रक्षाबंधन से गणेश चतुर्थी तक सिरोही में छाई रबड़ी घेवर की बहार, जानिए क्यों है इसकी इतनी भारी मांग

सिरोही में त्योहारी सीजन के दौरान पारंपरिक राजस्थानी रबड़ी घेवर की मांग तेजी से बढ़ गई है, जिसकी कीमत बाजार में 400 से 900 रुपये प्रति किलो तक है।

मानसून की फुहारों और त्योहारों के आगमन के साथ ही राजस्थान के सिरोही जिले में मिठाइयों की खुशबू महकने लगी है। जुलाई से लेकर सितंबर महीने तक चलने वाले इस त्योहारी सीजन में सिरोही में रबड़ी घेवर की मांग अचानक बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। रक्षाबंधन, जन्माष्टमी और फिर गणेश चतुर्थी के त्योहारों पर यहां के घरों में विशेष रूप से रबड़ी घेवर को मंगाया जाता है। इस मिठाई की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केवल स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि आबू रोड और माउंट आबू आने वाले गुजराती पर्यटक भी इस पारंपरिक राजस्थानी मिठाई का स्वाद लिए बिना वापस नहीं जाते।

आखिर क्यों इतनी खास है सिरोही की यह पारंपरिक मिठाई?

त्योहारों के इस मौसम में सिरोही जिला मुख्यालय सहित पूरे क्षेत्र के बाजारों में मिठाई की दुकानों पर घेवर के बड़े-बड़े थाल सजे दिखाई देते हैं। स्थानीय हलवाई मोहनलाल बताते हैं कि वैसे तो घेवर कई अलग-अलग किस्मों और गुणवत्ता में तैयार किए जाते हैं, लेकिन इस पूरे इलाके में राजस्थानी रबड़ी घेवर की मांग सबसे अधिक रहती है। इस मिठाई की खासियत इसकी बनावट में छिपी है। इसके ऊपर मलाईदार रबड़ी का बेहद नरम टेक्सचर होता है, जबकि नीचे का हिस्सा एकदम कुरकुरा और जालीदार घेवर का होता है। इसके ऊपर काजू, बादाम और अन्य सूखे मेवों की शानदार सजावट की जाती है, जो इसके स्वाद को कई गुना बढ़ा देती है।

कदम-दर-कदम: जानिए कैसे तैयार होता है स्वादिष्ट रबड़ी घेवर

इस लाजवाब मिठाई को बनाने की प्रक्रिया काफी जटिल और कलात्मक है। हलवाई मोहनलाल के अनुसार, इसे मुख्य रूप से निम्नलिखित चरणों में तैयार किया जाता है:

  • रबड़ी तैयार करना: सबसे पहले एक बड़ी कढ़ाई में शुद्ध दूध को अच्छी तरह उबाला जाता है। उबलते समय मलाई को लगातार खुरचकर अलग किया जाता है। जब दूध उबलते-उबलते अपनी मूल मात्रा का केवल एक तिहाई रह जाता है, तब उसमें चीनी और इलायची का पाउडर मिलाया जाता है। इसके बाद इसे ठंडा होने के लिए फ्रिज में रख दिया जाता है।
  • चाशनी बनाना: दूसरे चरण में घेवर के लिए मीठी चाशनी तैयार की जाती है। इसके लिए चीनी में उसकी आधी मात्रा के बराबर पानी मिलाकर उसे तब तक उबाला जाता है जब तक कि चीनी पानी में पूरी तरह घुल न जाए। इस चाशनी को और अधिक खुशबूदार बनाने के लिए इसमें इलायची का पाउडर और केसर मिलाया जाता है।
  • घेवर का बेस बनाना: यह इस मिठाई का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे बनाने के लिए सबसे पहले शुद्ध देसी घी के साथ बर्फ के टुकड़ों को अच्छी तरह फेंटा जाता है, जिससे वह मक्खन जैसा गाढ़ा और चिकना हो जाए। इसके बाद इसमें मैदा और ठंडा दूध मिलाया जाता है। इस मिश्रण में थोड़ा पानी और नींबू का रस भी डाला जाता है। इस तैयार घोल को गर्म घी या तेल से भरी कढ़ाई में एक विशेष सांचे की मदद से धीरे-धीरे गोल आकार में चम्मच या सॉस की बोतल से डाला जाता है। जब घेवर किनारों को छोड़ने लगता है और उसका रंग सुनहरा होने लगता है, तब इसे बाहर निकाल लिया जाता है।
  • अंतिम सजावट: अंत में, तैयार जालीदार घेवर के ऊपर हल्की गुनगुनी चाशनी डाली जाती है। चाशनी सोखने के बाद इसके ऊपर ठंडी-ठंडी गाढ़ी रबड़ी की एक समान परत फैलाई जाती है। जब यह परत हल्की सूख जाती है, तब इसके ऊपर बारीक कटे हुए काजू, बादाम और अन्य सूखे मेवों की टॉपिंग करके इसे परोसने के लिए तैयार किया जाता है।

बाजार में कीमत और लोगों का जबरदस्त क्रेज

सिरोही जिले में इस घेवर की भारी मांग के कारण यह इस सीजन में लगभग सभी दुकानों पर आसानी से मिल जाता है। वर्तमान में बाजार में यह रबड़ी घेवर अपनी गुणवत्ता के आधार पर 400 रुपये से लेकर 900 रुपये प्रति किलोग्राम तक की कीमत पर बिक रहा है। दाम अधिक होने के बावजूद लोग इस पारंपरिक मिठाई को खरीदना बेहद पसंद करते हैं। त्योहारों के इस मौसम में घरों में मेहमानों का स्वागत करने और रिश्तेदारों को उपहार में देने के लिए सिरोही का यह जालीदार रबड़ी घेवर पहली पसंद बना हुआ है।

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