तनाव में डूबे ओरंगुटान: नंदनकानन चिड़ियाघर में शास्त्रीय संगीत का सहारा, विशेषज्ञों की चिंता बरकरार

बालासोर में रेस्क्यू किए गए दो ओरंगुटान फिलहाल भुवनेश्वर के नंदनकानन चिड़ियाघर में तनाव से जूझ रहे हैं, जिन्हें शांत करने के लिए विशेषज्ञों ने म्यूजिक थेरेपी और विशेष माहौल अपनाने का फैसला किया है।

तनाव के साये में ओरंगुटान

हाल ही में बालासोर से रेस्क्यू किए गए दो ओरंगुटान इस समय भुवनेश्वर स्थित नंदनकानन चिड़ियाघर में कड़ी निगरानी में रखे गए हैं। हालांकि, इन जानवरों को एक सुरक्षित ठिकाना मिल गया है, लेकिन उनकी मानसिक स्थिति अभी भी सामान्य नहीं हो पा रही है। चिड़ियाघर के अधिकारियों के अनुसार, ये ओरंगुटान गहरे तनाव में हैं, जिसका असर उनके व्यवहार और स्वास्थ्य पर साफ देखा जा सकता है। उनका मिजाज लगातार बदल रहा है और वे अपनी सामान्य आदतों के अनुसार खेल-कूद भी नहीं कर रहे हैं, जिसने वन्यजीव विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है।

नमूना संग्रह में देरी

नंदनकानन चिड़ियाघर में इन जानवरों का उपचार और सघन निगरानी की जा रही है। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि अधिक तनाव के कारण फिलहाल इनके रक्त के नमूने या अन्य मेडिकल सैंपल नहीं लिए जा सकते हैं। सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ हेल्थ कमेटी ने इस संबंध में परामर्श देते हुए कहा है कि जानवरों को शांत करना फिलहाल प्राथमिकता है। उम्मीद जताई जा रही है कि करीब 10 दिन बाद, जब दोनों ओरंगुटान नए माहौल में थोड़े सहज और तनावमुक्त हो जाएंगे, तब उनके आवश्यक मेडिकल परीक्षण के लिए सैंपल लिए जाएंगे। तब तक विशेषज्ञ लगातार उनके व्यवहार में आने वाले बदलावों पर नजर रखे हुए हैं।

मां से बिछड़ने का दर्द और मनोवैज्ञानिक असर

इन ओरंगुटान की स्थिति को समझने के लिए मैसूर चिड़ियाघर और वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के विशेषज्ञ गहन जांच कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन जानवरों का असामान्य व्यवहार सिर्फ जगह बदलने के कारण नहीं, बल्कि अपनी मां से दूर होने के गहरे सदमे का नतीजा भी हो सकता है। वन्यजीवों का अपने परिवार और प्राकृतिक परिवेश से एक गहरा जुड़ाव होता है, और अचानक इस अलगाव ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ दिया है। विशेषज्ञ यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि उनकी उदासी और चिड़चिड़ापन किस सीमा तक भावनात्मक आघात से जुड़ा है।

म्यूजिक थेरेपी और आरामदायक माहौल की कोशिश

तनाव कम करने के उद्देश्य से चिड़ियाघर प्रशासन कई तरह के प्रयास कर रहा है। ओरंगुटान को एक ऐसा वातावरण प्रदान किया जा रहा है जो उन्हें प्रकृति के करीब महसूस कराए। उन्हें मानसिक शांति देने के लिए अब शास्त्रीय संगीत जैसी म्यूजिक थेरेपी देने पर भी गंभीर विचार किया जा रहा है। माना जा रहा है कि संगीत की मधुर धुनें उन्हें शांत करने में मदद करेंगी। इसके अलावा, उनके एनक्लोजर में झूला भी लगाया गया है, ताकि वे शारीरिक रूप से सक्रिय रहें और खेल-खेल में अपने पुराने चंचल स्वभाव को वापस पा सकें। प्रशासन का पूरा ध्यान इस बात पर है कि वे सुरक्षित महसूस करें और धीरे-धीरे सामान्य जीवन में वापस लौटें।

सफर की थकान और स्वास्थ्य जोखिम

विशेषज्ञों को एक अन्य गंभीर आशंका भी सता रही है। इस बात की पूरी संभावना है कि तस्करी या अवैध परिवहन के दौरान, जब इन्हें पानी के रास्ते लाया गया, तब ये समुद्री हवा और खारे वातावरण के संपर्क में आए होंगे। इस लंबे और कष्टदायक सफर के कारण उन्हें सांस संबंधी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। डॉक्टर यह जांचने में जुटे हैं कि उनकी वर्तमान सुस्ती और परेशानी का कारण केवल मानसिक है या शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ा प्रतिकूल प्रभाव भी इसमें शामिल है।

तस्करी के जाल की जांच तेज

उधर, इन ओरंगुटान को अवैध रूप से लाने के मामले की जांच में तेजी आ गई है। स्पेशल टास्क फोर्स (STF) और वन विभाग की टीमें संयुक्त रूप से सक्रिय हैं। जांचकर्ताओं ने चांदनेश्वर और उदयपुर से लेकर दीघा तक करीब 45 CCTV कैमरों की फुटेज की बारीकी से जांच की है। दीघा मरीन पुलिस स्टेशन के पास के फुटेज से भी कुछ महत्वपूर्ण संकेत मिले हैं। वर्तमान में दो टीमें दीघा से कोलकाता की दिशा में छानबीन कर रही हैं। सिमिलिपाल के आरसीसीएफ प्रकाश चंद्र गोगिनेन के अनुसार, संदेह है कि इन्हें पश्चिम बंगाल से सड़क मार्ग के जरिए लाया गया होगा और नेशनल हाईवे से बचने के लिए अंदरूनी रास्तों का इस्तेमाल किया गया।

उच्च स्तरीय जांच और भविष्य की रणनीति

इस पूरे मामले में वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो की टीमें भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। भोपाल और कोलकाता स्थित टीमें इस नेटवर्क के बारे में खुफिया जानकारी जुटाने का काम कर रही हैं। राज्य के वन एवं पर्यावरण मंत्री ने कड़े शब्दों में कहा है कि इस अवैध कृत्य में शामिल दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। इसके साथ ही, नेशनल जू अथॉरिटी को एक आधिकारिक पत्र भेजा गया है, ताकि वे भी इस मामले में हस्तक्षेप करें। अथॉरिटी की टीम ओरंगुटान की शारीरिक स्थिति का जायजा लेगी और यह भी तय करेगी कि क्या वे ओडिशा के स्थानीय मौसम में रहने के लिए अनुकूल हैं या नहीं। फिलहाल सभी का एक ही लक्ष्य है कि इन मासूम जीवों को पूरी तरह स्वस्थ और सामान्य बनाया जाए।

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