न्यायपालिका और विकास का अंतर्संबंध
नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की मेजबानी में आयोजित BRICS चीफ जस्टिस फोरम के दूसरे दिन भारत के प्रधान न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत ने न्याय प्रणाली की भूमिका को एक नई दृष्टि से परिभाषित किया। इस महत्वपूर्ण आयोजन में दुनिया भर की उभरती अर्थव्यवस्थाओं के शीर्ष न्यायिक अधिकारी एकत्रित हुए थे। सीजेआई सूर्यकांत ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि आज की न्यायपालिका केवल कानूनों का पालन कराने वाली संस्था नहीं है, बल्कि वह वैश्विक विकास और साझा समृद्धि की नींव है। उन्होंने जोर दिया कि यह मंच केवल कानूनी चर्चा का केंद्र नहीं, बल्कि आधुनिक समय का एक ऐसा ताना-बाना है जिसमें प्राचीन परंपराओं के धागे पिरोए गए हैं।
नालंदा की ऐतिहासिक सीख
सीजेआई सूर्यकांत ने अपने संबोधन में भारत की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत और विशेष रूप से नालंदा विश्वविद्यालय का उल्लेख किया। उन्होंने याद दिलाया कि एक हजार साल से भी पहले नालंदा दुनिया भर के विचारकों के लिए एक ऐसा केंद्र था जहाँ कोरिया, चीन, तिब्बत, फारस और दक्षिण-पूर्व एशिया के समुद्री क्षेत्रों से विद्वान संवाद के लिए आते थे। उन्होंने नालंदा की महान धर्मगंज लाइब्रेरी का जिक्र किया, जिसके बारे में कहा जाता है कि वहां करीब 90 लाख पांडुलिपियां मौजूद थीं। सीजेआई ने बताया कि नालंदा की वास्तविक ख्याति उसके ज्ञान भंडार से कहीं अधिक उसकी खुलापन और सहिष्णुता की संस्कृति में थी। वहां किसी भी विद्वान के लिए यह शर्त नहीं थी कि वह किसी विशिष्ट दर्शन या विचारधारा से सहमत हो। नालंदा एक ऐसा खुला मंच था जहाँ असहमति, बहस और विचार-विमर्श का स्वागत किया जाता था। उन्होंने कहा कि आज के दौर में BRICS मंच जिस तरह विभिन्न न्यायिक प्रणालियों को एक साथ लाकर साझा समाधान खोजने का प्रयास कर रहा है, वह असल में नालंदा की उसी समावेशी परंपरा का एक आधुनिक स्वरूप है।
न्यायपालिका को बताया विकास का इंजन
BRICS देशों की प्रगति का उल्लेख करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने आर्थिक उन्नति, आधुनिक तकनीक, विवाद समाधान और सतत ऊर्जा को विकास के प्रमुख इंजन बताया। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इन चारों को अलग-अलग इकाइयों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इन सभी की सफलता एक ही बुनियादी स्तंभ पर टिकी है और वह है समय पर मिलने वाला और भरोसेमंद न्याय। सीजेआई सूर्यकांत ने न्यायपालिका की तुलना एक इमारत की मजबूत दीवारों से की। उन्होंने समझाया कि जिस प्रकार वास्तुकार अपनी प्रचार सामग्री में भले ही नींव की दीवारों को प्रमुखता से न दिखाएं, लेकिन पूरी इमारत का भार उन्हीं पर टिका होता है। न्यायपालिका भी किसी देश की ऐसी ही अदृश्य दीवार है, जिसके बिना विकास की पूरी इमारत खड़ी नहीं हो सकती।
निवेश और अदृश्य लागत का सीधा गणित
सीजेआई सूर्यकांत ने एक बेहद महत्वपूर्ण और व्यावहारिक बिंदु उठाते हुए न्याय व्यवस्था और विदेशी निवेश के बीच के बारीक संबंध को समझाया। उन्होंने कहा कि जब किसी विदेशी निवेशक को यह स्पष्ट नहीं होता कि किसी देश में उसका कानूनी विवाद कितनी निष्पक्षता और गति से सुलझेगा, तो वह अपने निवेश के सौदे में अतिरिक्त जोखिम जोड़ लेता है। इसके परिणाम जोखिम प्रीमियम, भारी सुरक्षा उपायों और कड़े एग्जिट क्लॉज के रूप में सामने आते हैं। सीजेआई के अनुसार, यह कारोबार की एक छिपी हुई लागत है जिसे किसी संसद ने कानून के जरिए तो नहीं लगाया, लेकिन अंततः निवेशक को अपनी जेब से चुकानी पड़ती है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि जो अदालतें तेजी से, पारदर्शी तरीके से और भरोसेमंद फैसले देती हैं, वे इस अदृश्य लागत को न्यूनतम कर देती हैं। इसलिए, एक मजबूत न्यायिक ढांचा केवल संविधान की रक्षा का साधन नहीं, बल्कि वैश्विक निवेश को आकर्षित करने और आर्थिक विकास को गति देने का एक सशक्त आधार है।
न्यायिक सहयोग का साझा भविष्य
अपने संबोधन के अंत में मुख्य न्यायाधीश ने इस बात को रेखांकित किया कि भले ही अलग-अलग देशों के कानून, संस्कृतियां और शासन प्रणालियां भिन्न हैं, लेकिन न्यायपालिका का अंतिम ध्येय एक समान है। वह लक्ष्य है एक ऐसे भविष्य का निर्माण करना जहाँ समृद्धि कुछ देशों या कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित न रहकर वैश्विक स्तर पर साझा की जाए। उन्होंने कहा कि न्याय के स्थायी मूल्यों के माध्यम से ही आज के तेजी से बदलते समय की चुनौतीपूर्ण समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है। सीजेआई सूर्यकांत का संदेश स्पष्ट था कि न्याय के जरिए ही हम मानवता के लिए एक ऐसे मार्ग का निर्माण कर सकते हैं जहाँ विकास की धारा बिना किसी बाधा के शांति और स्थिरता के महासागर तक पहुँच सके।
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