संयुक्त अरब अमीरात की विकास गाथा और फ्री जोन का प्रभाव
आजकल दुनिया भर के बड़े निवेशकों और कंपनियों की पहली पसंद संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE बना हुआ है। दुबई जैसे शहरों की कायापलट और वहां खड़ी हो रही हाईटेक इमारतों का जंगल देखकर पूरी दुनिया हैरान है। अमेरिका और यूरोप की दिग्गज कंपनियां अरबों रुपये का निवेश करने के लिए इस रेगिस्तानी मुल्क की ओर भाग रही हैं। इस शानदार विकास और आर्थिक चमक के पीछे जो सबसे बड़ा आर्थिक मंत्र काम कर रहा है, वह है फ्री जोन व्यवस्था। यह मॉडल विदेशी कंपनियों को आकर्षित करने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देने का एक बेहतरीन उदाहरण बन गया है। अब चर्चा यह भी तेज हो गई है कि क्या भारत के छोटे शहरों में भी इस मॉडल को अपनाकर वहां अमेरिका जैसी चमक लाई जा सकती है।
आखिर क्या है यह फ्री जोन व्यवस्था?
सरल शब्दों में समझें तो फ्री जोन किसी देश का एक ऐसा विशेष भौगोलिक हिस्सा होता है, जहाँ देश के सामान्य कानूनों के बजाय अधिक उदार और सुविधाजनक नियम लागू होते हैं। यहाँ कारोबार करने वाली कंपनियों को कई प्रकार की रियायतें दी जाती हैं, जो उन्हें अन्य जगहों पर नहीं मिलतीं। इनमें प्रमुख रूप से आयात और निर्यात में विशेष छूट, कस्टम ड्यूटी में ढील और टैक्स में कटौती जैसी सुविधाएं शामिल हैं। जब कोई कंपनी फ्री जोन में प्रवेश करती है, तो उसे व्यापार की राह में आने वाली बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है, जिससे उसका पूरा ध्यान अपने विकास और उत्पादन पर केंद्रित रहता है।
यूएई में काम करने का तरीका
यूएई ने न केवल एक फ्री जोन बनाया है, बल्कि अलग-अलग उद्योगों और क्षेत्रों के लिए विशेष जोन तैयार किए हैं। वर्तमान में वहां लगभग 40 ऐसे सेक्टर हैं, जिनमें मैन्युफैक्चरिंग, एडवांस टेक्नोलॉजी, मीडिया, लॉजिस्टिक्स, हेल्थकेयर, फाइनेंस और कृषि-तकनीक जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं। जब कोई कंपनी यहाँ अपना निवेश लेकर आती है, तो उसे न केवल कारोबार करने का लाइसेंस मिलता है, बल्कि उसके लिए जगह, गोदाम और फैक्ट्री लगाने की पूरी व्यवस्था भी सुनिश्चित की जाती है। यहाँ की कार्यप्रणाली का मुख्य आधार विदेशी कंपनियों को पूर्ण स्वामित्व देना है। इसका अर्थ यह है कि कोई विदेशी फर्म बिना किसी स्थानीय साझेदार के अपनी पूरी कंपनी का संचालन खुद कर सकती है। साथ ही, इन कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारियों को निवास और वर्क परमिट भी आसानी से मिल जाता है।
टैक्स और आर्थिक इकोसिस्टम
फ्री जोन में निवेश का सबसे बड़ा आकर्षण वहां मिलने वाली टैक्स छूट है। हालांकि यूएई में कॉर्पोरेट टैक्स की दर 9 फीसदी तय है, लेकिन फ्री जोन के दायरे में आने वाली पात्र कंपनियों को कई मामलों में शून्य टैक्स का फायदा मिलता है। लेकिन सरकार का काम सिर्फ टैक्स छोड़ना ही नहीं है, बल्कि एक ऐसा इकोसिस्टम बनाना है जो कंपनी के लिए मददगार हो। इसके तहत फ्री जोन में आधुनिक सड़कें, पर्याप्त बिजली, हाई स्पीड इंटरनेट, वेयरहाउस और मजबूत कनेक्टिविटी सुनिश्चित की जाती है। सरकार बुनियादी ढांचे पर इतना ध्यान देती है कि कंपनी को बस अपना काम शुरू करना होता है, बाकी सुविधाओं की जिम्मेदारी प्रशासन की होती है।
भारत के लिए फ्री जोन का भविष्य
भारत में पहले से ही SEZ यानी स्पेशल इकोनॉमिक जोन मॉडल मौजूद है। सरकार ने इसके लिए एक समर्पित वेबसाइट भी बनाई है, जिसके जरिए कंपनियों को सुविधा प्रदान की जाती है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि यदि हम यूएई के फ्री जोन मॉडल की तरह अपने SEZ को और अधिक अपग्रेड करें और नियमों को और सरल बनाएं, तो निवेश की तस्वीर बदल सकती है। भारत के छोटे शहरों को यदि फ्री जोन में तब्दील किया जाए, तो इलेक्ट्रॉनिक्स, रेलवे और अन्य महत्वपूर्ण मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है।
सिंगल विंडो प्रशासन की जरूरत
किसी भी देश या राज्य में फ्री जोन मॉडल की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वहां का प्रशासन कितना चुस्त है। इसके लिए एक सिंगल विंडो सिस्टम बेहद जरूरी है। यानी कंपनी को पंजीकरण, लाइसेंसिंग, परमिट और अन्य सभी सरकारी मंजूरियों के लिए अलग-अलग दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें। अगर भारत अपनी प्रक्रियाओं को पूरी तरह डिजिटल और सिंगल विंडो के तहत एकीकृत कर ले, तो यह छोटे शहरों को भी वैश्विक निवेश का केंद्र बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम होगा। इससे न केवल विदेशी पूंजी आएगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए और बेहतर अवसर भी पैदा होंगे।
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