अमेरिका और चीन के बीच बढ़ा तनाव
ईरान को लेकर अमेरिका और चीन के बीच विवाद का एक नया मोर्चा खुल गया है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने सोमवार को ईरान पर दबाव बनाने के उद्देश्य से नए आर्थिक प्रतिबंधों की घोषणा की है, जिसकी आंच अब सीधे तौर पर बीजिंग तक पहुंचती दिखाई दे रही है। इस कदम ने दोनों महाशक्तियों के बीच पहले से ही तनावपूर्ण संबंधों को और अधिक जटिल बना दिया है। चीन ने अमेरिका को स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन चीनी कंपनियों को ईरान से संबंधित इन प्रतिबंधों के दायरे में लाता है, तो बीजिंग भी इसका मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार है।
चीन ने दी सख्त चेतावनी
ईरान के कुल तेल निर्यात का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा अकेले चीन खरीदता है, जो इसे ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बनाता है। यही कारण है कि अमेरिका का यह कदम चीन के लिए चिंता का विषय है। मंगलवार को चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने तीखे शब्दों में अमेरिका को चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि चीन अपने राष्ट्रीय अधिकारों और हितों की सुरक्षा के लिए हर संभव कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। बीजिंग का तर्क है कि अमेरिका द्वारा लगाए गए ये एकतरफा प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय कानूनों के विरुद्ध हैं और वह हमेशा इनका विरोध करता रहा है। चीन का मानना है कि वर्तमान में सबसे आवश्यक कार्य वैश्विक तनाव को कम करना है, न कि किसी देश पर दबाव बनाने के लिए प्रतिबंधों का उपयोग करना।
प्रतिबंधों की जद में कौन
अमेरिकी वित्त मंत्री द्वारा सोमवार को घोषित की गई इन पाबंदियों में हॉन्गकॉन्ग और चीन की कुछ चुनिंदा कंपनियां शामिल हैं। हालांकि, फिलहाल अमेरिका ने चीन के बड़े वित्तीय संस्थानों पर सीधे प्रहार करने से परहेज किया है, लेकिन आने वाले समय में स्थिति बदल सकती है। चीन में तेल का व्यापार दो श्रेणियों में बंटा हुआ है। पहली श्रेणी में चीन की बड़ी सरकारी कंपनियां हैं, जो अक्सर अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन करने के लिए मजबूर होती हैं। वहीं, दूसरी ओर 'टीपोट्स' कही जाने वाली निजी रिफाइनरियां हैं, जो लगातार ईरान से कच्चा तेल आयात करती हैं। पिछले अनुभवों को देखें तो जब अमेरिका ने पहले इन पर प्रतिबंध लगाए थे, तो चीन ने अपनी घरेलू कंपनियों को उन आदेशों को मानने से साफ इनकार कर दिया था।
शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात पर संकट
यह तल्खी ऐसे संवेदनशील समय पर सामने आई है जब वॉशिंगटन में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच एक महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है। पिछले साल अक्टूबर में दोनों देशों के बीच ट्रेड वॉर को लेकर एक साल का विराम लगा था, और इस बैठक का मुख्य उद्देश्य उसी समझौते को आगे बढ़ाने पर चर्चा करना था। हालांकि, अमेरिका के इस हालिया फैसले ने कूटनीतिक बातचीत शुरू होने से पहले ही संबंधों में कड़वाहट घोल दी है।
चीन का संभावित पलटवार
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका चीन की बड़ी कंपनियों को निशाना बनाने की कोशिश करता है, तो चीन के पास जवाबी कार्रवाई करने के पर्याप्त विकल्प मौजूद हैं। पिछले वर्ष भी चीन ने हाई-टेक उद्योग के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स) की आपूर्ति रोककर अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को संकट में डाल दिया था। अब देखना यह होगा कि क्या दोनों नेता आने वाली मुलाकात में इस विवाद का कोई समाधान निकाल पाते हैं या फिर यह टकराव और अधिक गहरा होता है।
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