ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 और भारत का कूटनीतिक प्रभाव
राजधानी दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पटल पर एक नया अध्याय लिख दिया है। भारत की अध्यक्षता में हुए इस आयोजन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ब्रिक्स अब केवल एक चर्चा करने वाला मंच नहीं रह गया है, बल्कि यह एक ऐसी प्रभावशाली वर्कशॉप बन चुका है जो ठोस परिणामों के लिए काम करती है। दिल्ली में दुनिया भर के दिग्गज नेताओं के जुटान और साझा दिल्ली घोषणापत्र पर बनी सर्वसम्मति ने साबित कर दिया है कि वैश्विक व्यवस्था में भारत का कद लगातार बढ़ रहा है। इस सम्मेलन की सबसे बड़ी सफलता उन 6 प्रमुख मुस्लिम बहुल देशों की भागीदारी रही, जिन्होंने भारत के नेतृत्व पर भरोसा जताया है।
मुस्लिम जगत का भारत पर भरोसा
इस सम्मेलन में जिन प्रमुख मुस्लिम बहुल अरब देशों ने पूर्ण सदस्य या आमंत्रित साझेदार के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, वे वैश्विक राजनीति के बड़े खिलाड़ी हैं। इनमें संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान शामिल थे। इनके अलावा सऊदी अरब के विदेश मंत्री और शीर्ष प्रतिनिधिमंडल, इथियोपिया के राष्ट्रपति तथा इंडोनेशिया के राष्ट्रपति ने भी विशेष आमंत्रित साझेदार के तौर पर भारत आकर अपनी भागीदारी सुनिश्चित की। इन शक्तिशाली देशों की सीधी उपस्थिति ने यह सिद्ध कर दिया कि ग्लोबल साउथ और इस्लामिक जगत के महत्वपूर्ण केंद्र अब भारत के साथ आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं।
पाकिस्तान और बांग्लादेश की कूटनीतिक विफलता
जहां एक ओर कई बड़े मुस्लिम देशों ने ब्रिक्स में भारत के साथ मिलकर काम करने पर मुहर लगाई, वहीं पाकिस्तान और बांग्लादेश को इस सम्मेलन से बाहर रखा जाना एक बड़ा कूटनीतिक संदेश है। पाकिस्तान लंबे समय से चीन के सहयोग से ब्रिक्स का हिस्सा बनने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा था, लेकिन उसका ट्रैक रिकॉर्ड और आर्थिक बदहाली उसके आड़े आ गई। आतंकवाद के मुद्दे पर भारत का सख्त रुख और ब्रिक्स के प्रवेश सिद्धांतों के तहत ठोस आर्थिक योगदान की कमी के चलते पाकिस्तान की दावेदारी को कोई समर्थन नहीं मिला। वहीं, बांग्लादेश की स्थिति भी अलग नहीं रही। देश में हुए हालिया राजनीतिक बदलावों और अस्थिरता के कारण उसे इस बार आमंत्रण नहीं दिया गया, जबकि पिछले G-20 सम्मेलन में वहां की प्रधानमंत्री शेख हसीना विशेष सदस्य के रूप में शामिल हुई थीं।
एम जे अकबर ने बताया ऐतिहासिक
भारत के पूर्व विदेश राज्य मंत्री और वरिष्ठ पत्रकार एम जे अकबर ने इस सम्मेलन के परिणामों को ऐतिहासिक करार दिया है। उनके अनुसार, दिल्ली घोषणापत्र सिद्धांतों की एक ऐसी शक्तिशाली अभिव्यक्ति है, जिसे अब जमीन पर उतारा जा रहा है। अकबर का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह स्पष्ट कर दिया था कि ब्रिक्स को 'टॉक शॉप' की छवि से बाहर निकालकर 'वर्कशॉप' में तब्दील करना समय की मांग है। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स न केवल दुनिया की 40% GDP का प्रतिनिधित्व करता है, बल्कि अब यह दुनिया की साझा इच्छाओं और आवाज का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है।
दिल्ली घोषणापत्र और वैश्विक मुद्दे
ब्रिक्स 2026 के साझा घोषणापत्र में 1956 के बांडुंग सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए राजनीति से प्रेरित कूटनीति पर लगाम लगाने की बात कही गई है। यह दस्तावेज यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में चल रहे संघर्षों को सुलझाने के लिए एक सही मार्ग प्रशस्त करता है। घोषणापत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि फिलिस्तीन के लोगों को अपनी जमीन पर रहने का बुनियादी अधिकार है और यरूशलेम के ऐतिहासिक स्वरूप के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ स्वीकार्य नहीं होगी।
निष्कर्ष
दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन ने यह प्रमाणित कर दिया है कि मुस्लिम जगत के ताकतवर देश अब इस्लामाबाद के दुष्प्रचार के बजाय नई दिल्ली के आर्थिक और कूटनीतिक प्रभाव के साथ खड़े होना बेहतर समझ रहे हैं। साझा घोषणापत्र पर बनी सर्वसम्मति ने जहां बहुध्रुवीय विश्व में भारत की भूमिका को मजबूत किया है, वहीं पाकिस्तान जैसे मुल्कों की कूटनीतिक कंगाली और उनके द्वारा फैलाए गए भारत-विरोधी प्रोपेगैंडा को वैश्विक मंच पर पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। यह सम्मेलन इस बात का प्रमाण है कि कूटनीति के असली मैदान में केवल वही देश सफल होते हैं जिनके पास आर्थिक मजबूती और स्पष्ट दूरदर्शिता होती है।
https://hindi.news18.com/news/nation/brics-summit-2026-india-achieved-pakistan-bangladesh-other-muslim-nations-could-not-foreign-expert-mj-akbar-statements-10829086.html