धान की फसल पर मंडराया ब्लास्ट बीमारी का खतरा, बदलता मौसम बन रहा है बड़ी मुसीबत

छत्तीसगढ़ में लगातार बारिश और गिरते तापमान के बीच धान की फसल में ब्लास्ट रोग के लक्षण देखे जा रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को फसल की नियमित निगरानी करने और समय रहते उचित उपचार अपनाने की सलाह दी है।

धान की खेती पर मौसमी मार

छत्तीसगढ़ राज्य में पिछले कुछ दिनों से हो रही मूसलाधार बारिश और वातावरण में घुल रही नमी ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। बारिश के दौर के बाद अब मौसम में बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां धूप निकलने के साथ ही रात के समय तापमान में गिरावट दर्ज की जा रही है। मौसम की यह अनिश्चितता धान की फसल के लिए बेहद खतरनाक साबित हो रही है, क्योंकि यही स्थिति ब्लास्ट यानी झुलसा बीमारी के पनपने के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। यदि समय रहते इस रोग पर नियंत्रण नहीं पाया गया, तो यह पूरी फसल को नष्ट कर सकती है और किसानों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।

ब्लास्ट बीमारी की पहचान कैसे करें

बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल कृषि महाविद्यालय, बिलासपुर के प्रख्यात कृषि रोग विशेषज्ञ डॉ. विनोद निर्मलकर ने बताया कि किसान खेतों में जाकर खुद ही इस बीमारी की शुरुआती लक्षणों को पहचान सकते हैं। ब्लास्ट रोग का सबसे मुख्य लक्षण धान की पत्तियों पर दिखाई देता है। पत्तियों पर छोटे-छोटे धब्बे बनने लगते हैं जो धीरे-धीरे आंख या फिर नाव के आकार में फैलने लगते हैं। इन धब्बों की बनावट काफी विशिष्ट होती है। धब्बे का केंद्र भाग घास या पुआल जैसा मटमैला दिखाई देता है, जबकि इन धब्बों के चारों ओर का घेरा गहरे ईंट के रंग का नजर आता है। अगर शुरुआती दौर में इन पर ध्यान न दिया जाए, तो ये धब्बे आपस में मिल जाते हैं और धीरे-धीरे पूरी पत्ती सूखकर झुलस जाती है, जिससे पौधे की प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया प्रभावित होती है।

बीमारी फैलने के अनुकूल कारण

डॉ. निर्मलकर के अनुसार, ब्लास्ट बीमारी के तेजी से फैलने के पीछे कुछ विशेष परिस्थितियां जिम्मेदार हैं। लगातार बारिश के बाद जब खेत में पानी भरा रहता है और नमी का स्तर अधिक बना रहता है, तब यह रोग पनपने लगता है। इसके अलावा दिन के समय हवा में अधिक उमस और रात के समय तापमान में अचानक आई कमी इस फफूंद जनित बीमारी को और अधिक बढ़ावा देती है। जब बारिश के बाद अचानक तेज धूप निकलती है, तो वातावरण में जो नमी का संतुलन बनता है, वह इस रोग के जीवाणुओं के लिए सबसे अनुकूल स्थिति होती है। ऐसे में फसल की निरंतर निगरानी करना ही बचाव का एकमात्र प्रभावी तरीका है।

बीज उपचार से सुरक्षा की शुरुआत

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि फसल का प्रबंधन अंतिम समय पर करने के बजाय शुरुआत से ही करना चाहिए। धान की बुवाई करने से पहले ही बीजों का उपचार करना अत्यंत आवश्यक है। किसानों को चाहिए कि वे अनुशंसित रासायनिक और जैविक दवाओं का उपयोग करके बीजों को उपचारित करें। इसके साथ ही, खेत की तैयारी करते समय रोग प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव करना चाहिए। पौधों को रोपित करते समय उनके बीच एक निश्चित और उचित अंतराल बनाए रखने से भी बीमारी का संक्रमण कम फैलता है। खेत में संतुलित उर्वरकों का प्रबंधन भी पौधों को मजबूत बनाता है और उन्हें बीमारियों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है।

जैविक विधियों से नियंत्रण

यदि खड़ी फसल में बीमारी के प्रारंभिक लक्षण दिखाई देने लगें, तो किसान घबराने के बजाय जैविक उपायों को प्राथमिकता दे सकते हैं। डॉ. विनोद निर्मलकर के अनुसार, ट्राइकोडर्मा और स्यूडोमोनास जैसे जैविक एजेंट इस बीमारी के लिए रामबाण हो सकते हैं। इन जैविक एजेंटों का मिश्रण तैयार कर लगभग 10 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के अनुपात में मिलाकर पौधों पर छिड़काव किया जाना चाहिए। यदि रोग का प्रभाव बना रहता है, तो आवश्यकतानुसार 15 से 20 दिनों के अंतराल पर दोबारा छिड़काव किया जा सकता है। यह विधि न केवल प्रभावी है बल्कि मिट्टी की उर्वरता को भी बनाए रखती है।

गंभीर स्थिति में रासायनिक उपचार का विकल्प

जब बीमारी का प्रकोप व्यापक हो जाए और जैविक तरीके कारगर साबित न हों, तब किसानों को विशेषज्ञ की सलाह के आधार पर रासायनिक फफूंदनाशकों का उपयोग करना चाहिए। ट्राईसाईक्लाजोले आधारित दवाएं बाजार में कई ब्रांड नामों से उपलब्ध हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि इसका घोल बनाने के लिए 6 ग्राम दवा प्रति 10 लीटर पानी में मिलाया जा सकता है। इसे प्रति एकड़ 120 ग्राम की मात्रा में उपयोग करना उचित रहता है। यदि खेत में बीमारी का प्रसार ज्यादा है, तो 12 से 15 दिनों के बाद दोबारा छिड़काव की आवश्यकता पड़ सकती है।

छिड़काव में इन बातों का रखें ध्यान

फसल सुरक्षा के लिए केवल दवा का चुनाव ही काफी नहीं है, बल्कि उसके छिड़काव का तरीका भी मायने रखता है। टेबुकोनाजोल और ट्राइफ्लॉक्सीस्ट्रोबिन के मिश्रण वाली दवाओं का उपयोग भी ब्लास्ट के नियंत्रण में बेहद प्रभावी माना गया है। किसान प्रति एकड़ लगभग 100 ग्राम की दर से इसका छिड़काव कर सकते हैं। विशेषज्ञ ने इस बात पर जोर दिया है कि प्रति एकड़ कम से कम 200 लीटर पानी का उपयोग करना चाहिए ताकि दवा का घोल धान के हर हिस्से पर सही ढंग से पहुंच सके। सही तरीके से छिड़काव करने पर ही फसल को बेहतर सुरक्षा मिल पाएगी। समय रहते पहचान और तुरंत उपचार ही वह उपाय है जो किसान की मेहनत को बर्बाद होने से बचा सकता है।

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