बिगैमी मामले पर तेलंगाना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, दूसरी शादी के आरोपों पर कोर्ट ने दी अहम टिप्पणी

तेलंगाना हाईकोर्ट ने धारा 494 के तहत दर्ज एक मामले में पति को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि द्विविवाह का आरोप साबित करने के लिए यह सिद्ध करना अनिवार्य है कि दूसरी शादी के समय पहली शादी कानूनी रूप से अस्तित्व में थी।

धारा 494 पर कोर्ट का कड़ा रुख

अक्सर देखा जाता है कि पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी करने पर पति के खिलाफ आईपीसी की धारा 494 यानी द्विविवाह का मामला तुरंत दर्ज कर दिया जाता है। लेकिन तेलंगाना हाईकोर्ट ने इस संबंध में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या दी है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि केवल यह साबित करना पर्याप्त नहीं है कि पहली शादी हुई थी और उसके बाद पति ने दूसरी महिला से विवाह किया। अभियोजन पक्ष को यह भी ठोस रूप से सिद्ध करना होगा कि जिस वक्त दूसरी शादी संपन्न हुई, उस समय पहली शादी कानूनी तौर पर पूरी तरह कायम थी। जस्टिस एन. तुकारामजी की सिंगल बेंच ने एक मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए पति के खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर और चल रही कानूनी कार्यवाही को पूरी तरह रद्द करने का आदेश दिया है।

क्या था पूरा मामला

इस मामले की शिकायतकर्ता महिला ने 28 फरवरी 2009 को मुस्लिम रीति-रिवाजों के अनुसार अपने पति के साथ विवाह किया था। महिला का आरोप था कि शादी के कुछ समय बाद ही उसे अतिरिक्त दहेज लाने के लिए दबाव बनाया गया और संतान न होने के कारण उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। महिला ने इसे लेकर पूर्व में अलग से आपराधिक शिकायत भी दर्ज कराई थी। विवाद तब और बढ़ गया जब महिला ने दावा किया कि उसके पति ने पहली शादी के अस्तित्व में रहते हुए ही 24 मई 2015 को किसी दूसरी महिला से शादी कर ली। इस घटना के आधार पर वर्ष 2021 में आईपीसी की धारा 494 के अंतर्गत पति के खिलाफ केस दर्ज किया गया और जांच के बाद चार्जशीट भी पेश कर दी गई।

पति की दलील और कानूनी स्थिति

हाईकोर्ट में पति के वकील ने अपना पक्ष रखते हुए तर्क दिया कि दूसरी शादी करने के समय पहली शादी का अस्तित्व कानून की नजर में समाप्त हो चुका था। वकील ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के प्रावधानों के तहत पहली शादी उस वक्त तक खत्म हो चुकी थी। इसलिए बचाव पक्ष का सीधा रुख यह था कि जब दूसरी शादी के दौरान पहली शादी कानूनी रूप से प्रभावी ही नहीं थी, तो धारा 494 के तहत बिगैमी यानी द्विविवाह का अपराध तकनीकी रूप से बनता ही नहीं है। इस आधार पर पति की ओर से दूसरी पत्नी पर लगे आरोपों को भी निरस्त करने की मांग की गई।

अभियोजन पक्ष का नजरिया

वही दूसरी ओर, पत्नी की तरफ से अदालत में पेश हुए असिस्टेंट पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ने कोर्ट के सामने यह तर्क रखा कि पहली शादी कानूनी रूप से खत्म हुई थी या नहीं, यह एक विवादित तथ्य है। उन्होंने जोर दिया कि इस तरह के जटिल सवालों का निपटारा हाई कोर्ट के स्तर पर करने के बजाय ट्रायल कोर्ट में साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर होना चाहिए। सरकारी पक्ष का मानना था कि जांच और सुनवाई को अभी बीच में नहीं रोकना चाहिए।

कोर्ट ने तय किए बिगैमी के मानक

मामले की गंभीरता को देखते हुए तेलंगाना हाईकोर्ट ने आईपीसी की धारा 494 के तहत अपराध गठित होने के लिए आवश्यक कानूनी शर्तों का बारीकी से विश्लेषण किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि द्विविवाह का अपराध तब तक सिद्ध नहीं माना जा सकता जब तक निम्नलिखित चार प्रमुख शर्तें पूरी न हों:

  • पहली शादी के समय संबंधित पति या पत्नी का जीवित होना आवश्यक है।
  • यह सिद्ध करना अनिवार्य है कि पहली शादी कानूनी रूप से वैध और पूरी तरह कायम थी।
  • पति या पत्नी द्वारा पहली शादी के रहते दूसरी शादी किया जाना।
  • यह साबित होना कि दूसरी शादी पहली शादी के अस्तित्व में होने के कारण कानून की नजर में शून्य या अवैध थी।

अदालत की इस टिप्पणी ने स्पष्ट कर दिया है कि बिगैमी के मामलों में केवल आरोपों का होना काफी नहीं है, बल्कि कानूनी अस्तित्व को साबित करना अभियोजन की बड़ी जिम्मेदारी है। इस फैसले के बाद से अब संबंधित मामलों में निचली अदालतों को भी कानूनी बारीकियों का ध्यान रखना होगा।

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