बंगाली हिंदू पहचान और सुरक्षा का मुद्दा
पश्चिम बंगाल में एक बार फिर धार्मिक और राजनीतिक पहचान का मुद्दा जोर पकड़ चुका है। राज्य की राजनीति में अपने बयानों के लिए चर्चित शुभेंदु अधिकारी ने हाल ही में बंगाली हिंदुओं की सुरक्षा और उनकी सांस्कृतिक पहचान को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। राजारहाट गोपालपुर में गणेश पूजा के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए शुभेंदु ने बांग्लादेश में हिरासत में लिए गए संत चिन्मय कृष्ण दास का विशेष जिक्र किया। उन्होंने कहा कि चिन्मय कृष्ण दास की वे तस्वीरें, जिनमें वे अपनी मां के अंतिम संस्कार में पैरोल पर शामिल हुए थे, ने पूरी दुनिया के सनातन धर्म के अनुयायियों को झकझोर कर रख दिया है।
चिन्मय कृष्ण दास का प्रकरण और इतिहास की दुहाई
शुभेंदु अधिकारी ने इतिहास का संदर्भ देते हुए कहा कि यदि श्यामा प्रसाद मुखर्जी और स्वामी प्रणवानंद का संघर्ष और योगदान नहीं होता, तो आज भारत में रहने वाले हिंदुओं की स्थिति भी वैसी ही होती जैसी चिन्मय कृष्ण दास की है। उन्होंने दावा किया कि दशकों तक बंगाल की सत्ता में काबिज रहे वाम मोर्चे और तृणमूल कांग्रेस की सरकारों ने इन महापुरुषों के योगदान को इतिहास से मिटाने की साजिश रची। उन्होंने जोर देकर कहा कि वे इस समृद्ध परंपरा और विरासत को फिर से जनता के सामने लाना चाहते हैं। गौरतलब है कि चिन्मय कृष्ण दास नवंबर 2024 से बांग्लादेश में हिरासत में हैं और उन पर देश विरोधी गतिविधियों के आरोप लगाए गए हैं। हाल ही में उन्हें अपनी मां के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए मात्र पांच घंटे की पैरोल मिली थी।
निजी अनुभव और विभाजन का दर्द
अपनी बात को और अधिक प्रभावी ढंग से रखते हुए शुभेंदु ने अपने परिवार की पीड़ा साझा की। उन्होंने अपनी मां गायत्री देवी के संघर्षों का स्मरण करते हुए बताया कि उनका परिवार मूल रूप से उस भूभाग का रहने वाला था जो अब बांग्लादेश का हिस्सा है। विभाजन की त्रासदी के दौरान, हिंदू होने के कारण उन्हें और उनके पिता को सब कुछ छोड़कर भारत पलायन करना पड़ा था। शुभेंदु ने भावुक होते हुए कहा कि उनकी मां उस समय केवल वे कपड़े पहनकर भाग पाई थीं जो उस वक्त उनके शरीर पर थे। उन्होंने इस बात को बंगाली हिंदुओं के लिए एक अलग मातृभूमि की आवश्यकता के संदर्भ में पेश किया।
सीपीएम का भाजपा पर कड़ा प्रहार
शुभेंदु के बयानों के बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। माकपा नेता कल्तन दासगुप्ता ने भाजपा के रुख को पाखंड करार देते हुए कहा कि वामपंथी पार्टियां हमेशा से राष्ट्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए खड़ी रही हैं। दासगुप्ता ने कहा कि वे चाहे बांग्लादेश हो, भारत हो या फलस्तीन, हर जगह बहुसंख्यक वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष करते हैं। उन्होंने भाजपा पर दोहरे मापदंड का आरोप लगाते हुए कहा कि एक ओर पार्टी चिन्मय कृष्ण दास के मामले को उठा रही है, वहीं दूसरी ओर उमर खालिद जैसे लोगों की गिरफ्तारी पर चुप है। उन्होंने कहा कि भाजपा की यह नीति अब जनता के सामने स्पष्ट रूप से बेनकाब हो रही है।
बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की स्थिति
शुभेंदु अधिकारी लगातार बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों का मुद्दा उठाते रहे हैं। इससे पहले मेमनसिंह में दीपू दास की हत्या के समय भी उन्होंने ढाका सरकार के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया था और हिंदुओं की सुरक्षा की मांग की थी। वे विपक्ष के नेता के रूप में लगातार यह दबाव बनाते रहे हैं कि भारत को पड़ोसी देश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर अपनी स्पष्ट और सख्त भूमिका तय करनी चाहिए।
वामदलों और टीएमसी पर सांस्कृतिक हमले
शुभेंदु ने वामपंथी शासन के 34 वर्षों पर निशाना साधते हुए कहा कि उस दौरान बंगाल को उसकी जड़ों से काटने की कोशिश की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि पंचांग, देवी-देवताओं, पूजा पद्धति और यहां तक कि आरती को भी भुला देने का प्रयास हुआ। उन्होंने दुर्गा पूजा और महालया के आयोजनों में भी वैचारिक अवरोध पैदा करने के आरोप लगाए। टीएमसी पर हमला करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य के शासनकाल के अंतिम वर्षों में दुर्गा पूजा का 'जमातीकरण' किया गया और विसर्जन के समय में जबरन बदलाव किए गए। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस बार पूजा पारंपरिक पंचांग के अनुसार होगी और अष्टमी के दिन शराब की दुकानें पूरी तरह बंद रहेंगी।
सांस्कृतिक और वैचारिक टकराव
सीपीएम के वरिष्ठ नेता सुजान चक्रवर्ती ने इन दावों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने कहा कि शुभेंदु अधिकारी यह तय करने की कोशिश कर रहे हैं कि बंगाल के लोग क्या पढ़ें, क्या खाएं और त्योहार कैसे मनाएं। उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर के शरदोत्सव और बीरेंद्र कृष्ण भद्र की महिषासुर मर्दिनी का उल्लेख करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री होने का अर्थ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति सांस्कृतिक परंपराओं पर अपना एजेंडा थोपे। विवाद अब दुर्गा पूजा के पंडालों के पास लगने वाली किताबों की दुकानों तक पहुंच गया है, जहां वामपंथी साहित्य की उपस्थिति को लेकर भी तकरार जारी है। सीपीएम ने स्पष्ट कर दिया है कि उनके कार्यक्रम और स्टॉल पहले की तरह ही जारी रहेंगे और वे शुभेंदु के किसी भी निर्देश को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं।
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