एक बेहद असाधारण परिणाम है। यह हमारी बहुपक्षीय कूटनीति के कौशल और अलग-अलग सदस्य देशों के बीच की विसंगतियों तथा विरोधाभासों को कुशलतापूर्वक प्रबंधित करने की भारत की क्षमता को दर्शाता है। इतने सारे विरोधी दृष्टिकोण वाले देशों को एक साझा और न्यूनतम सर्वसम्मत बिंदु पर एक साथ लाना वास्तव में एक बड़ी उपलब्धि है।

विविधता को कमजोरी के बजाय ताकत में बदला

प्रोफेसर चौलिया का मानना है कि BRICS समूह के विस्तार के साथ यह आशंका जताई जा रही थी कि सदस्यों की संख्या बढ़ने से आपसी मतभेद और अधिक गहरे होंगे। लेकिन भारतीय कूटनीति ने इस चुनौती को एक बड़े अवसर में बदल दिया। उन्होंने इस संबंध में कहा कि सामान्य तौर पर कूटनीति में ऐसा माना जाता है कि जैसे-जैसे किसी संगठन का विस्तार होता है, उसमें फूट और वैचारिक मतभेद भी बढ़ने लगते हैं। अत्यधिक विविधता अक्सर विवादों का कारण बनती है। लेकिन भारत ने अपनी सूझबूझ से इस संभावित कमजोरी को अपनी सबसे बड़ी ताकत में बदल दिया। प्रोफेसर चौलिया के अनुसार, यह बात विवादित भू-राजनीतिक मुद्दों पर तैयार किए गए अंतिम घोषणापत्र में साफ झलकती है।

उन्होंने आगे विस्तार से समझाते हुए कहा कि अगर आप नई दिल्ली डिक्लेरेशन को ध्यान से देखेंगे, तो आपको दिखेगा कि वर्तमान में चल रहे विभिन्न सैन्य संघर्षों और तनावपूर्ण वैश्विक मुद्दों पर भारत की सोच हावी रही है। जब पूरी दुनिया बिखराव के दौर से गुजर रही है और वैश्विक सहयोग की उम्मीदें टूट रही हैं, ऐसे कठिन समय में भी भारत ने अपनी लीडरशिप के बल पर यह साबित कर दिया कि रचनात्मक सहयोग का रास्ता निकाला जा सकता है।

आतंकवाद और अंतरराष्ट्रीय नियमों पर वैश्विक मंथन

यूरोपियन प्रेस फेडरेशन से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार मार्को एल्पेगियानी ने इस डिक्लेरेशन में आतंकवाद और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के पालन पर हुई चर्चा को बेहद महत्वपूर्ण माना है। मार्को एल्पेगियानी का कहना था कि आतंकवाद एक ऐसा मुद्दा है जिस पर वैश्विक स्तर पर और अधिक गहराई से बहस होनी चाहिए। जो भी देश या संगठन अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करता है और उन्हें मानने से इनकार करता है, वह वास्तव में आतंक को बढ़ावा दे रहा है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कोई छोटा संगठन है, कोई बड़ा समूह है या फिर कोई छोटा या बड़ा देश ही क्यों न हो, हम हर तरह के आतंकवाद के खिलाफ हैं।

एल्पेगियानी ने इस चर्चा को एक नया आयाम देते हुए यह भी कहा कि कुछ मामलों में अनुचित आर्थिक प्रतिबंध भी आतंकवाद का ही एक रूप बन जाते हैं। उनका मानना है कि BRICS देशों ने अपने बयान में आतंकवाद की परिभाषा को और अधिक व्यापक बनाने की कोशिश की है, ताकि इसमें केवल कुछ उग्रवादी समूह ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनमानी करने वाले संस्थान भी शामिल हो सकें।

स्थिरता, मानव अधिकार और आर्थिक विकास पर साझा जोर

साउथ अफ्रीका के जाने-माने पत्रकार सियाबोंगा गुडमैन माडोंडो ने इस बात पर जोर दिया कि BRICS देशों के लिए इस तरह के व्यापक घोषणापत्र पर सहमत होना बहुत जरूरी था, क्योंकि यह दुनिया के सामने खड़ी कई बड़ी चुनौतियों का समाधान पेश करता है। माडोंडो के अनुसार, यह डिक्लेरेशन बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह करीब 45 पन्नों का एक विस्तृत दस्तावेज है जिसमें वैश्विक सुरक्षा और विकास से जुड़े कई अहम बिंदुओं को शामिल किया गया है।

घोषणापत्र के मुख्य बिंदुओं पर चर्चा करते हुए माडोंडो ने निम्नलिखित बातें रेखांकित कीं:

  • इस दस्तावेज में विशेष बल दिया गया है कि BRICS देशों को खुद को ईरान और मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्धों का हिस्सा बनने से दूर रखना चाहिए।
  • हमारे देशों को यह देखना चाहिए कि भविष्य में क्या परिस्थितियां बनने वाली हैं और इन मुद्दों को सुलझाने का प्रयास करना चाहिए।
  • घोषणापत्र में सुरक्षित अफ्रीका और सुरक्षित विश्व के निर्माण के लिए दृढ़ प्रतिबद्धता व्यक्त की गई है, क्योंकि इन युद्धों का बुरा असर पूरी दुनिया पर पड़ता है।
  • सभी देशों को निवेश की अत्यधिक आवश्यकता है ताकि हर तरफ आर्थिक विकास की गति तेज हो सके।
  • अफ्रीका और दुनिया के अन्य हिस्सों के लिए अपने देशों में स्थिरता बनाए रखने का एक साफ रास्ता तैयार करना होगा।
  • मानव तस्करी जैसे गंभीर मुद्दों पर भी सम्मेलन में विस्तार से बात की गई है क्योंकि इन सामाजिक बुराइयों का सीधा असर मानवाधिकारों पर पड़ता है, जिनका हर दिन उल्लंघन होता है।

साउथ अफ्रीकी पत्रकार ने कहा कि यह डिक्लेरेशन अभी एक शुरुआत है और इस पर लगातार काम करने की जरूरत होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह दस्तावेज कूटनीतिक स्तर पर चल रहे कार्यों की एक प्रगति रिपोर्ट की तरह है। इसे जमीनी स्तर पर लागू करने की जरूरत है, हालांकि इसके लिए कोई निश्चित समयसीमा अभी तय नहीं की गई है। लेकिन दुनिया जिन समस्याओं से जूझ रही है, उन्हें हल करने के लिए हमारा दृष्टिकोण पूरी तरह से स्पष्ट और दृढ़ होना चाहिए।

वैश्विक पटल पर भारत का बढ़ता कद

शिखर सम्मेलन की इस बड़ी सफलता पर अमेरिका के प्रसिद्ध साउथ एशिया एनालिस्ट माइकल कुगेलमैन ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। माइकल कुगेलमैन का मानना है कि BRICS समिट के दौरान सर्वसम्मति से जारी किया गया यह न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन पूरी तरह से भारत की एक ऐतिहासिक और अत्यंत महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता को दर्शाता है। इससे यह भी साफ हो गया है कि वैश्विक स्तर पर विपरीत परिस्थितियों के बीच भी सर्वसम्मति बनाने में भारत की भूमिका अत्यंत प्रभावशाली साबित हुई है।

https://www.indiatv.in/india/national/how-successful-was-the-brics-summit-2026-experts-call-it-a-major-diplomatic-success-for-india-2026-09-13-1242994