80 पार है इस समुदाय के लोगों की औसत उम्र, बीमारियां रहती हैं कोसों दूर, जानें क्या है इनकी लंबी जिंदगी का राज

बिहार के पश्चिम चम्पारण में थारू समुदाय के लोग 80 से 85 वर्ष तक निरोग जीवन जी रहे हैं। उनका रहस्य प्राकृतिक आहार, कम तेल-मसाले का उपयोग और अनुशासित जीवनशैली है।

पश्चिम चम्पारण के थारू समुदाय की अनोखी जीवनशैली

आज के दौर में जहां दुनिया भर में इंसानों की औसत आयु 60 से 65 वर्ष के बीच सिमट कर रह गई है और लोग कम उम्र में ही गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं, वहीं बिहार के पश्चिम चम्पारण जिले में रहने वाला थारू समुदाय एक मिसाल पेश कर रहा है। यहां के निवासियों की औसत आयु 80 से 85 वर्ष के बीच है और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि वे इस उम्र में भी पूरी तरह निरोग और स्वस्थ जीवन व्यतीत कर रहे हैं। सुनने में यह किसी चमत्कार जैसा लग सकता है, लेकिन यह पूरी तरह से सत्य है।

थरुहट क्षेत्र का एक अनूठा उदाहरण

पश्चिम चम्पारण जिले के करीब 5 से 6 प्रखंडों में थारू जनजातियां बसी हुई हैं। इनकी बस्तियां मुख्य रूप से उन जंगलों के निकट स्थित हैं, जहां सामान्य लोगों का रहना काफी कठिन माना जाता है। विषम परिस्थितियों में रहते हुए भी थारू समुदाय ने प्रकृति के साथ एक ऐसा संतुलन बना लिया है, जिसने उन्हें लंबी और स्वस्थ आयु का वरदान दिया है। जिले के रामनगर प्रखंड स्थित थरुहट क्षेत्र में रहने वाले लोगों की जीवनशैली पर की गई एक विस्तृत पड़ताल से कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।

80 से 90 वर्ष की उम्र में भी पूर्ण स्वस्थ

रामनगर प्रखंड के थारू परसौनी गांव के पूर्व मुखिया अजय खतइत बताते हैं कि उनके गांव के लोगों की औसत उम्र 80 से 85 वर्ष के आसपास है। गांव में हाल ही में 110 वर्ष के एक बुजुर्ग का निधन हुआ है, जो इस समुदाय की दीर्घायु का स्पष्ट प्रमाण है। वर्तमान में भी गांव के अधिकांश वरिष्ठ नागरिक 80 से 90 वर्ष की अवस्था में हैं। इन बुजुर्गों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनकी आंखों की रोशनी आज भी तेज है और उन्हें पाचन संबंधी कोई भी समस्या नहीं होती है। वे अपनी इस उम्र में भी कई किलोमीटर पैदल जंगल की यात्रा करते हैं और घर के छोटे-मोटे कामों में पूरी तरह सक्रिय रहते हैं।

हर्ष नारायण महतो की जीवंत कहानी

इस स्वस्थ जीवनशैली का एक जीता-जागता उदाहरण 85 वर्ष से अधिक उम्र के हर्ष नारायण महतो हैं। इतनी अधिक उम्र होने के बावजूद, वे बिना किसी सहारे के अपनी दिनचर्या पूरी करते हैं। वे न केवल शारीरिक रूप से फिट हैं, बल्कि उनकी दृष्टि भी अत्यंत स्पष्ट है। वे अपनी उम्र के पड़ाव पर भी सामान्य रूप से भोजन करने और उसे पूरी तरह पचाने में सक्षम हैं। सुबह होते ही वे बिना किसी सहायता के घूमने निकल जाते हैं और अपना काम स्वयं पूरा करके वापस लौट आते हैं।

दीर्घायु का असली रहस्य: प्राकृतिक आहार

थारू समाज की इस फिटनेस का राज उनकी खान-पान की आदतों में छिपा है। उनका आहार पूरी तरह से प्राकृतिक और बिना किसी मिलावट वाला होता है। जंगल के निकट रहने के कारण वे पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर हैं। उनकी थाली में ताजी मछलियां, केकड़ा, घोंघा, सीप, बांस की सब्जी, आम के मंजर की सब्जी, भुटकी (जंगली मशरूम), कचनार के फूल की सब्जी, भूंजा और चेची (एक विशेष प्रकार का भात) जैसे पोषक तत्व शामिल होते हैं। ये सभी सामग्रियां सीधे जंगल या आसपास की नदियों और तालाबों से प्राप्त की जाती हैं।

कम तेल और मसालों का सीमित उपयोग

थारू लोग खाना पकाने के लिए बहुत ही कम तेल और मसालों का इस्तेमाल करते हैं। नदियों से पकड़ी गई ताजी मछलियां और तालाबों से निकाले गए केकड़े व घोंघे को घर लाकर बहुत ही सावधानी से साफ किया जाता है। इसके बाद, इन्हें बहुत कम मसाले के साथ भाप या धीमी आंच पर पकाया जाता है, जिससे उनकी पोषण शक्ति बनी रहती है। यह सादगीपूर्ण भोजन ही उनके शरीर को बीमारियों से दूर रखने में सहायक सिद्ध होता है।

चावल पकाने की अनूठी विधि

थारू समुदाय के लोगों के चावल पकाने का तरीका भी शहरों से बिल्कुल भिन्न है। वे चावल पकाते समय उसके माड़ को कभी भी अलग नहीं करते हैं। चावल को भाप (स्टीम) में पकाया जाता है, जिससे अनाज के सभी पोषक तत्व उसी में सुरक्षित रहते हैं। यह 'भाप वाला भात' उनके स्वास्थ्य का मुख्य आधार है। इसके अलावा, उनकी दिनचर्या में अनुशासन का बहुत महत्व है। थारू समुदाय के लोग अपना रात्रि का भोजन शाम 7 बजे तक समाप्त कर लेते हैं। सुबह वे नाश्ते की जगह भरपेट भोजन करना पसंद करते हैं, जिसमें चावल (भात) को सबसे अधिक प्राथमिकता दी जाती है।

निष्कर्ष

थारू समाज की जीवनशैली यह साबित करती है कि प्रकृति के निकट रहना और शुद्ध प्राकृतिक संसाधनों का सेवन करना ही लंबी आयु का एकमात्र मंत्र है। उनका कठोर परिश्रम और अनुशासन, आधुनिक दौर के उन लोगों के लिए एक बड़ी सीख है जो भागदौड़ भरी जिंदगी में अपने स्वास्थ्य को नजरअंदाज कर रहे हैं।

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