सामान्य घास समझने की भूल न करें, सेहत के लिए किसी वरदान से कम नहीं है जंगली पुदीना

ग्रामीण अंचलों में आसानी से मिलने वाला जंगली पुदीना जिसे गंधेली भी कहा जाता है, औषधीय गुणों से भरपूर है। गोंडा के वैद्य के अनुसार यह चोट और घाव भरने में बेहद कारगर है।

आम पौधा मगर खास फायदे

अक्सर हम अपने आसपास उगने वाले कई पौधों को केवल घास-फूस या खरपतवार समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन प्रकृति की गोद में ऐसे कई पौधे छिपे हैं जो अद्भुत औषधीय गुणों से लैस हैं। ऐसा ही एक पौधा है जंगली पुदीना, जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में गंधेली के नाम से भी पुकारा जाता है। यह पौधा खेतों की मेड़ों, बंजर जमीनों और बाग-बगीचों के कोनों में बहुत आसानी से उग आता है। इसकी पहचान इसके छोटे-छोटे सफेद या हल्के बैंगनी रंग के फूलों से की जा सकती है।

विभिन्न नामों से है पहचान

गोंडा के वैद्य विष्णु दत्त प्रजापति बताते हैं कि इस पौधे की व्यापकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसे अलग-अलग क्षेत्रों में कई नामों से जाना जाता है। कुछ लोग इसे विषादोड़ी कहते हैं, तो कहीं इसे सामान्य रूप से जंगली पुदीने के तौर पर पहचाना जाता है। स्थानीय स्तर पर इसका उपयोग पीढ़ियों से घरेलू चिकित्सा में किया जा रहा है।

चोट और घाव में असरदार

वैद्य विष्णु दत्त प्रजापति के अनुसार, इस पौधे का सबसे प्रभावी और पारंपरिक उपयोग चोट लगने की स्थिति में होता है। यदि शरीर पर कहीं छोटा-मोटा घाव हो जाए या कट लग जाए, तो यह जंगली पुदीना एक प्राथमिक उपचार की तरह काम करता है।

  • उपयोग की विधि: इस पौधे की ताजी पत्तियों को अच्छी तरह पीसकर लेप तैयार किया जाता है।
  • लाभ: इस लेप को घाव पर लगाने से रक्त का बहाव तुरंत नियंत्रित होने में मदद मिलती है।
  • पारंपरिक महत्व: ग्रामीण इलाकों में चोट लगने पर आज भी लोग डॉक्टर के पास जाने से पहले इस जड़ी-बूटी का सहारा लेते हैं।

यह जानकारी स्पष्ट करती है कि जिसे हम अब तक केवल एक बेकार पौधा समझते रहे थे, वह वास्तव में प्राथमिक उपचार का एक सशक्त साधन है। हालांकि, किसी भी जड़ी-बूटी का उपयोग करने से पहले विशेषज्ञों या अनुभवी जानकारों से सलाह लेना सदैव उचित रहता है।

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