बलूचिस्तान की जमीन के नीचे छिपा है बेशकीमती खजाना, 94 फीसदी हिस्से पर आज तक नहीं हो सकी खोज

पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट और ऊर्जा किल्लत का सामना कर रहा है, जबकि बलूचिस्तान के पास मौजूद विशाल प्राकृतिक संसाधन देश की तकदीर बदल सकते हैं। सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण इस प्रांत का 94 फीसदी हिस्सा अभी भी तेल और गैस की खोज से अछूता है।

पाकिस्तान का ऊर्जा संकट और बलूचिस्तान की अनकही कहानी

पाकिस्तान इस समय न केवल आर्थिक कंगाली के दौर से गुजर रहा है, बल्कि वहां के लोग भीषण ऊर्जा संकट का भी सामना कर रहे हैं। देश में घरेलू स्तर पर तेल और प्राकृतिक गैस का उत्पादन लगातार गिर रहा है, जिसके चलते बिजली की कमी और ईंधन की बढ़ती कीमतों ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है। हालांकि, पाकिस्तान के पास अपने इस संकट से उबरने का एक ठोस रास्ता मौजूद है, लेकिन वह रास्ता बलूचिस्तान के जटिल और अशांत इलाकों से होकर गुजरता है। यह प्रांत प्राकृतिक संसाधनों से मालामाल है, लेकिन नीतिगत विफलता और सुरक्षा चुनौतियों के कारण इसका लाभ देश को नहीं मिल पा रहा है। हालिया रिपोर्टों से खुलासा हुआ है कि बलूचिस्तान की धरती के नीचे कुदरत का ऐसा खजाना दबा है, जो पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति को रातों-रात सुधारने की क्षमता रखता है।

अनछुआ खजाना और हैरान करने वाले आंकड़े

एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान में अब तक तेल और गैस की तलाश में कुल 1,250 कुएं खोदे गए हैं। लेकिन इन आंकड़ों का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि इनमें से केवल 6 फीसदी कुएं ही बलूचिस्तान में खोदे गए हैं। इसका सीधा सा मतलब यह निकलता है कि बलूचिस्तान का लगभग 94 फीसदी हिस्सा आज भी तेल और गैस की खोज की दृष्टि से पूरी तरह से अछूता है। यह विशाल क्षेत्र उन असीम भंडारों को समेटे हुए है, जिन पर अब तक किसी की नजर नहीं पड़ी है। यदि इन क्षेत्रों में व्यवस्थित तरीके से खोज शुरू की जाए, तो पाकिस्तान की ऊर्जा निर्भरता में बड़ा बदलाव आ सकता है।

बलूचिस्तान की ऊर्जा में ऐतिहासिक हिस्सेदारी

एक ऐसा दौर भी था जब बलूचिस्तान पूरे पाकिस्तान की ऊर्जा जरूरतों की मुख्य धुरी हुआ करता था। द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के एक विश्लेषण के अनुसार, साल 1982 में पाकिस्तान की कुल प्राकृतिक गैस की मांग का 82 फीसदी हिस्सा अकेले बलूचिस्तान पूरा करता था। इस दौरान बलूचिस्तान के डेरा बुग्टी जिले में स्थित 'सुई', लोटी, पीरकोह, उच और ज़िन जैसे बड़े गैस फील्ड्स ने देश की औद्योगिक और घरेलू जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। सुई गैस फील्ड का योगदान दशकों तक पाकिस्तान के विकास की रीढ़ बना रहा, लेकिन समय के साथ-साथ इस हिस्सेदारी में लगातार गिरावट दर्ज की गई है।

  • 1982 में: बलूचिस्तान की हिस्सेदारी देश की कुल गैस आपूर्ति में 82 फीसदी थी।
  • 1995 में: यह आंकड़ा घटकर 55 फीसदी पर आ गया।
  • 2005 में: यह हिस्सेदारी और लुढ़ककर 25 फीसदी रह गई।
  • वर्तमान स्थिति: आज बलूचिस्तान पाकिस्तान की कुल गैस आपूर्ति में लगभग 20 फीसदी का योगदान दे रहा है।

सुरक्षा हालात और विकास के बीच का अंतर

सवाल यह उठता है कि इतने प्रचुर संसाधन होने के बावजूद पाकिस्तान इनका दोहन क्यों नहीं कर पा रहा है? इसके पीछे का मुख्य कारण पिछले दो दशकों से बलूचिस्तान में बिगड़े हुए सुरक्षा हालात हैं। बलोच जनता के बीच पाकिस्तान सरकार और सेना के प्रति भारी रोष है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उनकी जमीन से निकाले गए संसाधनों का इस्तेमाल पंजाब और अन्य इलाकों के विकास में किया जाता है, जबकि बलोच लोग गरीबी और बदहाली में जीवन बिताने को मजबूर हैं। इस असंतोष के चलते वहां के विद्रोही समूहों का प्रभाव बढ़ा है, जिससे तेल और गैस कंपनियों के लिए उन इलाकों में काम करना जानलेवा हो गया है।

जमीनी हकीकत बनाम दावों का सच

रिपोर्ट में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि जिन जिलों से अरबों रुपये की गैस और तेल निकाला जाता है, वहां के स्थानीय विकास और संसाधनों की कमाई में जमीन-आसमान का अंतर है। तेल कंपनियों से प्राप्त होने वाली रॉयल्टी, प्रोडक्शन बोनस और टैक्स के रूप में अरबों रुपये तो जमा होते हैं, लेकिन उनका लाभ बलोच निवासियों तक नहीं पहुंच पाता।

  • बुनियादी सुविधाओं का अभाव: डेरा बुग्टी और आसपास के क्षेत्र आज भी पाकिस्तान के सबसे पिछड़े इलाकों में शामिल हैं।
  • पानी और अस्पताल की कमी: इन क्षेत्रों में न तो अच्छे शैक्षणिक संस्थान हैं और न ही आधुनिक अस्पताल।
  • अजीब विरोधाभास: जिस 'सुई' इलाके ने पूरे पाकिस्तान को ऊर्जा दी, वहां के कई स्थानीय गांव आज भी गैस कनेक्शन जैसी बुनियादी सुविधा के लिए तरस रहे हैं।

समाधान के लिए शांति और विश्वास की जरूरत

बलूचिस्तान का यह खजाना फिलहाल सुरक्षा संबंधी दिक्कतों की भेंट चढ़ा हुआ है। अगर पाकिस्तान अपने गिरते तेल और गैस उत्पादन को फिर से पटरी पर लाना चाहता है, तो उसे केवल सैन्य कार्रवाई से आगे बढ़कर सोचना होगा। शांति केवल बंदूकों के दम पर नहीं लाई जा सकती; इसके लिए स्थानीय बलोच समुदाय के साथ संवाद और जुड़ाव जरूरी है। जब तक वहां के लोगों को उनके अपने संसाधनों पर अधिकार नहीं मिलेगा और उनके इलाकों में बुनियादी सुविधाएं, शिक्षा और रोजगार के साधन विकसित नहीं होंगे, तब तक कोई भी कंपनी वहां सुरक्षित वातावरण में काम करने का जोखिम नहीं उठा सकेगी। यदि बलूचिस्तान में शांति स्थापित हो जाती है और 94 फीसदी अनछुए हिस्से में खोज का काम शुरू होता है, तो यह पाकिस्तान के ऊर्जा संकट को खत्म करने के साथ-साथ उसे तेल और गैस आयात की भारी मजबूरी से भी राहत दिला सकता है। अन्यथा, अपनी ही नीतियों और नासमझी के कारण पाकिस्तान लगातार आर्थिक कंगाली की ओर बढ़ता रहेगा।

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