पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में चुनावों का बड़ा बहिष्कार, कई बूथों पर नहीं पड़ा एक भी वोट

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान जनता का भारी आक्रोश देखने को मिला है। कई इलाकों में मतदान केंद्रों पर एक भी वोट नहीं पड़ा और सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा।

चुनाव बहिष्कार से खाली पड़े मतदान केंद्र

पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर में विधानसभा चुनावों को स्थानीय निवासियों ने सिरे से नकार दिया है। इस्लामाबाद की नीतियों और पाकिस्तानी सेना के अत्यधिक हस्तक्षेप से खफा होकर वहां की जनता ने चुनाव प्रक्रिया का पूर्ण बहिष्कार किया है। स्थिति इतनी गंभीर रही कि कई मतदान केंद्रों पर दिनभर में एक भी वोट नहीं डाला गया। हैरानी की बात यह रही कि पोलिंग स्टेशनों पर तैनात कर्मचारी और सुरक्षा बल दिनभर खाली हाथ बैठे रहे, लेकिन वहां कोई भी नागरिक वोट डालने के लिए नहीं पहुंचा।

बाग और पुंछ में दिखा विरोध का असर

विरोध प्रदर्शन की सबसे ज्यादा तस्वीरें बाग और पुंछ जैसे इलाकों से सामने आई हैं। इन क्षेत्रों में मतदान केंद्रों पर तैनात अधिकारी और चुनाव कर्मचारी पूरे समय इंतजार करते रहे, लेकिन मतदाताओं की मौजूदगी नदारद रही। रिपोर्टों के अनुसार, विशेष रूप से बाग-2, मलोट और बड़ा बारी जैसे क्षेत्रों में बनाए गए मतदान केंद्रों पर शून्य वोट दर्ज होने की खबरें हैं। स्थानीय लोग मतदान प्रक्रिया को महज एक राजनीतिक ड्रामा और दिखावा करार दे रहे हैं, जिसके कारण वे सड़कों पर भी कम निकले और सामान्य दिनों की तुलना में सन्नाटा छाया रहा।

जेएएसी ने की थी बहिष्कार की अपील

इस पूरे चुनाव बहिष्कार के पीछे ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी यानी जेएएसी का मुख्य हाथ बताया जा रहा है। इसी संगठन ने लोगों से चुनाव प्रक्रिया से दूर रहने की अपील की थी, जिसका असर बाग और पुंछ संभाग के कई हिस्सों में साफ तौर पर देखा गया। कुछ स्थानों पर प्रदर्शनकारियों ने काले झंडे लहराकर चुनाव के प्रति अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया और मतदान करने के बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रिया को खारिज कर दिया।

शून्य मतदान और जमीनी हकीकत

दावा किया गया है कि नौ मतदान केंद्रों में से तीन केंद्रों पर जीरो वोट पड़े हैं। हालांकि, हर जगह स्थिति एक समान नहीं थी और कुछ इलाकों में मतदान हुआ है, लेकिन विरोध करने वालों का स्पष्ट कहना है कि जनता ने बड़ी तादाद में खुद को इस पूरी प्रक्रिया से अलग रखा है। हालांकि, इन दावों की पुष्टि के लिए आधिकारिक तौर पर मतदान प्रतिशत के आंकड़े आने का इंतजार है, जो यह स्पष्ट करेंगे कि कितने बूथों पर वाकई सन्नाटा रहा।

इस्लामाबाद की नीतियों से बढ़ता आक्रोश

पीओके में हो रहे इस विरोध प्रदर्शन के पीछे कई गहरी वजहें छिपी हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि क्षेत्र की राजनीति और प्रशासन पर इस्लामाबाद का अत्यधिक और अनुचित नियंत्रण है, जिससे वहां की स्थानीय आवाज को दबाया जा रहा है। इसके अलावा, रिफ्यूजी सीटों को लेकर भी स्थानीय स्तर पर भारी असंतोष व्याप्त है। लोगों के बीच पाकिस्तान की सरकार के साथ-साथ वहां की सेना की गतिविधियों को लेकर भी गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है।

असंतुष्ट जनता का बढ़ता असंतोष

भारतीय सूत्रों का मानना है कि मतदान से इस प्रकार की दूरी बनाना और जगह-जगह हो रहे विरोध प्रदर्शन इस बात का संकेत हैं कि इस्लामाबाद के नियंत्रण के खिलाफ वहां की जनता का असंतोष चरम पर है। यह सिर्फ एक चुनाव का बहिष्कार नहीं, बल्कि वहां की कुव्यवस्था के खिलाफ लोगों की एक सामूहिक प्रतिक्रिया है। हालांकि, फिलहाल इन दावों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है ताकि वास्तविक स्थिति की पूर्ण जानकारी मिल सके। चुनाव के बाद आने वाले आधिकारिक परिणाम और मतदान का सटीक प्रतिशत ही यह तय करेगा कि पाकिस्तान के दावे कितने खोखले साबित हुए हैं।

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