नेपाल में आपदा का तांडव: 580 लोगों की मौत, 1000 से ज्यादा लापता, विदेशी मदद लेने से नेपाल सरकार का इनकार

नेपाल में प्राकृतिक आपदा के चलते हालात बेहद गंभीर बने हुए हैं। सरकार ने विदेशी सहायता लेने से साफ मना कर दिया है, जबकि भारत ने अपने 300 लापता नागरिकों की तलाश के लिए प्रयास तेज कर दिए हैं।

नेपाल में राहत और बचाव अभियान पर लगा ब्रेक

नेपाल इन दिनों एक भीषण प्राकृतिक आपदा की चपेट में है। इस त्रासदी ने भारी तबाही मचाई है और सरकार ने अब तक 580 लोगों की मौत की पुष्टि कर दी है। इसके अलावा 1000 से ज्यादा लोग अभी भी लापता हैं, जिनकी तलाश की जा रही है। चिंता की बात यह है कि आने वाले समय में मृतकों की संख्या और बढ़ सकती है। नेपाल की सेना और पुलिस ने बड़े पैमाने पर चलाए जा रहे राहत और बचाव कार्यों को फिलहाल रोक दिया है। इसका मुख्य कारण रसुवा और नुवाकोट जिलों में मंडरा रहा नया खतरा है। तिब्बत के उस क्षेत्र के पास, जहाँ ग्लेशियर टूटने के कारण यह तबाही मची थी, अब एक और झील का निर्माण हो रहा है। दो दिन पहले गिरोंग में जो झील फटी थी, उसके मलबे ने दोभान इलाके में नदी के बहाव को पूरी तरह रोक दिया है। छोचेन और पुरेपु सांगपो नदी के संगम पर बने इस मलबे के कारण पानी का स्तर लगातार ऊपर उठ रहा है, जिससे एक कृत्रिम झील का आकार ले लिया है।

चीन में फिर से भूकंप के झटके

दोभान में बन रही इस कृत्रिम झील की स्थिति बेहद नाजुक है। यह गिरोंग से करीब 6 किलोमीटर की दूरी पर डाउन स्ट्रीम में स्थित है। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब शुक्रवार को चीन में फिर से 5.1 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया। हिमालयन क्षेत्र पहले से ही भूकंप के लिहाज से संवेदनशील है, और 26 अगस्त को भी यहां 5.2 तीव्रता का भूकंप आया था। लगातार आ रहे भूकंपों के कारण इस कृत्रिम झील के कभी भी टूटने की आशंका बनी हुई है। इन हालातों को देखते हुए नेपाल प्रशासन ने एहतियात बरतते हुए बड़े पैमाने पर चलाए जा रहे बचाव कार्यों को स्थगित कर दिया है और प्रभावित इलाकों से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजने की प्रक्रिया तेज कर दी है।

कई गांव खाली करने का आदेश

नेपाल सेना के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया है कि भले ही पानी अभी खतरे के निशान के नीचे है, लेकिन 26 अगस्त की घटनाओं से सबक लेते हुए एहतियाती कदम उठाए जा रहे हैं। भोटेकोशी, त्रिशूली और नारायणी नदी के तटीय क्षेत्रों में बसे गांवों को खाली कराया जा रहा है। चीन ने भी तिब्बत में बचाव कार्य रोककर लेवल-4 का अलर्ट जारी कर दिया है। दोनों देश बाढ़ की स्थिति पर लगातार तालमेल बिठा रहे हैं। सेना लाउडस्पीकर के जरिए लोगों को घर छोड़ने की हिदायत दे रही है, जिसे स्थानीय लोग बिना किसी विरोध के मान रहे हैं।

300 से ज्यादा भारतीय लापता

इस आपदा का सबसे बुरा असर त्रिशूली इलाके पर पड़ा है, जहाँ मौतों का आंकड़ा सबसे अधिक है। सरकार ने सेना को वहां अपना मुख्य बेस सेंटर बनाने का निर्देश दिया है, जहां रेस्क्यू किए गए लोगों के भोजन और इलाज की व्यवस्था की गई है। यहां अपने लापता परिजनों की तलाश में पहुंचे लोगों का तांता लगा हुआ है। इस बीच, 300 से ज्यादा भारतीयों के लापता होने की खबर ने भारत सरकार की चिंता बढ़ा दी है।

टनल में फंसे मजदूर

बाढ़ ने रसुवा हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। 111 मेगावाट के इस प्रोजेक्ट में कार्यरत 70 से ज्यादा लोग अभी भी लापता हैं। मलबे के कारण पावर प्रोजेक्ट की टनल का मुहाना बंद हो गया था, जिसमें कई मजदूर फंस गए थे। कड़ी मशक्कत के बाद टनल के गेट से मलबा हटाकर उन्हें सुरक्षित बाहर निकाला गया। यह उन लोगों के लिए एक खौफनाक अनुभव था, जिन्होंने अपनी आंखों के सामने साथियों को खोते देखा या मौत को बेहद करीब से महसूस किया।

नेपाल ने क्यों ठुकराया विदेशी मदद का प्रस्ताव?

नेपाल सरकार ने एक बड़ा और चौंकाने वाला निर्णय लेते हुए विदेशी मदद लेने से इनकार कर दिया है। बालेन शाह के प्रशासन का कहना है कि उनकी सुरक्षा एजेंसियां स्थिति से निपटने में पूरी तरह सक्षम हैं। नेपाल ने लापता विदेशियों की जानकारी जुटाने के लिए एक सेंट्रल कंट्रोल रूम बनाया है। इस फैसले के पीछे 2015 के भूकंप का कड़वा अनुभव है, जब विदेशी राहत दलों के बीच समन्वय की भारी कमी देखी गई थी। सरकार का मानना है कि आपदा के समय एयरपोर्ट और सड़कों पर पहले से ही दबाव होता है, ऐसे में अधिक बाहरी टीमों के आने से राहत कार्य में बाधा उत्पन्न होती है।

भारत का निरंतर प्रयास

नेपाल के इस रुख के बावजूद, भारत ने मानवीय आधार पर करीब 50 टन राहत सामग्री पहले ही भेज दी है। भारत का प्राथमिक लक्ष्य अपने 300 लापता नागरिकों को खोजना है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दिल्ली एयरपोर्ट पर कैलाश मानसरोवर यात्रा से लौटे भारतीयों से मुलाकात की और स्पष्ट किया कि काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास लगातार प्रभावितों के संपर्क में है। अब तक 80 भारतीयों को रेस्क्यू किया जा चुका है और विदेश मंत्री ने सुरक्षित वापसी में सहयोग के लिए नेपाल की सेना का आभार व्यक्त किया है।

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