अमेरिकी नौसेना की बदलती हकीकत: क्या सिर्फ कागजों तक सिमटकर रह गई है वॉशिंगटन की समुद्री ताकत?

अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस अब्राहम लिंकन की हालिया लंबी तैनाती ने नौसेना की तैयारियों और संसाधनों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। कागजों पर 11 कैरियर होने के बावजूद, वास्तविक सैन्य उपलब्धता में आई भारी कमी अमेरिका की वैश्विक प्रभाव क्षमता को चुनौती दे रही है।

नौसेना की तैयारियों पर उठते गंभीर सवाल

अमेरिकी नौसेना के सबसे ताकतवर हथियारों में गिने जाने वाले यूएसएस अब्राहम लिंकन की हालिया लंबी तैनाती ने वैश्विक स्तर पर अमेरिकी सैन्य तैयारियों की पोल खोलकर रख दी है। स्थिति इतनी गंभीर है कि इससे नौसेना के परिचालन तंत्र पर सवाल उठने लगे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस युद्धपोत पर तैनात जवानों को बेहद चुनौतीपूर्ण और प्रतिकूल परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर होना पड़ा। जहाज पर मौजूद नौसैनिकों ने खराब भोजन, पीने के पानी की भारी किल्लत, गंदे शावर और आवश्यक उपकरणों व रसद की कमी जैसी गंभीर शिकायतें की हैं। सबसे हैरानी की बात यह है कि लिंकन जैसा विशाल युद्धपोत समुद्र में करीब 260 दिन तक लगातार रहा, जिसमें से लगभग 240 दिन तक वह किसी भी बंदरगाह पर नहीं रुका।

इस स्थिति को लेकर 6 अगस्त 2026 को सैन डिएगो के नॉर्थ आइलैंड नेवल एयर स्टेशन पर एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई गई। इसमें नौसेना के वरिष्ठ अधिकारियों और लिंकन पर तैनात जवानों के 200 से ज्यादा परिवारों के सदस्य शामिल हुए। परिवारों का स्पष्ट आरोप था कि उनके अपनों ने जहाज पर हालात बिगड़ने की जानकारी दी थी। सवाल यह उठता है कि जिसे अमेरिकी शक्ति का प्रतीक माना जाता है, वहां के जवान इतनी दयनीय स्थिति में क्यों थे?

उपलब्धता का संकट और मिशन की मजबूरी

लिंकन को इतनी लंबी तैनाती पर मजबूर करने के पीछे की मुख्य वजह अमेरिकी नौसेना के पास ऑपरेशनल एयरक्राफ्ट कैरियर की भारी कमी है। हालांकि अमेरिकी कानून के मुताबिक नौसेना के पास 11 एयरक्राफ्ट कैरियर होने अनिवार्य हैं, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि ये सभी 11 जहाज हर समय युद्ध के लिए तैयार रहते हैं। हकीकत यह है कि इनमें से कुछ जहाज अपनी मरम्मत और मेंटेनेंस के लिए शिपयार्ड में खड़े होते हैं, कुछ के चालक दल को प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है, और कुछ तकनीकी कारणों से समुद्र में उतरने की स्थिति में नहीं होते।

परिणाम यह निकला कि अब्राहम लिंकन की जगह लेने के लिए कोई भी दूसरा युद्धपोत तैयार नहीं था। मजबूरन फारस की खाड़ी और लाल सागर में सैन्य अभियानों की निरंतरता बनाए रखने के लिए इसकी तैनाती को लंबे समय के लिए बढ़ाना पड़ा।

एक कैरियर स्ट्राइक ग्रुप का गणित

यूएसएस अब्राहम लिंकन केवल एक जहाज नहीं है, बल्कि यह एक विशाल 'कैरियर स्ट्राइक ग्रुप' का केंद्र है। इस ग्रुप में करीब 3200 नौसैनिक केवल जहाज के संचालन के लिए तैनात होते हैं, जबकि 2480 लोग लड़ाकू विमानों और अन्य एयरक्राफ्ट की देखभाल के लिए वहां मौजूद रहते हैं। यदि इसमें शामिल गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर और परमाणु पनडुब्बियों के स्टाफ को जोड़ दिया जाए, तो एक पूरे कैरियर स्ट्राइक ग्रुप में 6500 से 7500 के बीच अधिकारी और नौसैनिक होते हैं। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि मिशन के बीच में इस विशाल क्रू को बदलना व्यावहारिक रूप से असंभव होता है। जहाज जितने समय तक समुद्र में रहेगा, वही जवान उतने लंबे समय तक ड्यूटी करने के लिए बाध्य रहेंगे।

मानव संसाधन और ट्रेनिंग का गहराता संकट

अमेरिकी नौसेना के सामने सिर्फ जहाजों की कमी नहीं है, बल्कि कुशल और ट्रेंड नौसैनिकों का अभाव भी एक विकराल समस्या बन चुका है। हालिया आंकड़ों पर नजर डालें तो नौसेना में करीब 20 हजार कर्मियों की कमी दर्ज की गई है। नई भर्तियों में कमी आ रही है और दूसरी तरफ जो अनुभवी लोग पहले से सेवा में थे, वे भी तेजी से नौसेना छोड़ रहे हैं। ट्रेनिंग व्यवस्था पर भी भारी दबाव है क्योंकि प्रशिक्षित ट्रेनर्स की कमी के चलते नए जवानों को तैयार करना एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।

1991 के मुकाबले आज की स्थिति

वर्ष 1991 का गल्फ वॉर अमेरिकी नौसेना की उस समय की ताकत को समझने के लिए एक बेहतरीन पैमाना है। उस दौरान एक साथ चार अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर फारस की खाड़ी में तैनात थे। आज जबकि अमेरिका के पास 11 कैरियर मौजूद हैं, इसके बावजूद पूरी दुनिया के समुद्रों में केवल तीन कैरियर ही तैनात हैं, जिनमें यूएसएस अब्राहम लिंकन, यूएसएस जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश और यूएसएस जॉर्ज वाशिंगटन शामिल हैं।

अगस्त 2026 के मध्य तक की स्थिति देखें तो 22 अगस्त को या उसके बाद लिंकन सैन डिएगो स्थित अपने होम पोर्ट पर लौटेगा ताकि उसे मरम्मत के लिए भेजा जा सके। उसकी जगह लेने के लिए जापान से यूएसएस जॉर्ज वाशिंगटन को रवाना किया जा रहा है, जिसका मतलब यह है कि पूरे प्रशांत महासागर क्षेत्र में एक भी अमेरिकी कैरियर टास्क फोर्स नहीं बचेगी। वर्तमान में उत्तरी या दक्षिणी अटलांटिक, कैरेबियन या भूमध्य सागर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी कोई अमेरिकी कैरियर तैनात नहीं है। स्पष्ट है कि कागजों पर दिखने वाली ताकत हकीकत में काफी सीमित है।

भविष्य की चिंताएं और मरम्मत का दबाव

22 अगस्त के आसपास लिंकन के सैन डिएगो लौटने के बाद उसे लंबे समय तक मेंटेनेंस और मरम्मत प्रक्रिया से गुजरना होगा। लंबी तैनाती ने जहाज के कैटापल्ट, फ्लाइट डेक, इंजन और अन्य महत्वपूर्ण प्रणालियों पर भारी दबाव डाला है, जिसके कारण मरम्मत में कई महीने का समय लग सकता है। इस दौरान लिंकन नौसेना की सक्रिय समुद्री ताकत से बाहर रहेगा। यह पूरी स्थिति एक बड़े रणनीतिक सवाल की ओर इशारा करती है। अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है, और एयरक्राफ्ट कैरियर उसकी वैश्विक प्रतिरोध क्षमता यानी डिटरेंस का आधार हैं। लेकिन यदि 11 में से केवल 2-3 जहाज ही प्रभावी रूप से ऑपरेशनल रह सकते हैं, तो किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट या युद्ध की स्थिति में अमेरिका अपनी ताकत तैनात करने में कितना सक्षम होगा? यह प्रश्न अब नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय बन चुका है।

https://hindi.news18.com/world/america-us-now-having-only-three-aircraft-carriers-globally-military-become-significantly-weaker-10761577.html