ड्रोन युद्ध की बदलती तस्वीर
पिछले करीब दो दशकों से MQ-9 रीपर अमेरिकी ड्रोन बेड़े की रीढ़ बना हुआ था। आसमान में अपनी धाक जमाने वाला यह ड्रोन लंबे समय तक निगरानी और सटीक हमलों के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन अब युद्ध के बदलते स्वरूप ने अमेरिका को अपनी सैन्य प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। आज के दौर में महंगे ड्रोनों को हर कीमत पर सुरक्षित रखना एक बड़ी चुनौती बन गई है, जिसके चलते अमेरिका अब एक नई रणनीति अपना रहा है। भविष्य के युद्धों में अमेरिका ऐसे ड्रोनों का उपयोग करना चाहता है जिन्हें खोने पर भारी आर्थिक नुकसान न हो।
क्यों कम हो रही है MQ-9 रीपर की उपयोगिता
MQ-9 रीपर के साथ सबसे बड़ी समस्या उसकी बढ़ती कीमत है। अमेरिकी वायुसेना के अनुसार, सेंसर, अत्याधुनिक तकनीक और अन्य महत्वपूर्ण उपकरणों को मिलाकर एक रीपर ड्रोन की कीमत करीब 5 करोड़ डॉलर तक पहुंच जाती है। किसी भी युद्धक्षेत्र में इतने महंगे हथियार को खोना अमेरिका के लिए एक महंगा सौदा साबित हो रहा है। इसके अलावा, रीपर का उत्पादन भी अब बंद हो चुका है, जिसका अर्थ है कि नष्ट हुए ड्रोनों की भरपाई करना आसान नहीं है। इराक और अफगानिस्तान जैसे संघर्षों में रीपर ने अपनी उपयोगिता सिद्ध की थी, लेकिन ईरान जैसे देशों और हूती विद्रोही समूहों के पास अब ऐसी तकनीक मौजूद है, जो इन ड्रोनों को आसानी से मार गिरा सकती है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अब तक कम से कम 45 रीपर ड्रोन दुश्मन की कार्रवाई में तबाह हो चुके हैं।
वाइल्डफायर ड्रोन की धमाकेदार एंट्री
इन्हीं चुनौतियों के बीच अमेरिकी कंपनी जनरल एटॉमिक्स ने वाइल्डफायर ड्रोन पेश किया है। इसे अगली पीढ़ी के ड्रोन के रूप में देखा जा रहा है जो कम लागत में अधिक मारक क्षमता प्रदान करेगा। वाइल्डफायर की सबसे बड़ी खूबी इसकी लंबी दूरी की क्षमता है, जिसकी अनुमानित फेरी रेंज 18 हजार किलोमीटर बताई गई है। यह ड्रोन सिर्फ खुफिया निगरानी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें LRASM जैसी घातक एंटी-शिप मिसाइलों को ले जाने की क्षमता भी दी जाएगी, जिससे यह दुश्मन के जहाजों को भी नेस्तनाबूद कर सकेगा।
झुंड में हमला करने की रणनीति
अमेरिका की नई रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा ड्रोन स्वॉर्म यानी ड्रोनों का झुंड है। इस तकनीक के तहत अमेरिका अब एक बड़े और महंगे ड्रोन के बजाय बड़ी संख्या में सस्ते ड्रोनों का इस्तेमाल करेगा। यदि दुश्मन कुछ ड्रोनों को मार भी गिराता है, तो भी शेष ड्रोन अपना मिशन जारी रखेंगे। इसे एट्रिटेबल मास कहा जाता है। हालिया युद्धों, विशेषकर यूक्रेन और मिडिल ईस्ट के संघर्षों ने साबित किया है कि बड़ी संख्या में सस्ते ड्रोनों का उपयोग दुश्मन की महंगी एयर डिफेंस मिसाइलों को खत्म करने के लिए बहुत प्रभावी है। अक्सर लाखों डॉलर की एयर डिफेंस मिसाइल को कुछ लाख डॉलर के ड्रोन को गिराने में खर्च करना पड़ता है, जो दुश्मन के लिए आर्थिक रूप से भारी पड़ता है।
क्या रीपर का युग पूरी तरह समाप्त हो गया
हालांकि अमेरिका अपनी रणनीति बदल रहा है, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि MQ-9 रीपर का करियर खत्म हो गया है। आज भी रीपर लंबी दूरी के मिशन और निगरानी के लिए अत्यधिक सक्षम है। अमेरिकी सेना अभी भी इसके ईंधन सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमता और हथियारों के आधुनिकीकरण पर काम कर रही है। हकीकत यह है कि रीपर अभी भी उपयोगी है, लेकिन दुश्मन के मजबूत एयर डिफेंस वाले क्षेत्रों में उसे भेजना अब बहुत जोखिम भरा और महंगा हो गया है। इसलिए, अमेरिका अब ऐसे ड्रोनों की ओर देख रहा है जिन्हें खोने का जोखिम उठाया जा सके और जो युद्ध के नए मानकों पर खरे उतरें। बदलते वैश्विक सुरक्षा वातावरण में, अमेरिका की यह नई सोच आने वाले समय में ड्रोन वारफेयर की दिशा पूरी तरह बदल सकती है।
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