टेनिस की दुनिया को एक नई चैंपियन मिल गई है। रूस की 19 वर्षीय सनसनी मिरा एंड्रीवा ने शनिवार को इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करा लिया। उन्होंने पोलैंड की माजा च्वालिंस्का को सीधे सेटों में मात देते हुए फ्रेंच ओपन का महिला एकल खिताब अपने नाम कर लिया। यह एंड्रीवा के करियर की पहली ग्रैंड स्लैम ट्रॉफी है, और इस जीत के साथ उन्होंने टेनिस जगत में अपने दमदार आगमन का ऐलान कर दिया है।
लगभग डेढ़ घंटे चले इस एकतरफा फाइनल में आठवीं वरीयता प्राप्त एंड्रीवा ने च्वालिंस्का को 6-3, 6-2 से शिकस्त दी। पूरे मुकाबले में रूसी खिलाड़ी की ताकतवर बेसलाइन हिटिंग और आक्रामक तेवरों के आगे उनकी प्रतिद्वंद्वी को वापसी का कोई मौका नहीं मिला।
तीन दशक बाद टूटा रिकॉर्ड
सिर्फ 19 साल की उम्र में पेरिस की चमचमाती ट्रॉफी उठाकर मिरा एंड्रीवा पिछले तीन दशक से भी अधिक समय में रोलां गैरो जीतने वाली सबसे कम उम्र की खिलाड़ी बन गई हैं। उनसे पहले 1992 में महान खिलाड़ी मोनिका सेलेस ने महज 18 वर्ष की उम्र में अपना लगातार तीसरा फ्रेंच ओपन खिताब जीता था। इतने वर्षों बाद इस कारनामे को दोहराकर एंड्रीवा ने यह जता दिया है कि वे महिला टेनिस का भविष्य हैं।
क्वालीफायर च्वालिंस्का का सपना अधूरा
दूसरी ओर, क्वालीफायर के तौर पर मुख्य ड्रॉ में जगह बनाकर फाइनल तक का सफर तय करने वाली माजा च्वालिंस्का के सामने भी इतिहास रचने का सुनहरा अवसर था। वे रोलां गैरो के इतिहास में खिताब जीतने वाली पहली क्वालीफायर बनने की दहलीज पर खड़ी थीं, लेकिन एंड्रीवा के प्रचंड फॉर्म ने उनका यह सपना तोड़ दिया। हालांकि उपविजेता रहने के बावजूद च्वालिंस्का ने अपने शानदार प्रदर्शन से दर्शकों का दिल जीत लिया।
पूरे टूर्नामेंट में दिखा 'बुलडोजर' अंदाज
इस खिताबी मुकाबले में एंड्रीवा को जीत का प्रबल दावेदार माना जा रहा था। उन्होंने जिस अंदाज में पूरा टूर्नामेंट खेला, उसे 'बुलडोजर' प्रदर्शन कहना गलत नहीं होगा। फाइनल से पहले के अपने आखिरी तीन मैचों में उन्होंने सिर्फ 12 गेम गंवाए थे। कोर्ट पर उतरते ही यह साफ झलकता था कि वे एक भावी ग्रैंड स्लैम चैंपियन की तरह खेल रही हैं।
फाइनल में भी कहानी कुछ अलग नहीं रही। च्वालिंस्का ने शुरुआत में टक्कर देने की कोशिश जरूर की, लेकिन एंड्रीवा के बेसलाइन शॉट्स की रफ्तार और रैलियों पर नियंत्रण रखने की काबिलियत के सामने वे बेबस नजर आईं। रूसी खिलाड़ी ने मैच पर इतनी मजबूत पकड़ बनाए रखी कि च्वालिंस्का को दबाव से उबरने का कोई रास्ता ही नहीं मिला।
दो साल की मेहनत का मिला फल
मिरा एंड्रीवा दो साल पहले भी चर्चा में आई थीं, जब उन्होंने महज 17 साल की उम्र में रोलां गैरो के सेमीफाइनल तक का सफर तय किया था। उस वक्त दुनिया ने उनकी प्रतिभा को पहचाना तो था, लेकिन वे खिताब तक नहीं पहुंच पाई थीं। दो साल बाद उसी लाल मिट्टी (क्ले कोर्ट) पर उन्होंने अपनी अधूरी कहानी पूरी कर दी। ऐतिहासिक जीत के बाद उन्होंने स्वीकार किया कि बीते दो वर्षों में उनके खेल और मानसिक नजरिए में काफी बदलाव आया है।
दबाव को बना लिया अपनी ताकत
जैसे-जैसे कोई खिलाड़ी तेजी से सफलता की सीढ़ियां चढ़ता है, उसके कंधों पर उम्मीदों का बोझ भी बढ़ता जाता है। एंड्रीवा के साथ भी ऐसा ही हुआ, लेकिन उनकी सबसे बड़ी खूबी यह रही कि उन्होंने इन अपेक्षाओं और दबाव को खुद पर हावी नहीं होने दिया। टूर्नामेंट के दौरान वे लगातार शांत और आत्मविश्वास से भरी नजर आईं।
इस खिताबी जीत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे न सिर्फ शारीरिक, बल्कि मानसिक रूप से भी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों को चुनौती देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। यह भले ही उनका पहला ग्रैंड स्लैम खिताब है, लेकिन उनके खेल का स्तर देखकर टेनिस विशेषज्ञों का मानना है कि यह तो एक महान करियर की महज शुरुआत भर है।
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