हैदराबाद में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियों के साथ-साथ हाल ही में आए एक अदालती फैसले पर भी जमकर निशाना साधा है। दारुस्सलाम स्थित पार्टी मुख्यालय में आयोजित ‘जलसा-ए-रहमतुल-लिल-आलमीन’ के मंच से बोलते हुए ओवैसी ने समान नागरिक संहिता (UCC) और हिजाब पहनने के अधिकार जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अपनी बात रखी। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि मुसलमानों को उनकी धार्मिक पहचान और आस्था से दूर करने की तमाम कोशिशें कभी कामयाब नहीं होंगी।
समान नागरिक संहिता (UCC) पर खड़े किए बड़े सवाल
असदुद्दीन ओवैसी ने उत्तराखंड, असम और गुजरात जैसे राज्यों में लागू की जा रही समान नागरिक संहिता (UCC) के कानूनी स्वरूप को लेकर गंभीर आपत्तियां उठाई हैं। जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने सवाल किया कि यदि इन राज्यों में लागू किए जा रहे नए नियम असल में हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू तलाक अधिनियम और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधानों पर ही आधारित हैं, तो फिर इन्हें वास्तविक रूप से 'समान' या 'यूनिफॉर्म' सिविल कोड कैसे कहा जा सकता है?
AIMIM अध्यक्ष ने दो टूक शब्दों में कहा कि जो नियम पूरी तरह से हिंदू पर्सनल लॉ के सिद्धांतों पर बने हैं, उन्हें जबरन मुस्लिम समुदाय के ऊपर नहीं थोपा जा सकता। उन्होंने कहा कि मुसलमान कभी भी अपने दीन को नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने साफ शब्दों में संदेश दिया कि जो लोग इस्लाम में विश्वास रखते हैं, वे पवित्र कुरान और सुन्नत की दी गई शिक्षाओं का ही पालन करते रहेंगे। ओवैसी के मुताबिक, मुसलमानों को उनके विश्वास से डिगाने की हर कोशिश आखिरकार नाकाम साबित होगी।
हिजाब पर आए हाईकोर्ट के फैसले को बताया 'इस्लाम पर हमला'
इसके साथ ही असदुद्दीन ओवैसी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस हालिया फैसले की भी कड़ी आलोचना की, जिसमें प्रयागराज के एक स्कूल की नाबालिग छात्रा की याचिका को खारिज कर दिया गया था। छात्रा ने स्कूल के तय ड्रेस कोड के साथ हिजाब पहनने की अनुमति मांगी थी। ओवैसी ने इस फैसले को सीधे तौर पर 'इस्लाम पर हमला' करार दिया।
उन्होंने अदालती फैसले पर गंभीर आपत्ति जताते हुए कहा, "मैं इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले से सहमत नहीं हूं। आज का यह निर्णय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 19 के तहत मिले अधिकारों का पूरी तरह से उल्लंघन करता है। यह तय करने वाले आप कौन होते हैं कि इस्लाम के लिए क्या जरूरी है? लड़कियां हिजाब अपने सिर पर पहनती हैं, अपने दिमाग पर नहीं। यह फैसला इस्लाम पर एक हमला है।"
ओवैसी ने आगे याद दिलाया कि इसी तरह का आवश्यक धार्मिक प्रथाओं से जुड़ा सबरीवाला का मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। ऐसे में उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इलाहाबाद हाईकोर्ट को इस विषय पर इस तरह का आदेश देना चाहिए था।
कोर्ट की क्या दलील थी?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए टिप्पणी की थी कि याचिकाकर्ता छात्रा ऐसा कोई भी धार्मिक ग्रंथ या पुख्ता सामग्री पेश करने में पूरी तरह से असमर्थ रही, जिससे यह साबित हो सके कि स्कार्फ पहनना उसके धर्म का एक अनिवार्य हिस्सा है, और इसके बिना उसकी धार्मिक आस्था पर कोई विपरीत असर पड़ेगा। अदालत ने अपने फैसले में यह भी रेखांकित किया था कि मामले के दौरान पेश की गई तस्वीरों में उसी धार्मिक समुदाय की अन्य छात्राएं बिना किसी स्कार्फ के सामान्य रूप से स्कूल जाती हुई दिखाई दे रही थीं।
देश के प्रति प्रतिबद्धता और स्वतंत्रता सेनानियों का जिक्र
अपने भाषण के दौरान असदुद्दीन ओवैसी ने भारत के प्रति अपनी और मुस्लिम समुदाय की गहरी निष्ठा को भी पुरजोर तरीके से प्रदर्शित किया। उन्होंने कहा कि देश के मुसलमान अपनी धार्मिक आस्थाओं पर अडिग रहते हुए भी देश की प्रगति में अपना पूरा योगदान देते रहेंगे। उन्होंने गर्व से कहा, "हम इस देश से प्यार करते हैं, हम इस देश की रक्षा करेंगे और अपनी आस्था के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध रहते हुए हम भारत को एक महाशक्ति बनाने के लिए काम करते रहेंगे।"
ओवैसी ने देश की आजादी की जंग का जिक्र करते हुए कहा कि भारत की स्वतंत्रता का संघर्ष उन सभी लोगों का साझा इतिहास है जिन्होंने देश के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी। उन्होंने विशेष रूप से वीर स्वतंत्रता सेनानी तुर्रेबाज खान जैसे नायकों का नाम लिया और कहा कि देश के लिए दिए गए उनके महान बलिदानों को कभी भी भुलाया नहीं जाना चाहिए।
संविधान बनाम मनुस्मृति: RSS और BJP पर तीखा हमला
भाषण के आखिरी हिस्से में ओवैसी ने RSS और BJP पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि इन संगठनों ने हमेशा से ही भारत के लोकतांत्रिक संविधान के बजाय मनुस्मृति को प्राथमिकता दी है।
ओवैसी ने इतिहास का हवाला देते हुए कहा, "मैं RSS से जुड़े लोगों से मनुस्मृति के बारे में पूछ रहा हूं। क्या यह सच नहीं है कि 26 नवंबर 1949 को हमने देश का संविधान अपनाया था? हालांकि, इसके ठीक चार दिन बाद, यानी 30 नवंबर को आरएसएस के एक मुखपत्र ने इसके खिलाफ एक शिकायत छापी थी। उसमें स्पष्ट रूप से लिखा गया था कि यह संविधान नहीं था और इसकी जगह मनुस्मृति होनी चाहिए थी। असलियत यह है कि उन्हें बाबासाहेब अंबेडकर द्वारा तैयार किए गए संविधान से हमेशा से ही दिक्कत थी।"
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