पाकिस्तान के सियासी गलियारों में एक बार फिर भारी उथल-पुथल देखने को मिल रही है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की अगुवाई वाली सरकार इस समय चौतरफा संकटों से घिर गई है। एक तरफ जहां देश की शीर्ष अदालत के आदेशों की अनदेखी को लेकर सरकार कानूनी मोर्चे पर घिरती नजर आ रही है, वहीं दूसरी तरफ उसके अपने ही खेमे में बगावत के सुर तेज हो गए हैं। सत्तारूढ़ गठबंधन की सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी पार्टी, पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) ने सरकार को कड़े तेवर दिखाए हैं। इसी के साथ, मुख्य विपक्षी दल भी एक मंच पर आकर सरकार को गिराने की रणनीति तैयार कर रहे हैं। ऐसे में शहबाज शरीफ के लिए अपनी सत्ता बचाए रखना एक बड़ी चुनौती साबित होने वाला है।
इमरान खान के इलाज को लेकर अदालत और सरकार में ठनी
इस पूरे राजनीतिक घमासान के केंद्र में एक बार फिर पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के संस्थापक इमरान खान हैं। दरअसल, बीती 18 अगस्त को पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम फैसला सुनाया था। अदालत ने सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया था कि जेल में बंद इमरान खान को रावलपिंडी की अदियाला जेल से निकालकर तुरंत इस्लामाबाद के शिफा इंटरनेशनल अस्पताल में भर्ती कराया जाए। इसके साथ ही अदालत ने 48 घंटे के भीतर इमरान खान की जांच करने और उनके उचित इलाज के लिए देश के जाने-माने विशेषज्ञ डॉक्टरों का एक मेडिकल बोर्ड गठित करने का भी हुक्म दिया था।
लेकिन शहबाज सरकार ने अदालत के इस आदेश को लागू करने में आनाकानी की। सरकार ने इस फैसले पर पुनर्विचार की मांग करते हुए तर्क दिया कि इमरान खान की जांच किसी निजी अस्पताल के बजाय सरकारी अस्पताल में कराई जानी चाहिए। इसके बाद प्रशासन ने इमरान खान को जेल से तो बाहर निकाला, लेकिन उन्हें शिफा अस्पताल ले जाने के बजाय सरकारी PIMS अस्पताल (पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज) ले जाया गया। वहां कुछ ही घंटों तक उनकी प्राथमिक जांच की गई और फिर आनन-फानन में उन्हें दोबारा अदियाला जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया।
सरकार के इस रवैये पर इमरान खान के परिजनों और उनकी पार्टी ने कड़ा ऐतराज जताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के साफ आदेशों की अवहेलना की है। हालांकि, सरकारी अधिकारियों का कहना है कि सुरक्षा कारणों और नियमों के तहत ही यह कदम उठाया गया है। यदि यह मामला दोबारा सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पहुंचता है, तो शहबाज सरकार पर अदालत की अवमानना का मुकदमा चल सकता है, जिससे सरकार की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।
सहयोगी दल PPP ने बढ़ाई शहबाज सरकार की धड़कनें
शहबाज शरीफ के लिए संकट सिर्फ अदालती फैसलों तक सीमित नहीं है। उनके अपने ही घर यानी सत्ताधारी गठबंधन में भी दरारें खुलकर सामने आ गई हैं। सरकार की सबसे बड़ी बैसाखी माने जाने वाली पार्टी, PPP के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी ने सरकार को खुली चेतावनी दे दी है। बिलावल भुट्टो ने साफ लहजे में कहा है कि जब तक उनकी पार्टी की जायज शिकायतों और मांगों को पूरा नहीं किया जाता, तब तक PPP संसद के दोनों सदनों यानी सीनेट और नेशनल असेंबली में सरकार के किसी भी नए कानून या विधेयक का समर्थन नहीं करेगी।
इस आपसी तकरार की मुख्य वजह हाल ही में संपन्न हुए POK (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर) के चुनाव हैं। PPP ने इस चुनाव के नतीजों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। पार्टी का आरोप है कि चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली की गई है और इसमें सरकारी मशीनरी की मिलीभगत रही है। PPP ने इन चुनावी नतीजों को अदालत में चुनौती देने का फैसला किया है। बिलावल भुट्टो ने यहां तक कह दिया है कि मौजूदा परिस्थितियों में पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) के साथ किसी भी तरह का 'वास्तविक गठबंधन' चलाना अब मुमकिन नहीं रह गया है। इसके अलावा, नए प्रांतों के निर्माण के संवेदनशील मुद्दे पर भी बिलावल ने सरकार को नसीहत दी है कि इस पर बिना व्यापक राजनीतिक आम सहमति के कोई भी कदम न उठाया जाए।
विपक्षी दलों की लामबंदी और साझा मोर्चे की तैयारी
एक तरफ जहां सरकार अपने सहयोगियों को मनाने में नाकाम साबित हो रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष ने भी सरकार के खिलाफ अपनी घेराबंदी तेज कर दी है। जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल (JUI-F) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने बड़ा बयान देते हुए कहा है कि देश के सभी प्रमुख विपक्षी दलों ने सरकार के खिलाफ एक साझा मोर्चा बनाने पर सैद्धांतिक रूप से सहमति व्यक्त की है।
इस नए विपक्षी गठबंधन को मजबूत करने के लिए पर्दे के पीछे लगातार बैठकें चल रही हैं। इस मुहिम में नेशनल असेंबली में विपक्ष के नेता महमूद खान अचकजई और सीनेट में विपक्ष के नेता अल्लामा राजा नासिर अब्बास समेत कई बड़े नेता सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। सूत्रों के हवाले से खबर है कि संसद के भीतर सरकार को घेरने की रणनीति को अंतिम रूप देने के लिए सोमवार को विपक्षी नेताओं की एक अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक होने जा रही है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका PPP की होने वाली है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में विपक्ष संसद में शहबाज शरीफ सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की दिशा में आगे बढ़ता है, तो सत्ता की चाबी पूरी तरह से PPP के हाथों में होगी। ऐसे में बिलावल भुट्टो जरदारी का अगला कदम पाकिस्तान की राजनीति का रुख तय करेगा कि शहबाज शरीफ अपनी कुर्सी बचा पाएंगे या उनकी सरकार ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी।
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