पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्यों बन गया है सियासी रणभूमि, अखिलेश और जयंत के बाद अब नितिन नबीन ने संभाली कमान

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही राज्य में सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं, जहां पश्चिमी यूपी फिर से चुनावी केंद्र बनकर उभरा है। भाजपा अब अपने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने के लिए नितिन नबीन के जरिए नई रणनीति पर काम कर रही है।

राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बना पश्चिमी उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, प्रदेश की सियासत में हलचल तेज हो गई है। सत्तारूढ़ दल और विपक्षी खेमों के बीच चुनावी जंग की बिसात अब स्पष्ट रूप से बिछने लगी है। इस पूरी राजनीतिक कवायद में सबसे ज्यादा चर्चा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की हो रही है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव की सक्रियता और राष्ट्रीय लोक दल यानी आरएलडी चीफ जयंत चौधरी की रैलियों के बाद अब भारतीय जनता पार्टी ने भी अपने चुनावी अभियान को धार देना शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में अब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन का दौरा काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जो मेरठ से पार्टी की जमीनी तैयारियों का शंखनाद करने वाले हैं।

नितिन नबीन का मेरठ दौरा और संगठनात्मक रणनीति

प्राप्त जानकारी के अनुसार, नितिन नबीन 11 सितंबर को मेरठ के दौरे पर रहेंगे। यह दौरा केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से भाजपा अपने संगठनात्मक ढांचे को दुरुस्त करने का प्रयास कर रही है। मेरठ में वे पार्टी के सांसदों, विधायकों, मेयरों और जिलाध्यक्षों के साथ विस्तृत समीक्षा बैठक करेंगे। भाजपा का फोकस अब केवल मंच से भाषण देने या बड़ी जनसभाएं करने तक सीमित नहीं है, बल्कि पार्टी संगठन की जमीनी स्थिति को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है। इस दौरे का अगला चरण गाजियाबाद में भी निर्धारित है। पार्टी का स्पष्ट संदेश है कि 2027 का विधानसभा चुनाव केवल बड़े चेहरों के भरोसे नहीं, बल्कि बूथ स्तर की मजबूत मशीनरी के दम पर लड़ा जाएगा।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही शुरुआती बिंदु क्यों है

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश को चुनावी केंद्र बनाने का सीधा संबंध 2024 के लोकसभा चुनाव के परिणामों से है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए राजनीतिक और रणनीतिक रूप से एक बेहद संवेदनशील क्षेत्र रहा है। यहां किसान, जाट, मुस्लिम, गुर्जर, दलित और ओबीसी समुदायों का एक जटिल सामाजिक समीकरण है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को इस क्षेत्र में अप्रत्याशित नुकसान का सामना करना पड़ा था, जिसके कारण पार्टी का आंकड़ा घटकर महज 33 सीटों पर सिमट गया था। यही कारण है कि भाजपा 2027 से पहले उन इलाकों में अपनी पकड़ को दोबारा पुख्ता करना चाहती है, जहां उसे विपक्ष से कड़ी चुनौती मिली थी और जहां पार्टी का प्रदर्शन उम्मीद के अनुरूप नहीं रहा था।

अखिलेश यादव का पीडीए फॉर्मूला

समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने पश्चिमी यूपी को ही अपनी चुनावी रणनीति का केंद्र बनाया है। इसके पीछे मुख्य कारण उनका पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूला है। पश्चिमी यूपी में दलित और मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी आबादी है, साथ ही पिछड़ी जातियों का भी व्यापक प्रभाव है। अखिलेश यादव जानते हैं कि अगर वे इस सामाजिक समीकरण को मजबूती से जोड़ लेते हैं, तो भाजपा के लिए यहां चुनौती काफी बढ़ सकती है। इसी गणित को ध्यान में रखते हुए विपक्षी दलों ने इस क्षेत्र को अपनी गतिविधियों का मुख्य केंद्र बनाया है।

भाजपा की चुनौतियां और जयंत चौधरी की भूमिका

भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पारंपरिक वोट बैंक को सुरक्षित रखने के साथ-साथ उन सामाजिक समूहों में सेंधमारी रोकने की है, जहां 2024 में विपक्ष ने बढ़त बनाई थी। इस दिशा में आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी की सक्रियता भाजपा के लिए एक सकारात्मक मोड़ लेकर आई है। कभी अखिलेश यादव के साथ गठबंधन में रहने वाले जयंत चौधरी अब भाजपा के पाले में हैं। हाल ही में हुई स्वाभिमान रैली में जयंत चौधरी ने जिस तरह से अखिलेश यादव पर पलटवार किया, उससे साफ है कि पश्चिमी यूपी में सामाजिक समीकरणों को बदलने की पूरी तैयारी है। भाजपा अब जयंत चौधरी के चेहरे के जरिए विपक्ष के पुराने जातीय गठजोड़ को तोड़ने की कोशिश में है।

मिशन 2027 की जमीनी तैयारी

नितिन नबीन का यह दौरा केवल मेरठ के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे यूपी के लिए पार्टी की आगामी रणनीति का संकेत है। भाजपा अब सितंबर महीने से ही चुनावी मोड में पूरी तरह सक्रिय हो चुकी है। चर्चा है कि केंद्रीय नेतृत्व, जिसमें अमित शाह और बीएल संतोष जैसे दिग्गज शामिल हैं, वे भी जल्द ही उत्तर प्रदेश की चुनावी तैयारियों में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं। पार्टी का इरादा चुनाव की तारीखों का इंतजार करने के बजाय कम से कम छह महीने पहले ही संगठन को सक्रिय, सामाजिक समीकरणों को अनुकूल और स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता देने का है। यह साफ है कि आने वाले समय में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत और भी दिलचस्प होने वाली है, जहां भाजपा अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है, वहीं विपक्षी दल भी अपनी बढ़त को कायम रखने की जद्दोजहद में जुटे हैं।

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