मेहनत और स्वाभिमान की एक अद्भुत मिसाल
कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के बिसरोड़ी इलाके से एक ऐसी कहानी सामने आई है जो हर किसी को सोचने पर मजबूर कर देती है। यहां रहने वाले सेसप्पा की दिनचर्या बेहद अनोखी है। वह सुबह अपने आलीशान Fortuner वाहन में बैठकर काम पर निकलते हैं और वहां पहुंचते ही हाथों में झाड़ू थाम लेते हैं। सड़कों की सफाई करना और स्वच्छता बनाए रखना उनका दैनिक कार्य है। देखने वालों को यह नजारा हैरान कर सकता है कि एक रसूखदार गाड़ी का मालिक सड़क पर सफाई का काम क्यों कर रहा है, लेकिन सेसप्पा के लिए यह काम उनके स्वाभिमान और जीवन जीने के तरीके का हिस्सा है।
गरीबी से संघर्ष और जीवन का कठिन मोड़
सेसप्पा की यह सफलता की कहानी रातोंरात नहीं लिखी गई है। उनके जीवन में एक समय ऐसा भी था जब उनके पास बुनियादी जरूरतों के लिए भी पैसे नहीं थे। वर्ष 1999 में जब उन्होंने अपना करियर शुरू किया, तो वे सिविल सेवा में एक कर्मचारी के तौर पर नियुक्त थे। उस समय उनकी दैनिक आय मात्र 50 रुपये थी। जीवन की आर्थिक तंगियों और निजी परेशानियों के चलते वे उस दौर में शराब के लत का शिकार हो गए थे, जिसने उनकी जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित कर दिया था। उस समय उन्हें लगा कि उनकी पूरी जिंदगी बिखर गई है और वे एक गहरे अंधकार की ओर बढ़ रहे थे।
सब-इंस्पेक्टर से मिली जीवन की नई दिशा
साल 2005 का समय सेसप्पा के जीवन के लिए एक बड़ा बदलाव लेकर आया। उनकी मुलाकात बांटवाल पुलिस थाने में तैनात सब-इंस्पेक्टर बेलियप्पा से हुई। उस एक छोटी सी मुलाकात और बातचीत ने सेसप्पा की सोच को पूरी तरह बदल दिया। सब-इंस्पेक्टर द्वारा दी गई सलाह का उन पर गहरा असर हुआ और उन्होंने उसी समय शराब को हमेशा के लिए छोड़ने का संकल्प ले लिया। उन्होंने फैसला किया कि अब वे अपने जीवन की जिम्मेदारी खुद उठाएंगे। उन्होंने अनुशासन और अटूट मेहनत को अपना साथी बनाया और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
पिता के निधन का दर्दनाक पल
सेसप्पा के जीवन का सबसे दुखद और भयावह अनुभव उनके पिता की मृत्यु के दौरान का है। उस वक्त उनके पास इतने पैसे भी नहीं थे कि वे अपने पिता का अंतिम संस्कार सम्मानजनक तरीके से कर सकें। इस कठिन घड़ी में किसी ने भी उनकी मदद का हाथ नहीं बढ़ाया, जो उनके लिए बेहद पीड़ादायक था। अंततः, सेसप्पा खुद अपने पिता के पार्थिव शरीर को नेत्रावती नदी के तट पर ले गए और स्वयं अंतिम संस्कार संपन्न किया। इस घटना ने उनके दिलो-दिमाग पर एक अमिट छाप छोड़ दी। उन्होंने उसी वक्त मन में ठान लिया कि उन्हें इतना सशक्त और समर्थ बनना है कि भविष्य में किसी भी विपरीत परिस्थिति में उन्हें किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े और वे स्वावलंबन के साथ जी सकें।
खेती और डेयरी से संवारा अपना भाग्य
सेसप्पा ने अपनी सरकारी नौकरी के भरोसे बैठने के बजाय मेहनत के हर रास्ते को अपनाया। उन्होंने खेती शुरू की और साथ ही डेयरी के व्यवसाय में भी कदम रखा। इसके अलावा, जहां भी उन्हें अतिरिक्त मजदूरी का मौका मिला, उन्होंने उसे सहर्ष स्वीकार किया। उनका दृढ़ विश्वास रहा है कि मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता। चाहे खेत में पसीना बहाना हो, कचरा उठाना हो या सड़कों की सफाई करना, उन्होंने कभी भी किसी काम को छोटा या बड़ा नहीं समझा। वे सुबह 5 बजे ही अपने काम में जुट जाते हैं। दोपहर तक वे सफाई का कार्य और कचरा उठाने वाली गाड़ी को चलाने का जिम्मा बखूबी निभाते हैं।
असली सफलता क्या है
आज सेसप्पा के पास लाखों की कीमत वाली Fortuner गाड़ी है, लेकिन उनका स्वभाव आज भी पहले जैसा ही विनम्र है। वह कहते हैं कि पैसा या बड़ी गाड़ी किसी इंसान की असली पहचान नहीं होती। असली सफलता तो इस बात में है कि आप अपने काम के प्रति कितने ईमानदार हैं। आज भी वे अपने सफाई के काम को किसी पूजा से कम नहीं मानते। उनकी कहानी यह सिखाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी मुश्किलें आएं, अगर इंसान संकल्प ले ले, तो वह अपनी मेहनत के बल पर फर्श से अर्श तक पहुंच सकता है। सेसप्पा का जीवन आज हजारों लोगों के लिए प्रेरणा का एक स्रोत बन गया है, जो हमें यह बताता है कि सम्मान काम में नहीं, बल्कि उसे करने की भावना में निहित होता है।
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