हरतालिका तीज का महत्व और तिथि
धार्मिक मान्यताओं और पूजा-पाठ के दौरान सही विधि-विधान का पालन करना अत्यंत आवश्यक माना जाता है। भक्तों का ऐसा मानना है कि यदि पूरी श्रद्धा और नियमानुसार अनुष्ठान न किया जाए, तो पूजा का अपेक्षित फल प्राप्त नहीं होता है। बहुत जल्द हरतालिका तीज का पावन पर्व आने वाला है, जो सुहागिन महिलाओं के लिए साल के सबसे महत्वपूर्ण व्रतों में से एक माना जाता है। विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए यह कठिन व्रत रखती हैं। वहीं, कुंवारी कन्याएं भी मनचाहा जीवनसाथी पाने की आस में पूरी निष्ठा के साथ भगवान शिव और माता पार्वती की अराधना करती हैं।
साल 2026 में हरतालिका तीज का व्रत 14 सितंबर, सोमवार के दिन मनाया जाएगा। इस वर्ष का तीज व्रत भक्तों के लिए एक विशेष संयोग लेकर आ रहा है, जिसे लेकर लोगों में काफी उत्साह है।
गणेश चतुर्थी के साथ अद्भुत संयोग
देवघर के पागलबाबा आश्रम स्थित मुदगल ज्योतिष केंद्र के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित नंद किशोर मुदगल ने इस पर्व के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इस साल हरतालिका तीज के दिन ही गणेश चतुर्थी का व्रत भी पड़ रहा है। यह एक अत्यंत दुर्लभ और शुभ संयोग है। इसका अर्थ यह है कि इस दिन श्रद्धालु एक साथ भगवान शिव, माता पार्वती और प्रथम पूज्य भगवान गणेश की भक्ति में लीन रहेंगे। ज्योतिषाचार्य के अनुसार, यह दिन आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से बहुत प्रभावशाली है। जो महिलाएं विशेष रूप से पहली बार हरतालिका तीज का व्रत करने जा रही हैं, उन्हें पूजा के सभी आवश्यक नियमों का पालन पूरी सावधानी से करना चाहिए।
क्या करें और क्या न करें
पंडित नंद किशोर मुदगल ने व्रत को लेकर कुछ महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। उनके अनुसार, यह व्रत पूर्ण रूप से सात्विक और शुद्ध मन के साथ संपन्न करना चाहिए। व्रती महिलाओं को इस दिन काले रंग के वस्त्र पहनने से पूरी तरह बचना चाहिए। पूजा-पाठ के दौरान भी किसी भी ऐसी वस्तु का उपयोग नहीं करना चाहिए जो काले रंग की हो।
मन की शांति बनाए रखना इस व्रत का सबसे बड़ा नियम है। पूजा के दौरान मन में किसी के प्रति भी क्रोध, द्वेष या कोई भी नकारात्मक भावना नहीं आनी चाहिए। इसके विपरीत, महिलाओं को पूजा के समय लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए। हिंदू धर्म में लाल और पीले रंग को अत्यंत शुभ और मंगलकारी माना गया है, इसलिए पूजा की सामग्री और वस्त्रों में इनका प्रयोग विशेष रूप से फलदायी होता है।
पूजा की विधि और तैयारी
ज्योतिषाचार्य ने स्पष्ट किया कि व्रत की तैयारी मुख्य तिथि से एक दिन पहले यानी 13 सितंबर से ही शुरू हो जानी चाहिए। श्रद्धालु इस दिन पवित्र बालू से भगवान शिव का पार्थिव शिवलिंग तैयार कर सकते हैं और माता पार्वती की प्रतिमा स्थापित कर सकते हैं। इसके अगले दिन यानी 14 सितंबर को पूरे विधि-विधान और षोडशोपचार पद्धति से शिव परिवार की पूजा-अर्चना की जानी चाहिए।
पूजा में माता पार्वती को नए वस्त्र और श्रृंगार का सामान अर्पित करना बहुत शुभ माना जाता है। महिलाएं अपनी सामर्थ्य और श्रद्धा के अनुसार सुहाग की सामग्री माता को समर्पित कर सकती हैं और उनसे अपने अखंड सौभाग्य एवं परिवार में सुख-शांति की प्रार्थना कर सकती हैं।
रात्रि जागरण का महत्व
हरतालिका तीज के व्रत के नियमों में रात्रि जागरण का अपना एक अलग ही स्थान है। पंडित नंद किशोर मुदगल के अनुसार, इस व्रत वाले दिन दिन में सोना या रात को सोना वर्जित माना गया है। व्रत रखने वाली महिलाओं को दिन और रात दोनों समय विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए। परंपरा के अनुसार, रात्रि में जागरण कर भगवान शिव और माता पार्वती का स्मरण करना चाहिए। बहुत से स्थानों पर रात भर भजन-कीर्तन और भक्ति गीतों के माध्यम से समय बिताने की समृद्ध परंपरा भी है।
व्रत का पारण
व्रत का समापन यानी पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद ही किया जाता है। ज्योतिषाचार्य के अनुसार, व्रत खोलने से पूर्व माता पार्वती को सिंदूर अर्पित करना अनिवार्य है। सिंदूर अर्पण करने के बाद ही पूरी विधि से पूजा संपन्न करें और उसके पश्चात ही अन्न-जल ग्रहण कर व्रत का पारण करें।
निष्कर्षतः, हरतालिका तीज केवल एक व्रत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भगवान शिव और माता पार्वती के अटूट प्रेम, अटूट विश्वास और कठिन तपस्या का जीवंत प्रतीक है। जो महिलाएं पहली बार यह व्रत कर रही हैं, उन्हें इन सभी नियमों का ध्यान रखते हुए सात्विक भाव से पूजा करनी चाहिए ताकि भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद सदैव उन पर बना रहे।
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