मध्य प्रदेश के पशुपालकों के लिए बड़ी खुशखबरी: 'महाकौशली गाय' को मिला राष्ट्रीय स्तर पर अनूठा दर्जा, जानिए इस खास नस्ल की विशेषताएं

जबलपुर के वेटरनरी वैज्ञानिकों के अथक प्रयासों के बाद 'महाकौशली गाय' को देश की 57वीं और मध्य प्रदेश की पांचवीं पंजीकृत देसी नस्ल का आधिकारिक दर्जा मिल गया है। यह गाय कम खर्चे में जंगलों में चरकर अपना पेट भरने के लिए जानी जाती है।

मध्य प्रदेश के पशुधन क्षेत्र और डेयरी विकास के इतिहास में एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया है। सूबे के महाकौशल अंचल में पाई जाने वाली पारंपरिक देसी गाय 'महाकौशली' को आखिरकार राष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान मिल गई है। जबलपुर स्थित नानाजी देशमुख पशुचिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की सालों की कड़ी रिसर्च और अथक प्रयासों के बाद भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBAGR) ने महाकौशली गाय को देश की 57वीं पंजीकृत देसी गोवंश नस्ल का आधिकारिक दर्जा दे दिया है।

इस राष्ट्रीय मान्यता के बाद मध्य प्रदेश अब देश के उन प्रमुख राज्यों में शुमार हो गया है जिसके पास अपनी विशिष्ट देसी नस्लें हैं। महाकौशली गाय अब मध्य प्रदेश की पांचवीं पंजीकृत देसी गोवंश नस्ल बन चुकी है। इससे पहले राज्य में मालवी, निमाड़ी, केनकथा और गऊलाव नामक चार देसी नस्लें पहले से ही पंजीकृत थीं। इस उपलब्धि से न केवल वैज्ञानिकों का उत्साह बढ़ा है, बल्कि क्षेत्र के पशुपालकों और किसानों में भी खुशी की लहर दौड़ गई है।

वैज्ञानिकों का चार साल का अथक शोध कार्य

महाकौशली नस्ल को यह गौरवपूर्ण स्थान दिलाना इतना आसान नहीं था। इसके पीछे वैज्ञानिकों की चार वर्षों की लगातार और बेहद कठिन आनुवंशिक रिसर्च शामिल है। वेटरनरी यूनिवर्सिटी के कुलपति मनदीप शर्मा और एनिमल जेनेटिक्स एंड ब्रीडिंग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. मोहन सिंह ठाकुर के कुशल नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक विशेष टीम ने साल 2018 से लेकर 2022 तक इस पर गहन काम किया।

रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों की टीम ने मंडला, डिंडोरी, कुंडम, सिवनी और अनूपपुर-अमरकंटक जैसे सुदूर जंगली और ग्रामीण इलाकों का व्यापक दौरा किया। वहां उन्होंने प्राकृतिक परिवेश में रह रहे इस गोवंश के शारीरिक लक्षणों, आनुवंशिक गुणों और उनकी उत्पादन क्षमता का बारीकी से अध्ययन कर एक विस्तृत डेटाबेस तैयार किया। जब यह नस्ल सभी वैज्ञानिक और आनुवंशिक मानकों पर पूरी तरह खरी उतरी, तब जाकर इसे देश की आधिकारिक नस्लों की सूची में पंजीकृत किया गया।

जानिए महाकौशली गाय की अनोखी खूबियां

यह गोवंश महाकौशल के जंगलों और दुर्गम क्षेत्रों के प्राकृतिक माहौल में सदियों से पनप रहा है। डॉ. मोहन सिंह ठाकुर के अनुसार, महाकौशली गाय कोई सामान्य गाय नहीं है, बल्कि इसके भीतर विपरीत परिस्थितियों में भी खुद को ढालने की अद्भुत क्षमता होती है। इस नस्ल की प्रमुख शारीरिक और व्यावहारिक विशेषताएं इस प्रकार हैं:

  • शारीरिक बनावट: यह गाय छोटे से लेकर मध्यम आकार की होती है, जिससे यह जंगलों और पहाड़ी रास्तों पर आसानी से आवाजाही कर सकती है।
  • रंग रूप: इस नस्ल की अधिकांश गायें चमकीले सफेद रंग की होती हैं।
  • आत्मनिर्भरता: इस गाय की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पूरी तरह आत्मनिर्भर होती है। इसे पालने के लिए किसानों को महंगे शेड या विशेष बाड़े की आवश्यकता नहीं पड़ती।
  • प्राकृतिक चराई: यह गाय सुबह खुद ही वनों और चरागाहों की ओर निकल जाती है और वहां उपलब्ध घास व वनस्पतियों को चरकर अपना पेट भर लेती है।

पशुपालकों और किसानों के लिए क्यों है यह वरदान?

महाकौशली गाय को पालने का खर्च लगभग शून्य आता है, जो इसे आर्थिक रूप से कमजोर किसानों के लिए एक बेहतरीन जरिया बनाता है। इसके कई फायदे हैं जो स्थानीय कृषि व्यवस्था को मजबूत करते हैं:

  • शून्य रखरखाव लागत: इसे पालने के लिए महंगे बाजारू चारे या पोषक तत्वों को खरीदने की कोई आवश्यकता नहीं होती। यह प्राकृतिक चराई पर ही पूरी तरह स्वस्थ रहती है।
  • मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता: इस देसी नस्ल में बीमारियों से लड़ने की क्षमता बहुत अधिक होती है। इसके कारण पशुपालकों का पशु चिकित्सक और महंगी दवाइयों पर होने वाला खर्च न के बराबर हो जाता है।
  • खेती और परिवहन में उपयोग: इस नस्ल के बैल खेतों को जोतने, कृषि कार्यों और भारी बोझा ढोने में बेहद फुर्तीले और सक्षम माने जाते हैं।
  • जैविक खेती को बढ़ावा: इस गाय के गोबर और गोमूत्र का उपयोग करके किसान बेहतरीन पंचगव्य और जैविक खाद तैयार करते हैं, जिससे रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होती है।

संरक्षण और विकास की नई राहें खुलीं

मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, महाकौशल क्षेत्र के विभिन्न जिलों में इस अनूठी नस्ल की कुल आबादी लगभग 3 से 3.5 लाख के आसपास है। अब जब इस नस्ल को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल चुकी है, तो इसके संरक्षण, नस्ल सुधार और दूध उत्पादन क्षमता को और अधिक बढ़ाने की दिशा में सरकारी स्तर पर योजनाएं शुरू की जा सकेंगी। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस कदम से न केवल इस प्राचीन नस्ल को विलुप्त होने से बचाया जा सकेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर दूध और कृषि उत्पादों के जरिए पशुपालकों की आय को भी दोगुना करने में मदद मिलेगी।

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