BRICS सम्मेलन से भारत को क्या मिला? पी. चिदंबरम के सवाल पर कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने दिया जवाब, गिनाए कई फायदे

BRICS को लेकर कांग्रेस के अंदर ही दो अलग-अलग सुर देखने को मिल रहे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम द्वारा BRICS के महत्व पर सवाल उठाए जाने के बाद, पार्टी सांसद शशि थरूर ने इसके फायदे गिनाते हुए इसे भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताया है।

भारत में आयोजित होने वाले आगामी BRICS शिखर सम्मेलन को लेकर विपक्षी पार्टी कांग्रेस के भीतर ही कूटनीति के मोर्चे पर अलग-अलग राय देखने को मिल रही है। हाल ही में कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने इस संगठन के सम्मेलनों के व्यावहारिक लाभों पर सवाल खड़े किए थे। उन्होंने पूछा था कि बीते कुछ सालों में हुए इन सम्मेलनों से भारत को आखिरकार क्या ठोस हासिल हुआ है। अब उनकी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर ने चिदंबरम के इस रुख से असहमति जताते हुए BRICS के महत्व को रेखांकित किया है। थरूर ने भारत को मिलने वाले कई बड़े फायदों का जिक्र किया है, हालांकि इसके साथ ही उन्होंने इस संगठन के सामने मौजूद बड़ी चुनौतियों और देश के व्यापारिक घाटे पर भी प्रकाश डाला है।

ग्लोबल साउथ के लिए BRICS का महत्व और शशि थरूर का विश्लेषण

दिल्ली में आयोजित होने वाले आगामी शिखर सम्मेलन से पहले शशि थरूर ने इस बहुपक्षीय मंच की उपयोगिता पर अपनी राय साझा की। उन्होंने कहा कि विकासशील देशों यानी ग्लोबल साउथ के लिए BRICS एक बेहद महत्वपूर्ण और प्रभावी मंच है। थरूर के मुताबिक, वर्तमान में ग्लोबल साउथ के अंतर्गत 100 से अधिक देश शामिल हैं, और BRICS के 11 प्रमुख देश इस विशाल क्षेत्र की विभिन्न विचारधाराओं और चिंताओं को वैश्विक स्तर पर मजबूती से पेश करते हैं।

थरूर ने इस संगठन की आर्थिक और जनसांख्यिकीय ताकत को दर्शाते हुए कुछ अहम आंकड़े भी पेश किए। उन्होंने बताया कि इस समूह में शामिल देश विश्व की एक बहुत बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसके अलावा वैश्विक अर्थव्यवस्था यानी वैश्विक GDP में भी इन देशों की कुल हिस्सेदारी लगभग 41 प्रतिशत के करीब है। उन्होंने जोर देते हुए कहा:

'यह कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। इतनी बड़ी आर्थिक हिस्सेदारी के कारण ही पूरी दुनिया को इस संगठन और इसके निर्णयों को बेहद गंभीरता से लेना पड़ता है।'

भारत की कूटनीतिक साख और मेजबानी के मायने

शशि थरूर ने भारत द्वारा इस शिखर सम्मेलन की मेजबानी किए जाने को देश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और कूटनीतिक जीत के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि इस सम्मेलन में केवल सदस्य देश ही नहीं, बल्कि विभिन्न पर्यवेक्षक राष्ट्रों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री स्तर के शीर्ष नेता भी भारत आ रहे हैं।

थरूर के अनुसार, इतने बड़े और प्रभावशाली देशों के राष्ट्राध्यक्षों का एक मंच पर एकत्रित होना भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव को दर्शाता है। अलग-अलग देशों को एक साझा मंच पर लाना और उनके बीच संवाद स्थापित करना भारत की बेहतरीन कूटनीतिक क्षमता का परिचायक है, जो अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।

BRICS के समक्ष खड़ी बड़ी कूटनीतिक चुनौतियां

यद्यपि शशि थरूर ने संगठन के महत्व को स्वीकार किया, लेकिन उन्होंने इसके सामने मौजूद गंभीर कूटनीतिक अड़चनों का जिक्र करने में भी संकोच नहीं किया। उनके अनुसार, BRICS के लिए सबसे बड़ी चुनौती विभिन्न मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच आम सहमति बनाना है। विशेष रूप से युद्ध और संघर्ष जैसी वैश्विक संकट की परिस्थितियों में यह बेहद मुश्किल हो जाता है। इसके प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं:

  • रूस-यूक्रेन संघर्ष और ईरान का मुद्दा: इन गंभीर वैश्विक संकटों को लेकर सदस्य देशों के अलग-अलग रुख के कारण अक्सर गतिरोध की स्थिति पैदा हो जाती है।
  • ईरान और UAE के बीच मतभेद: मई महीने में नई दिल्ली में आयोजित हुई BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान ईरान और UAE के आपसी विवाद खुलकर सामने आ गए थे। इस तनाव के चलते सदस्य देश किसी संयुक्त घोषणापत्र पर आम सहमति बनाने में पूरी तरह से विफल रहे थे।

आम सहमति न बनने पर भारत को उठाना पड़ा था यह कदम

शशि थरूर ने बताया कि पिछली विदेश मंत्रियों की बैठक में जब सदस्य देश किसी साझे बयान पर सहमत नहीं हो सके, तब भारत को BRICS के अध्यक्ष के रूप में आगे आना पड़ा। भारत ने इस गतिरोध को सुलझाने के लिए अपनी तरफ से अध्यक्षीय वक्तव्य यानी 'चेयर डिक्लेरेशन' जारी किया था।

थरूर ने आगामी सम्मेलन को लेकर भी एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि क्या इस बार भी ऐसी ही असहमतियों की स्थिति बनेगी? यदि आगामी सम्मेलन में भी राष्ट्रप्रमुख किसी साझे घोषणापत्र पर हस्ताक्षर नहीं कर पाते हैं, तो वैश्विक स्तर पर इसे BRICS के लिए एक बड़ा झटका माना जाएगा। दुनिया इसे सदस्य देशों के बीच के गहरे मतभेदों के रूप में देखेगी। ऐसे में विभिन्न परस्पर विरोधी देशों के नेताओं को संभालना और उनके बीच सहमति बनाना भारतीय कूटनीतिज्ञों के लिए एक कठिन परीक्षा होगी।

व्यापार असंतुलन और भारत की आर्थिक चिंताएं

आर्थिक मोर्चे पर भी शशि थरूर ने भारत के हितों को लेकर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि भले ही BRICS देशों के बीच आपसी व्यापार का दायरा निरंतर बढ़ रहा है, लेकिन भारत के संदर्भ में इसकी तस्वीर पूरी तरह सकारात्मक नहीं कही जा सकती।

उन्होंने स्पष्ट किया कि अन्य सदस्य देशों को होने वाले भारतीय निर्यात में कमी आई है, जबकि इसके उलट उन देशों से भारत में होने वाला आयात काफी बढ़ गया है। इस व्यापारिक असंतुलन के कारण भारत का व्यापार घाटा बढ़ रहा है, जो देश की अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से एक चिंताजनक संकेत है।

पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने उठाए थे तीखे सवाल

शशि थरूर के इस कूटनीतिक विश्लेषण से ठीक एक दिन पहले, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने BRICS के सम्मेलनों की सार्थकता पर कड़ा प्रहार किया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें पिछले दो-तीन BRICS सम्मेलनों से देश के हित में कोई ठोस या उल्लेखनीय परिणाम निकलता हुआ नहीं दिखाई दिया।

चिदंबरम ने समाचार एजेंसी ANI से बातचीत के दौरान कहा था कि भारत वर्तमान में G20, SCO, QUAD और BRICS जैसे कई बहुपक्षीय संगठनों का सदस्य है। ऐसे में यह सवाल पूछा जाना बेहद लाजिमी है कि इन संगठनों के मंचों से देश को वास्तव में क्या लाभ मिल रहा है। उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि हाल के सम्मेलनों से भारत को कोई बड़ा या ठोस फायदा हासिल हुआ है।

चिदंबरम के बयान पर BJP का पलटवार और आगामी सम्मेलन

पी. चिदंबरम के इस बयान के बाद देश की सियासत भी गरमा गई थी। BJP ने कांग्रेस नेता पर तंज कसते हुए उन्हें उस 'नाराज फूफा' की तरह बताया जो हर अच्छे काम में कमियां ढूंढने की कोशिश करते हैं। BJP का कहना था कि कांग्रेस देश की कूटनीतिक प्रगति और वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती धमक को स्वीकार नहीं कर पा रही है।

इस प्रकार, BRICS को लेकर कांग्रेस के दो बड़े नेताओं के विचार पूरी तरह से बंटे हुए नजर आ रहे हैं। एक तरफ जहां पी. चिदंबरम इसके ठोस नतीजों पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं, वहीं थरूर इसके कूटनीतिक महत्व और भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को आवश्यक बता रहे हैं।

गौरतलब है कि भारत आगामी 12 और 13 सितंबर को BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। इस महासम्मेलन में हिस्सा लेने आ रहे वैश्विक नेताओं के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की द्विपक्षीय वार्ताओं का विस्तृत कार्यक्रम भी तय हो चुका है।

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