झुंझुनूं: तिरंगा मैन बनकर समाज को राह दिखा रहे रिटायर्ड पुलिस अधिकारी, कमाई का बड़ा हिस्सा लुटाया परोपकार में

दिल्ली पुलिस से सेवानिवृत्त हुए जगदीशप्रसाद झाझड़िया ने समाजसेवा के लिए अपनी पूरी जमा-पूंजी और पेंशन समर्पित कर दी है। तिरंगा लगाने से लेकर श्रवण पुरस्कार तक, उनकी अनूठी पहल आज पूरे इलाके के लिए एक मिसाल बन गई है।

सेवानिवृत्ति के बाद समाज को समर्पित किया जीवन

झुंझुनूं के रहने वाले दिल्ली पुलिस के सेवानिवृत्त सब-इंस्पेक्टर जगदीशप्रसाद झाझड़िया ने मिसाल कायम की है। वर्दी से रिटायरमेंट के बाद उन्होंने आराम की जिंदगी चुनने के बजाय समाजसेवा का कठिन रास्ता चुना। आज वे न केवल बुजुर्गों की सेवा के लिए प्रेरित कर रहे हैं बल्कि क्षेत्र में राष्ट्रप्रेम की अलख भी जगा रहे हैं। पिछले कई वर्षों से वे निरंतर बुजुर्गों के सम्मान और ग्रामीण बुनियादी ढांचे के विकास के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

श्रवण पुरस्कार से बुजुर्गों के सम्मान की अनूठी पहल

जगदीशप्रसाद ने बुजुर्ग माता-पिता और असहाय परिजनों की निस्वार्थ सेवा करने वाले बच्चों और बहुओं को प्रोत्साहित करने के लिए श्रवण पुरस्कार की शुरुआत की है। इस पुरस्कार का उद्देश्य उन लोगों को सम्मानित करना है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने परिवार के वरिष्ठ सदस्यों का ख्याल रखते हैं। इस सम्मान के तहत विजेताओं को 10 ग्राम का चांदी का सिक्का और प्रशस्ति-पत्र प्रदान किया जाता है।

इस नेक पहल की नींव करीब नौ साल पहले पड़ी थी, जब दिल्ली पुलिस की सेवा से मुक्त होकर वे अपने गांव लौटे। उस समय उन्होंने युवा पीढ़ी में बुजुर्गों के प्रति बढ़ती उपेक्षा और तिरस्कार को देखा, जिससे उन्हें गहरा आघात लगा। उन्होंने महसूस किया कि बुजुर्गों के प्रति संवेदनशीलता धीरे-धीरे खत्म हो रही है। उन्होंने ठान लिया कि जो लोग निस्वार्थ भाव से सेवा कर रहे हैं, उन्हें समाज के बीच विशेष सम्मान मिलना चाहिए।

उनकी यह मुहिम तेजी से रंग ला रही है। वर्ष 2025 में उन्होंने सात गांवों के सात आदर्श पुत्र-पुत्रवधुओं को पुरस्कृत किया था। इस वर्ष यह संख्या बढ़कर आठ हो गई है। जगदीशप्रसाद का लक्ष्य है कि वर्ष 2027 तक वे 100 ऐसे सेवाभावी लोगों को श्रवण पुरस्कार से सम्मानित करेंगे, ताकि बुजुर्गों के प्रति समाज का नजरिया और अधिक सकारात्मक बन सके।

तिरंगा मैन के रूप में मिली पहचान

जगदीशप्रसाद केवल मानवीय संवेदनाओं के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रप्रेम के लिए भी चर्चा में हैं। उन्हें इलाके में तिरंगा मैन के नाम से जाना जाता है। इस सफर की शुरुआत 2018 में हुई, जब उन्होंने अपने घर पर 101 फीट ऊंचा तिरंगा फहराया। एक स्थानीय व्यक्ति ने जब उनसे पूछा कि यह किस देवता का झंडा है, तो उस प्रश्न ने उन्हें झकझोर कर रख दिया। उन्होंने संकल्प लिया कि देश के गौरव तिरंगे को गांव-गांव तक पहुंचाया जाएगा।

उन्होंने न केवल अपने स्तर पर, बल्कि भामाशाहों के सहयोग से 40 गांवों के सरकारी स्कूलों में 40 से 60 फीट ऊंचे तिरंगे स्थापित करवाए। तीन साल के भीतर उन्होंने विभिन्न तहसील स्तरों और स्कूलों में करीब 15 से अधिक बड़े तिरंगे लगवाकर बच्चों में राष्ट्रभक्ति की भावना को और प्रगाढ़ किया है।

कमाई का बड़ा हिस्सा परोपकार में

जगदीशप्रसाद की समाजसेवा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने अपनी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा इसके लिए खर्च कर दिया है। उन्होंने बताया कि अब तक वे समाजहित में कुल 88 लाख रुपये से अधिक की राशि खर्च कर चुके हैं। अक्टूबर 2018 से मार्च 2019 के बीच जखोड़ा में खेल स्टेडियम का निर्माण उनके द्वारा किए गए बड़े कार्यों में शामिल है। उन्होंने स्वयं अपनी जमा पूंजी से इस स्टेडियम में बाउंड्रीवॉल, रनिंग ट्रैक और अन्य आवश्यक सुविधाएं विकसित करवाईं।

उनके द्वारा किए गए अन्य कार्यों में शामिल हैं:

  • मोक्षधामों में शव रखने के लिए सुरक्षित प्लेटफॉर्म का निर्माण।
  • मंड्रेला उपतहसील कार्यालय के बाहर यात्री बस स्टैंड बनवाना।
  • धतरावाला और जखोड़ा अस्पतालों के बाहर सार्वजनिक सुविधा के लिए बस स्टैंड।
  • बुडानिया में यात्री शेड का निर्माण।
  • सरकारी स्कूलों, शहीद स्मारकों और आयुर्वेदिक अस्पतालों में सहयोग।

वे अपनी पेंशन और खेती से होने वाली आय का एक बड़ा हिस्सा इसी तरह के लोक कल्याणकारी कार्यों में लगाते हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि पैसा केवल निजी जरूरतों के लिए नहीं होता, बल्कि उसका वास्तविक मूल्य तब सार्थक होता है जब वह समाज के काम आए। जगदीशप्रसाद का यह जीवन समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत बना हुआ है, जो हमें सिखाता है कि समाजसेवा के लिए किसी बड़े पद की नहीं, बल्कि बड़े दिल की आवश्यकता होती है।

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