चीन-नेपाल सीमा: बाढ़ से तबाह हुई सड़क को ड्रैगन ने महज एक हफ्ते में किया तैयार, जानें क्या है इसकी बड़ी वजह

नेपाल में आई भीषण बाढ़ के कारण चीन को नेपाल से जोड़ने वाली रणनीतिक सड़क पूरी तरह नष्ट हो गई थी, जिसे चीन ने रिकॉर्ड एक सप्ताह के भीतर फिर से चालू कर दिया है।

पड़ोसी देशों में अपनी पैठ मजबूत करने और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए चीन लगातार प्रयासरत रहता है। नेपाल में हाल ही में आई प्राकृतिक आपदा और भीषण बाढ़ के बाद चीन की इसी तत्परता का एक बड़ा उदाहरण सामने आया है। इस आपदा के दौरान चीन को नेपाल से जोड़ने वाली एक बेहद महत्वपूर्ण सीमा सड़क पूरी तरह से नष्ट हो गई थी। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि चीन ने इस संकट के बीच बेहद फुर्ती दिखाई और महज एक सप्ताह के भीतर इस पूरी सड़क को फिर से सुचारू कर दिया। चीन और नेपाल के बीच व्यापार और आवाजाही के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले बायरॉन्ग सीमा मार्ग पर अब यातायात फिर से बहाल हो चुका है। इस त्वरित मरम्मत कार्य से साफ पता चलता है कि नेपाल सीमा पर स्थित यह सड़क मार्ग चीन के लिए सामरिक और व्यापारिक दोनों ही दृष्टिकोण से कितना अधिक महत्वपूर्ण है।

नेपाल सीमा पर सड़क को तुरंत दुरुस्त करने की वजह

नेपाल में आई प्राकृतिक तबाही के बाद सीमावर्ती इलाकों की सड़कों की हालत बेहद खराब हो गई थी, जिससे दोनों देशों के बीच जमीनी संपर्क पूरी तरह टूट गया था। चीन ने इस मार्ग को रिकॉर्ड समय में यानी महज एक हफ्ते के भीतर दुरुस्त कर दिया है। इस सड़क के दोबारा शुरू होने से अब चीन की सीमा से लेकर नेपाल के रसूवाग्धी तक वाहनों और लोगों की आवाजाही बेहद आसान हो जाएगी। इस त्वरित मरम्मत कार्य को लेकर चीन का कहना है कि सड़क के क्षतिग्रस्त होने की वजह से नेपाल में चल रहे राहत और बचाव कार्यों में काफी बाधा आ रही थी। चीन के अनुसार, इस मार्ग के पुनः शुरू होने से अब नेपाल में आपदा राहत सामग्री पहुंचाने और बचाव कार्यों को तेज करने में बड़ी मदद मिलेगी। हालांकि, जैसे ही यह सड़क बनकर तैयार हुई, चीन की तरफ से तमाम रक्षा और आपदा प्रबंधन दल इस मार्ग पर सक्रिय हो गए, जो इसकी रणनीतिक संवेदनशीलता की ओर इशारा करता है।

गायरॉन्ग बॉर्डर रोड का रणनीतिक और व्यापारिक महत्व

चीन ने तिब्बत और नेपाल की सीमा के नजदीक गायरॉन्ग नामक स्थान पर इस सड़क का निर्माण किया है। भौगोलिक दृष्टि से यह बेहद संवेदनशील इलाका है जो त्रिशूली नदी और लेंडे कोला के पास स्थित है। गायरॉन्ग असल में चीन के पास स्थित तिब्बत का एक स्वतंत्र हिस्सा है, जो दूसरी तरफ नेपाल के रसूवाग्धी इलाके से जुड़ता है। रणनीतिक संबंधों के अलावा यह मार्ग दोनों देशों के आर्थिक हितों के लिए भी रीढ़ की हड्डी माना जाता है।

पिछले एक दशक के आंकड़ों पर नजर डालें तो चीन और नेपाल के बीच होने वाले कुल द्विपक्षीय व्यापार का अकेले 30 फीसदी हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। इस मार्ग की लोकप्रियता और उपयोगिता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि साल 2026 में अब तक इस रास्ते से 1 लाख से ज्यादा यात्री और पर्यटक आवाजाही कर चुके हैं। इसी महत्वपूर्ण मार्ग पर प्रसिद्ध चीन-नेपाल फ्रेंडशिप ब्रिज भी स्थित है। यह सड़क चीन के राष्ट्रीय राजमार्ग 216 को नेपाल के नेशनल हाईवे 42 से जोड़ने का काम करती है, जिससे दोनों देशों के बीच सुगम संपर्क स्थापित होता है।

सीमा पर चीन का कड़ा नियंत्रण और वीजा नियम

तिब्बत में नेपाल सीमा के पास बनी इस महत्वपूर्ण सड़क पर चीन ने पूरी तरह से अपना नियंत्रण स्थापित कर रखा है। चीन इस मार्ग का उपयोग न केवल व्यापार के लिए करता है, बल्कि सुरक्षा और प्रशासनिक स्तर पर भी यहां उसका कड़ा पहरा रहता है। इस मार्ग से गुजरने वाले नेपाली नागरिकों के लिए चीन ने बकायदा वीजा शुल्क भी निर्धारित कर रखा है। चीन की वीजा नीति के अनुसार यहां से यात्रा करने वाले लोगों को निम्नलिखित श्रेणियों के तहत शुल्क देना होता है:

  • यदि नेपाल के किसी नागरिक को 15 दिन का वीजा चाहिए, तो उसे 25 डॉलर यानी लगभग ढाई हजार रुपये का भुगतान करना पड़ता है।
  • यदि कोई यात्री 30 दिन की अवधि का वीजा लेना चाहता है, तो उसके लिए वीजा शुल्क 40 डॉलर तय किया गया है।
  • इसके अलावा, 90 दिन की लंबी अवधि के वीजा के लिए यात्रियों को 100 डॉलर यानी लगभग 9,600 रुपये खर्च करने पड़ते हैं।

इस सीमा सड़क के बाढ़ की वजह से पूरी तरह तबाह हो जाने के कारण चीन से नेपाल की आवाजाही तो प्रभावित हुई ही थी, साथ ही दोनों देशों के बीच होने वाले कारोबार पर भी बहुत बुरा असर पड़ रहा था। यही वजह है कि चीन ने बिना समय गंवाए युद्ध स्तर पर काम करते हुए महज सात दिनों के भीतर इस मार्ग को फिर से चालू कर दिया, ताकि उसका व्यापारिक और रणनीतिक नुकसान न हो सके।

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