पुरुषोत्तम मास विशेष: सागर तट पर खड़ा 8वीं सदी का महाबलीपुरम शोर मंदिर, जहां विष्णु संग विराजते हैं भगवान शिव

तमिलनाडु के मामल्लापुरम में बंगाल की खाड़ी के किनारे स्थित आठवीं शताब्दी का शोर मंदिर वह दुर्लभ तीर्थ है, जहां एक ही परिसर में भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों विराजमान हैं। पुरुषोत्तम मास के इस पावन अवसर पर आइए जानें आस्था, इतिहास और स्थापत्य के इस अद्भुत संगम के बारे में।

भारत को मंदिरों की भूमि भी कहा जाता है। इसकी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत में ऐसे अनेक मंदिर शामिल हैं, जो केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं, बल्कि आस्था के साथ-साथ इतिहास और कला के भी जीवंत प्रतीक हैं। तमिलनाडु के मामल्लापुरम में स्थित शोर मंदिर भी ऐसा ही एक धार्मिक स्थल है। इसकी सबसे खास बात यह है कि भगवान नारायण के इस मंदिर में उनके आराध्य देवाधिदेव महादेव भी विराजते हैं।

इस समय भगवान विष्णु की आराधना को समर्पित और उन्हें अत्यंत प्रिय पुरुषोत्तम का महीना यानी अधिक मास चल रहा है। इस विशेष महीने में भगवान विष्णु के दर्शन का भी अलग महत्व है। इस देवालय में हर और हरि की संयुक्त उपासना होती है। बंगाल की खाड़ी के किनारे खड़ा यह प्राचीन मंदिर श्रद्धा, इतिहास और स्थापत्य कला का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है।

दक्षिण भारत के सबसे पुराने संरचनात्मक मंदिरों में शामिल

तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से लगभग 55 किलोमीटर दक्षिण में स्थित मामल्लापुरम, जिसे महाबलीपुरम भी कहा जाता है, देश के सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थलों में गिना जाता है। यहां स्थित शोर मंदिर दक्षिण भारत के सबसे पुराने संरचनात्मक मंदिरों में शुमार है। माना जाता है कि इसका निर्माण आठवीं शताब्दी में पल्लव वंश के राजा नरसिंहवर्मन द्वितीय ने कराया था, जिन्हें राजसिंह के नाम से भी जाना जाता है।

शैव और वैष्णव परंपरा का संगम

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों को समर्पित है। मंदिर परिसर में जहां एक ओर शिवलिंग स्थापित है, वहीं दूसरी ओर भगवान विष्णु की शयन मुद्रा वाली प्रतिमा भी मौजूद है। यही कारण है कि इसे शैव और वैष्णव परंपराओं के समन्वय का प्रतीक माना जाता है। शोर मंदिर नारायण की भक्ति और सनातन परंपरा की गौरवशाली विरासत को भी दर्शाता है।

द्रविड़ शैली का उत्कृष्ट नमूना

ग्रेनाइट पत्थरों से बना यह मंदिर द्रविड़ स्थापत्य शैली का बेहतरीन उदाहरण है। समुद्र की लहरों के ठीक सामने खड़ा यह मंदिर दूर से किसी विशाल प्रहरी की तरह प्रतीत होता है। इसके ऊंचे शिखर, सुंदर नक्काशी और कलात्मक संरचना आज भी पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचते हैं। मंदिर का मुख्य भाग पूर्व दिशा की ओर है, जिससे सूर्योदय की पहली किरण सीधे मंदिर पर पड़ती है और यह दृश्य अत्यंत मनमोहक बन जाता है।

कभी सात भव्य मंदिरों के समूह का हिस्सा

इतिहासकारों के अनुसार, यह मंदिर कभी समुद्र तट पर बने सात भव्य मंदिरों के समूह का हिस्सा था। प्रसिद्ध यात्री मार्को पोलो ने भी अपनी यात्राओं के दौरान इन मंदिरों का उल्लेख सात पैगोडा के रूप में किया था। समय के साथ समुद्र की लहरों ने अधिकांश मंदिरों को अपने भीतर समा लिया और आज केवल शोर मंदिर ही सुरक्षित रूप में दिखाई देता है।

समुद्र के भीतर छिपी प्राचीन संरचनाएं

साल 2004 की सुनामी के दौरान जब समुद्र का जलस्तर अचानक पीछे हटा, तब कुछ प्राचीन अवशेष दिखाई दिए थे। इसके बाद पुरातत्वविदों ने यहां शोध कार्य किया, जिससे इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व से जुड़ी नई जानकारियां सामने आईं। माना जाता है कि अब भी कुछ प्राचीन संरचनाएं समुद्र के भीतर मौजूद हो सकती हैं।

शोर मंदिर और मामल्लापुरम के अन्य स्मारकों को यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया है। यह सम्मान इस क्षेत्र की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य महत्ता को रेखांकित करता है। हर वर्ष देश-विदेश से हजारों पर्यटक यहां पहुंचते हैं और प्राचीन भारतीय कला की भव्यता को करीब से निहारते हैं।

आस्था और स्थापत्य का जीवंत प्रतीक

समुद्र की लहरों के बीच अडिग खड़ा शोर मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, आस्था और स्थापत्य कौशल का जीवंत प्रतीक है। यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। यदि आप इस मंदिर के दर्शन करना चाहते हैं तो अक्टूबर से मार्च के बीच का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। इस दौरान मौसम सुहावना रहता है और समुद्र तट की खूबसूरती भी अपने चरम पर होती है।

कैसे पहुंचें मामल्लापुरम

मामल्लापुरम पहुंचने के लिए सबसे निकटतम हवाई अड्डा चेन्नई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है, जो लगभग 55 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। निकटतम रेलवे स्टेशन चेंगलपट्टू रेलवे स्टेशन है, जो करीब 23 किलोमीटर दूर है। चेन्नई और आसपास के शहरों से सड़क मार्ग के जरिए भी यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है।

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