चुनावी मैदान में एबीवीपी की पहली चाल
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) के आगामी चुनावों के मद्देनजर कैंपस का माहौल पूरी तरह से चुनावी रंग में रंगा नजर आ रहा है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने अपनी रणनीति को धार देते हुए कुल 13 संभावित दावेदारों के नामों का ऐलान कर दिया है। इन नामों की घोषणा के साथ ही विश्वविद्यालय के शैक्षणिक गलियारों में राजनीतिक सरगर्मियां अपने चरम पर पहुंच गई हैं।
संभावित उम्मीदवारों की सूची
एबीवीपी की ओर से जारी आधिकारिक सूची में उन छात्रों के नाम शामिल हैं जो इस बार चुनावी दौड़ में शामिल हो सकते हैं। इन चेहरों में आलोक अत्री, आयुषी शर्मा, ईशु मौर्य, कृष्ण यादव, लक्ष्य राज सिंह, नितिन तंवर, प्रियांशु महामना, रिया छावड़ी, रिया मलिक, सनी डेढ़ा, तान्या मावी, वरुण यादव और यश डबास का नाम प्रमुखता से शामिल है।
प्री-कैंपेन का आगाज
संगठन के ये सभी संभावित प्रत्याशी 31 अगस्त से दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों और संबद्ध कॉलेजों में जाकर अपने चुनावी अभियान की शुरुआत करेंगे। इस प्री-कैंपेन का मुख्य उद्देश्य छात्रों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को करीब से समझना, उनकी उम्मीदों को जानना और उनसे सीधे संवाद स्थापित करना है।
चुनाव कार्यक्रम और मतदान की तारीखें
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के चुनाव का औपचारिक कार्यक्रम घोषित कर दिया गया है, जिसके अनुसार 18 सितंबर 2026 को छात्र अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। मतदान के अगले ही दिन, यानी 19 सितंबर को वोटों की गिनती के बाद नतीजे घोषित किए जाएंगे। चुनावी प्रक्रिया के महत्वपूर्ण पड़ावों में नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 10 सितंबर तय की गई है, जबकि 11 सितंबर को दोपहर 12 बजे तक उम्मीदवार अपना नामांकन वापस ले सकेंगे। इसी दिन, एबीवीपी की चुनाव समिति केंद्रीय पैनल के चार मुख्य पदों के लिए अपने आधिकारिक प्रत्याशियों के नामों की अंतिम घोषणा करेगी।
बढ़ता चुनावी मुकाबला
एबीवीपी की सक्रियता के बीच अन्य छात्र संगठन, जैसे कि एनएसयूआई (NSUI) भी अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देने में लगे हैं। विपक्षी छात्र गुट भी जल्द ही अपने उम्मीदवारों की सूची सार्वजनिक करने वाले हैं, जिससे यह चुनावी मुकाबला बेहद कड़ा और दिलचस्प होने के संकेत दे रहा है।
एबीवीपी का चुनावी इतिहास और सफर
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) की स्थापना वर्ष 1949 में हुई थी। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के चुनावों की बात करें तो इनकी शुरुआत 1954 में हुई थी। हालांकि, एबीवीपी ने अपनी स्थापना के शुरुआती वर्षों में खुद को चुनावी राजनीति से दूर रखने का फैसला किया था। डूसू के चुनावी अखाड़े में एबीवीपी ने पहली बार वर्ष 1968 में कदम रखा। उस समय दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति पर कांग्रेस समर्थित संगठनों का एकछत्र राज था। उस दौर में चुनावी सफलता हासिल करना एबीवीपी के लिए काफी चुनौतीपूर्ण काम था, लेकिन समय के साथ परिषद ने कैंपस की गतिविधियों के माध्यम से अपनी पकड़ मजबूत की। कांग्रेस विरोधी विचारधारा और छात्र हितों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाने के कारण धीरे-धीरे संगठन ने अपनी जड़ें गहरी कर लीं और आज एबीवीपी दिल्ली विश्वविद्यालय की सबसे प्रभावी छात्र राजनीतिक शक्ति के रूप में जानी जाती है।
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