क्या है भादोम जात्रा? रिमांड पर क्यों रखे जाते हैं देवी-देवता, जानें भंगाराम माई दरबार की अनोखी परंपरा

छत्तीसगढ़ के कोंडागांव में एक अनोखी परंपरा के तहत देवी-देवताओं को अदालत के कटघरे में खड़ा किया जाता है। भादोम जात्रा के दौरान भंगाराम माई के दरबार में देवताओं की सालभर की 'परफॉर्मेंस' का हिसाब होता है और लापरवाही पर उन्हें जेल की सजा भी दी जाती है।

दुनिया भर में आपने इंसानों के मुकदमों और अदालतों के कई किस्से सुने होंगे, जहां अपराधियों को उनके किए की सजा मिलती है। लेकिन क्या आप सोच सकते हैं कि कहीं देवी-देवताओं पर भी मुकदमा चलता हो? छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल बस्तर क्षेत्र में एक ऐसी ही अनूठी और हैरान कर देने वाली परंपरा सदियों से चली आ रही है। यहां के कोंडागांव जिले में हर साल एक ऐसी 'देव अदालत' सजती है, जहां आरोपी की भूमिका में इंसान नहीं, बल्कि खुद देवी-देवता होते हैं। इस विशेष आयोजन को 'भादोम जात्रा' के नाम से जाना जाता है, जहां लोगों की फरियाद न सुनने वाले देवताओं को बाकायदा सजा सुनाई जाती है।

भादोम जात्रा: जब देवताओं को छोड़ना पड़ता है अपना स्थान

इस पूरी व्यवस्था और परंपरा के बारे में भंगाराम माई मंदिर संचालक समिति के अध्यक्ष ईश्वर कोर्राम बताते हैं कि आदिवासियों का अपने देवताओं से रिश्ता बेहद गहरा और दोतरफा है। जब ग्रामीणों की समस्याएं दूर नहीं होती हैं, तो वे इसके लिए सीधे तौर पर अपने कुलदेवताओं को जिम्मेदार मानते हैं। इसी शिकायत के निपटारे के लिए हर साल भादो के महीने में एक विशेष यात्रा निकाली जाती है, जिसे स्थानीय भाषा में भादोम जात्रा कहा जाता है।

इस जात्रा के दौरान ग्रामीण अपने-अपने गांवों के देवी-देवताओं के प्रतीकों (जैसे लाठ, आंगा या अन्य पूज्य चिह्न) को लेकर घर से निकल पड़ते हैं। इस प्रक्रिया को स्थानीय स्तर पर 'रवानगी' कहा जाता है। इसके तहत देवताओं को उनके मूल स्थान से हटाकर भंगाराम माई के मंदिर परिसर के बाहर लाकर रख दिया जाता है।

अस्थायी जेल और देवताओं का 'रिमांड'

मंदिर समिति के अध्यक्ष के अनुसार, यह पूरी प्रक्रिया बेहद अनुशासित ढंग से पूरी की जाती है। मंदिर परिसर के सामने देवताओं को लाकर रखने की इस जगह को एक तरह की अस्थायी जेल माना जाता है। फैसला सुनाए जाने से पहले आरोपी देवी-देवताओं को यहां रिमांड पर रखा जाता है। यह कोंडागांव के आदिवासियों की न्याय व्यवस्था का एक बेहद अनूठा हिस्सा है।

देवी-देवताओं के लिए भंगाराम माई की यह अदालत किसी सुप्रीम कोर्ट से कम नहीं मानी जाती। यहां केवल शिकायतों की सुनवाई ही नहीं होती, बल्कि ठोस सबूतों और ग्रामीणों के दावों के आधार पर अंतिम फैसला भी सुनाया जाता है। जो देवता अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में पूरी तरह नाकाम साबित होते हैं, उन्हें बाकायदा दोषी करार देकर सजा दी जाती है।

खुली जेल और 'घर वापसी' की अनोखी प्रथा

सजा पाने वाले देवताओं को कैद करने के लिए भंगाराम माई मंदिर के पास ही एक खुली जेल बनी हुई है। दोषी पाए जाने के बाद देवताओं के प्रतीकों को इसी खुली जेल में डाल दिया जाता है। बस्तर की लोक-संस्कृति और इतिहास पर गहरी पकड़ रखने वाले इतिहासकार घनश्याम नाग का कहना है कि सजा काटने के दौरान ये देवी-देवता अक्सर अपने ग्रामीणों के सपनों में आते हैं।

सपनों के जरिए देवता अपनी भूल स्वीकार करते हैं और ग्रामीणों को अपनी वापसी के लिए मनाते हैं। जब ग्रामीणों को यह आभास हो जाता है कि उनके देवता को अपनी गलती का अहसास हो गया है, तब उनकी ससम्मान घर वापसी कराई जाती है। यह पूरी व्यवस्था बस्तर की उस अनूठी परंपरा को दर्शाती है, जहां न्याय की कसौटी पर हर कोई बराबर है, चाहे वह इंसान हो या भगवान। इस देव अदालत में न केवल सजा मिलती है, बल्कि रोगों और विपत्तियों का इलाज भी होता है।

'डॉक्टर देव' की कहानी: महामारी से मुक्ति का इतिहास

इतिहासकार घनश्याम नाग ने इस परंपरा से जुड़ी एक बेहद दिलचस्प और ऐतिहासिक घटना साझा की है। उनके अनुसार, बहुत पहले पूरे बस्तर संभाग में हैजा नामक भयानक महामारी फैल गई थी। लोग इस संक्रामक बीमारी से लगातार दम तोड़ रहे थे और हर तरफ हाहाकार मचा हुआ था। इस संकट से निपटने के लिए तत्कालीन शासन द्वारा नागपुर से एक बेहद योग्य डॉक्टर को बस्तर भेजा गया था। उस डॉक्टर ने दिन-रात एक करके, बिना अपनी परवाह किए, पूरे बस्तर क्षेत्र के लोगों का इलाज किया और क्षेत्र को पूरी तरह हैजा मुक्त बना दिया।

लेकिन दुर्भाग्य से, जब वह डॉक्टर अपना काम पूरा करके वापस नागपुर लौट रहे थे, तो बस्तर की घाटियों में एक सड़क दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई। मान्यता है कि भंगाराम माई यह अच्छी तरह जानती थीं कि वह डॉक्टर कोई साधारण मनुष्य नहीं बल्कि एक देवतुल्य आत्मा थे, जिन्होंने निस्वार्थ भाव से बस्तर की सेवा की थी।

9 परगना की मिली जिम्मेदारी

दुर्घटना के बाद भंगाराम माई ने उस परोपकारी डॉक्टर की आत्मा को अपने देवी-देवताओं के समूह में शामिल कर लिया। उन्हें बस्तर के 9 परगना के अंतर्गत आने वाले सभी गांवों की कमान सौंपी गई। उन्हें यह जिम्मेदारी दी गई कि यदि भविष्य में कभी भी किसी गांव में हैजा या अन्य कोई संक्रामक बीमारी फैलेगी, तो उस पर नियंत्रण रखने का काम वही करेंगे।

इतिहासकार बताते हैं कि उस दौर में जब बस्तर के सुदूर जंगलों में स्वास्थ्य सुविधाओं और अस्पतालों का कोई नामोनिशान नहीं था, तब ग्रामीण किसी भी बीमारी या महामारी की स्थिति में सीधे इन 'डॉक्टर देव' के पास आते थे। वहां विशेष पूजा-अर्चना और मन्नत (बंधन) के जरिए बीमारियों का इलाज किया जाता था। लोगों का विश्वास है कि डॉक्टर देव की कृपा से बीमार व्यक्ति पूरी तरह स्वस्थ हो जाता था।

न्याय, विश्वास और परंपरा का अद्भुत मेल

कोंडागांव की यह भंगाराम माई देव अदालत केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह आदिवासियों के लोकतांत्रिक और न्यायप्रिय दृष्टिकोण की अद्भुत मिसाल है। यह परंपरा बस्तर की समृद्ध आदिवासी संस्कृति को बयां करती है, जहां अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपने के बदले में देवताओं को भी जवाबदेह बनाया जाता है। यहां देवी-देवता केवल पूजे ही नहीं जाते, बल्कि उन्हें अपने लोगों के प्रति कर्तव्यनिष्ठ भी रहना पड़ता है।

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