मां के गहने बेचकर तय किया दिल्ली तक का सफर, आज डॉ. संतोष पटेल संभाल रहे हैं बड़ी जिम्मेदारी

बिहार के बेतिया से निकलकर दिल्ली की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट रजिस्ट्रार बने डॉ. संतोष पटेल की कहानी संघर्ष और सफलता की मिसाल है।

संघर्ष से सफलता का सफर

बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के बेतिया शहर के निवासी डॉ. संतोष पटेल का जीवन संघर्ष और दृढ़ इच्छाशक्ति का उदाहरण है। एक छोटे से शहर से निकलकर देश की राजधानी दिल्ली में प्रतिष्ठित सरकारी पद तक पहुंचने का उनका सफर चुनौतियों से भरा रहा है। वर्ष 1996 में जब उनका चयन स्टाफ सिलेक्शन कमीशन यानी SSC में हुआ, तब उनके पास दिल्ली जाने के लिए पर्याप्त पैसे तक नहीं थे। उस समय उनकी मां चिंता देवी ने अपने सोने के गहने बेचकर 3000 रुपये का इंतजाम किया, ताकि वे अपने सपनों को पूरा करने के लिए दिल्ली जा सकें।

सामाजिक सक्रियता और शिक्षा

डॉ. संतोष पटेल का व्यक्तित्व बहुआयामी है। उन्होंने 1990 के मंडल आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी, जिसके दौरान उन्हें लाठियां भी खानी पड़ी थीं। अपनी शिक्षा के प्रति समर्पित डॉ. पटेल ने दो बार असफलता का सामना करने के बाद हार नहीं मानी और इग्नू (IGNOU) से अपनी पीएचडी पूरी की। उनकी शैक्षणिक और प्रशासनिक उत्कृष्टता के चलते उन्हें देश के तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हाथों गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया था।

मौजूदा भूमिका और योगदान

वर्तमान में डॉ. संतोष पटेल दिल्ली कौशल एवं उद्यमिता विश्वविद्यालय यानी DSEU में परीक्षा और बिजनेस जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इसके अलावा, वे बीते 23 वर्षों से भोजपुरी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करवाने के लिए भोजपुरी जन जागरण अभियान चला रहे हैं। उनका पूरा जीवन आज के युवाओं के लिए एक बड़ी प्रेरणा का स्रोत है कि किस तरह अभावों में रहकर भी बड़े लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है।

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