झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और धांधली का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट पर पहुंच गया है। परीक्षा के संचालन को लेकर उठ रहे गंभीर सवालों के बीच, सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे विवाद पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए झारखंड सरकार और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को नोटिस जारी कर इस पूरे प्रकरण पर विस्तृत जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम झारखंड के उन हजारों अभ्यर्थियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो लंबे समय से इस परीक्षा प्रणाली में सुधार और इसकी निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।
इस बेहद संवेदनशील मामले की सुनवाई देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली खंडपीठ द्वारा की जा रही है। याचिकाकर्ता हरिशरण देवगन की ओर से देश के वरिष्ठ अधिवक्ता मनन कुमार मिश्रा अदालत में उपस्थित हुए। उन्होंने खंडपीठ के समक्ष JPSC सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में हुई कथित व्यापक गड़बड़ियों और विसंगतियों का पूरा ब्योरा प्रस्तुत किया। याचिकाकर्ता की मुख्य मांग यह है कि 19 अप्रैल 2026 को आयोजित की गई प्रारंभिक परीक्षा को पूरी तरह से रद्द कर दिया जाए और नए सिरे से पारदर्शी तरीके से परीक्षा आयोजित की जाए। इसके साथ ही याचिका में पूरी चयन प्रक्रिया की जांच CBI या किसी स्वतंत्र विशेष जांच दल (SIT) से कराने की गुहार लगाई गई है।
अदालत में हुई तीखी बहस और CJI के सवाल
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील मनन कुमार मिश्रा ने कोर्ट को बताया कि झारखंड में परीक्षाओं में हो रही धांधली को लेकर छात्र सड़कों पर हैं और लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। छात्रों का आरोप है कि परीक्षा के संचालन में बड़े पैमाने पर नियमों को ताक पर रखा गया। इस पर CJI सूर्यकांत ने मामले में गहरी रुचि दिखाते हुए पूछा कि क्या यह विवाद केवल एक परीक्षा तक सीमित है या इसका दायरा अन्य परीक्षाओं तक भी फैला हुआ है।
जवाब में वकील ने स्पष्ट किया कि झारखंड में सरकारी भर्तियों से जुड़े कई विवाद सामने आए हैं, जिसमें से एक मामला JPSC से संबंधित है और दूसरा झारखंड स्टाफ सेलेक्शन कमीशन की परीक्षा से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान राज्य की न्यायिक सेवा परीक्षा का भी जिक्र आया। इस पर CJI ने विशेष रूप से यह सवाल किया कि क्या न्यायिक सेवा की परीक्षा का आयोजन भी लोक सेवा आयोग ही कराता है। कोर्ट ने इस बात के संकेत दिए हैं कि वह इस पूरे पहलू को भी देखेगा कि राज्य में इन महत्वपूर्ण परीक्षाओं का आयोजन किस प्रकार से किया जा रहा है।
फॉरेंसिक जांच और स्वतंत्र एजेंसी की जरूरत
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि परीक्षा की गरिमा को बहाल करने के लिए इसकी गहन जांच अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने अदालत के सामने यह विकल्प भी रखा कि इस धांधली की जांच या तो CBI से कराई जाए या फिर किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश से इसकी जांच करवाई जाए। इस पर अपनी टिप्पणी देते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि यह कोई सामान्य जांच का मामला नहीं है। इसमें एक पेशेवर जांच एजेंसी की आवश्यकता पड़ सकती है, जिसे तकनीकी और फॉरेंसिक पहलुओं समेत कई अन्य कोणों से भी मामले की गहराई से जांच करनी पड़ सकती है।
CJI ने कहा कि डिजिटल युग में परीक्षाओं में होने वाली गड़बड़ियों के लिए फॉरेंसिक जांच भी बेहद अहम हो जाती है। इसके बाद अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सीधे तौर पर कहा, "नोटिस जारी करें।" सुप्रीम कोर्ट में उपस्थित झारखंड सरकार के प्रतिनिधित्व कर रहे वकील ने इस नोटिस को स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही CJI सूर्यकांत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए जल्द से जल्द एक तारीख तय करने का निर्देश भी दे दिया है।
हाईकोर्ट का फैसला और बदलते कानूनी समीकरण
इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ यह भी है कि यह याचिका राज्य सरकार द्वारा परीक्षा के संबंध में कोई निर्णय लेने से पहले ही दायर की गई थी। अब समय बीतने के साथ परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को अब यह भी तय करना होगा कि मौजूदा परिस्थितियों के आलोक में इस याचिका पर आगे की सुनवाई की क्या दिशा होगी।
इस पूरे विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हाल ही में 20 अगस्त को झारखंड हाईकोर्ट ने JPSC की भर्ती परीक्षाओं के जरिए हुई नियुक्तियों को रद्द करने के राज्य सरकार के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी थी। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद यह पूरा मामला और अधिक जटिल तथा संवेदनशील हो गया है। एक तरफ जहां राज्य के छात्र लगातार आंदोलन कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कानूनी मोर्चे पर भी लगातार नए घटनाक्रम सामने आ रहे हैं। अब सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख और झारखंड सरकार तथा CBI को जारी नोटिस के बाद इस पूरे विवाद पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
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