धान की नर्सरी में मेढ़ विधि अपनाएं और पाएं बंपर पैदावार, कृषि वैज्ञानिक डॉ. मौर्या ने बताए 3 खास सूत्र

भोजपुर के कृषि वैज्ञानिक डॉ. ए. के. मौर्या ने धान सीजन में किसानों को पारंपरिक तरीका छोड़कर नर्सरी में मेढ़ विधि अपनाने, बीज उपचार करने और बेहतर पोषण प्रबंधन करने की सलाह दी है। इससे स्वस्थ बिचड़ा तैयार होगा और फसल की पैदावार बढ़ेगी।

धान की खेती का मौसम शुरू होते ही किसान अब नर्सरी तैयार करने में जुट गए हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि अगर किसान धान की नर्सरी के लिए पारंपरिक समतल खेत के बजाय मेढ़ विधि को अपनाएं तो उन्हें बेहतर गुणवत्ता का बिचड़ा मिलेगा और रोपाई के बाद फसल की बढ़वार भी अच्छी होती है।

बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के कृषि वैज्ञानिक डॉ. ए. के. मौर्या के अनुसार, मेढ़ विधि से तैयार की गई नर्सरी न केवल पौधों को स्वस्थ रखती है, बल्कि बारिश के दिनों में आने वाली कई परेशानियों से भी बचाव करती है। उन्होंने धान सीजन को लेकर किसानों के लिए कुछ अहम सुझाव साझा किए हैं।

नर्सरी तैयार करने से पहले इन बातों का रखें ध्यान

डॉ. मौर्या बताते हैं कि नर्सरी डालने से पहले खेत का चुनाव ऐसी जगह करना चाहिए जहां जल निकासी अच्छी हो। इसके बाद खेत में करीब एक से डेढ़ मीटर चौड़ी और जरूरत के मुताबिक लंबी उठी हुई क्यारियां यानी मेढ़ बनाई जाती हैं।

मेढ़ की ऊंचाई इतनी रखनी चाहिए कि अधिक बारिश होने पर भी पानी क्यारी के ऊपर न ठहरे। इस तरीके में बीजों को एक समान बिखेरा जाता है, ताकि हर पौधे को पर्याप्त जगह और पोषण मिल सके।

बीज उपचार है बेहद जरूरी

वैज्ञानिकों के मुताबिक नर्सरी में बीज डालने से पहले बीज उपचार जरूर करना चाहिए। इसके लिए किसान कार्बेन्डाजिम, स्ट्रेप्टोसाइक्लिन या अन्य अनुशंसित फफूंदनाशकों का इस्तेमाल कर सकते हैं।

बीज उपचार करने से पौधों में रोग लगने की आशंका काफी हद तक घट जाती है और अंकुरण प्रतिशत भी बढ़ता है, जिससे शुरुआत से ही फसल मजबूत बनती है।

मेढ़ विधि का सबसे बड़ा लाभ

इस विधि का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें जल निकासी की व्यवस्था बेहतर रहती है। सामान्य नर्सरी में लगातार बारिश होने पर पानी जमा हो जाता है, जिससे पौधों की जड़ें कमजोर पड़ जाती हैं और कई तरह के रोग लगने का खतरा बढ़ जाता है।

वहीं मेढ़ पर तैयार की गई नर्सरी से अतिरिक्त पानी आसानी से निकल जाता है, जिससे पौधों का विकास अच्छा होता है। इसके साथ ही जड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती है और उनकी बढ़त मजबूत होती है। ऐसे पौधे रोपाई के बाद जल्दी स्थापित होते हैं और खेत में तेजी से बढ़ते हैं।

पोषण प्रबंधन पर भी दें ध्यान

कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि नर्सरी में बेहतर पोषण प्रबंधन भी उतना ही जरूरी है। इसके लिए बीजों को पीएसबी यानी फॉस्फोरस सॉल्युबिलाइजिंग बैक्टीरिया और एजोटोबैक्टर से उपचारित किया जा सकता है।

इससे पौधों को फॉस्फोरस और नाइट्रोजन की उपलब्धता बढ़ जाती है और रासायनिक उर्वरकों की जरूरत भी कम होती है। मेढ़ विधि से तैयार पौधे अधिक हरे-भरे और मजबूत होते हैं, जिससे रोपाई के समय किसानों को गुणवत्तापूर्ण बिचड़ा मिलता है।

वैज्ञानिक तकनीक अपनाने की जरूरत

डॉ. ए. के. मौर्या का कहना है कि मौजूदा समय में किसानों को वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाने की जरूरत है। धान की नर्सरी में मेढ़ विधि एक सरल, कम लागत और अधिक लाभ देने वाली तकनीक है।

अगर किसान इसी विधि से नर्सरी तैयार करें, बीज उपचार पर ध्यान दें और पोषक तत्वों का सही प्रबंधन करें, तो उन्हें स्वस्थ पौधे मिलेंगे और अंततः धान की उपज में भी अच्छी बढ़ोतरी होगी।

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