सतीश पूनिया का राजनीतिक सफर: आमेर में हार के बाद कैसे मिली बुलंदी, जानें सफलता का असली राज

राजस्थान के कद्दावर नेता सतीश पूनिया को भाजपा ने राष्ट्रीय महासचिव के पद पर नियुक्त किया है। आमेर से विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद उन्हें लगातार मिली जिम्मेदारियां उनके संगठनात्मक कौशल और हरियाणा में मिली चुनावी कामयाबी का परिणाम मानी जा रही हैं।

सतीश पूनिया की राजनीतिक बुलंदी और नया सफर

भारतीय जनता पार्टी ने अपने वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद सतीश पूनिया पर एक बार फिर भरोसा जताते हुए उन्हें बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। नीतिन नबीन की टीम में शामिल करते हुए सतीश पूनिया को राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त किया गया है। यह घटनाक्रम उनके राजनीतिक करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ है। राजस्थान भाजपा के भीतर सतीश पूनिया इकलौते ऐसे नेता हैं जिन्हें पार्टी ने एक के बाद एक तीन बड़े पद सौंपकर उन पर अटूट विश्वास जताया है। पूनिया का यह सफर केवल कुछ महीनों का नहीं, बल्कि वर्षों की कड़ी मेहनत और जमीन पर काम करने का प्रतिफल है। उन्हें पहले हरियाणा का प्रभारी नियुक्त किया गया, फिर राज्यसभा भेजा गया और अब राष्ट्रीय महासचिव के पद की जिम्मेदारी दी गई है।

सफलता का टर्निंग प्वॉइंट: हरियाणा की जीत

सतीश पूनिया के राजनीतिक ग्राफ के तेजी से ऊपर जाने के पीछे सबसे बड़ा कारण हरियाणा में उनकी भूमिका को माना जा रहा है। स्वयं सतीश पूनिया भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि हरियाणा का प्रभार मिलना उनके करियर का असली टर्निंग प्वॉइंट साबित हुआ। हरियाणा विधानसभा चुनाव में भाजपा की सफलता ने उनके संगठनात्मक कौशल पर पार्टी आलाकमान की मुहर लगा दी। उनके लिए यह दोहरी खुशी का मौका है क्योंकि बहुत कम समय अंतराल में उन्हें राज्यसभा और अब राष्ट्रीय महासचिव जैसे महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी मिली है। केवल हरियाणा ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 40 सीटों पर प्रचार की कमान संभालते हुए उन्होंने 39 सीटों पर भाजपा की जीत सुनिश्चित की थी।

संगठनात्मक कौशल और पहचान

सतीश पूनिया की पहचान एक 'सॉफ्ट जाट लीडर' के रूप में है। भाजपा के भीतर उन्हें संगठन का एक मजबूत स्तंभ माना जाता है। हालांकि उनका चुनावी रिकॉर्ड बहुत चमकदार नहीं रहा है, लेकिन संगठन को संभालने की उनकी क्षमता की पार्टी में हमेशा सराहना की गई है। सतीश पूनिया का कहना है कि उन्हें मिले ये पद किसी जातिगत समीकरणों का नतीजा नहीं, बल्कि उनके कार्य का पुरस्कार हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भाजपा जाति में विश्वास नहीं करती है। भविष्य की जिम्मेदारियों को लेकर उन्होंने कहा कि पार्टी उन्हें जिस भी राज्य में काम सौंपेगी, वे वहां अपनी पूरी निष्ठा और मेहनत के साथ काम करने के लिए तत्पर रहेंगे।

शेखावाटी की राजनीति का प्रभाव

सतीश पूनिया का संबंध राजस्थान के उस शेखावाटी अंचल से है, जिसे राजनीति का केंद्र माना जाता है। वे चूरू जिले के सादुलपुर से आते हैं। शेखावाटी का प्रभाव केवल राज्य तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि देश की शीर्ष राजनीति में भी यहां के नेताओं ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत हों या जगदीप धनखड़, केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत हों या कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शीशराम ओला, सभी का संबंध शेखावाटी की धरती से रहा है। पूनिया भी उसी राजनीतिक विरासत का एक हिस्सा बनकर उभर रहे हैं और भाजपा में जाट समाज के सबसे बड़े चेहरे के रूप में स्थापित हुए हैं।

हार के बाद नई ऊंचाइयों का सफर

विधानसभा चुनाव 2023 में आमेर विधानसभा क्षेत्र से सतीश पूनिया को हार का सामना करना पड़ा था। उस हार के बाद कई लोगों को लगा था कि शायद उनका राजनीतिक प्रभाव कम हो जाएगा, लेकिन ठीक इसके विपरीत उनके लिए सफलता का एक नया अध्याय शुरू हुआ। यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी यह नई भूमिका राजस्थान की राजनीति और जाट मतदाताओं के बीच भाजपा की पकड़ को कितना मजबूत करती है। लोकसभा चुनाव में राजस्थान में भाजपा को शेखावाटी क्षेत्र में बड़ा झटका लगा था। सीकर, चूरू और झुंझुनूं, इन तीनों लोकसभा सीटों पर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा और वहां जाट सांसद चुने गए। आने वाले समय में इन सीटों पर पार्टी का खोया हुआ प्रभाव वापस लाना सतीश पूनिया और भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। पूनिया की सक्रियता और उनका बढ़ता कद क्या भाजपा को जाट समुदाय में फिर से मजबूती दिला पाएगा, यह तो समय ही तय करेगा, लेकिन फिलहाल उनके राजनीतिक सफर ने एक नई ऊंचाई जरूर हासिल कर ली है।

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