उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से शिक्षा व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने वाला एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहां के प्रतिष्ठित प्रोफेसर राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) विश्वविद्यालय में विधि की पढ़ाई कर रहे छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ का एक गंभीर मामला उजागर हुआ है। हाल ही में घोषित हुए LLB सेमेस्टर परीक्षा के नतीजों ने न केवल छात्रों को गहरे सदमे में डाल दिया है, बल्कि विश्वविद्यालय की मूल्यांकन प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। इस परीक्षा में शामिल हुए कुल 12 हजार परीक्षार्थियों में से लगभग 3 हजार छात्रों को अनुत्तीर्ण घोषित कर दिया गया है।
इतनी बड़ी संख्या में कानून के छात्रों के अनुत्तीर्ण होने के बाद विश्वविद्यालय परिसर और इससे संबद्ध विधि कॉलेजों में भारी हड़कंप मच गया है। जब आक्रोशित छात्रों ने सच्चाई का पता लगाने के लिए सूचना के अधिकार यानी RTI कानून का सहारा लिया और अपनी उत्तर पुस्तिकाएं निकलवाईं, तो कॉपियां जांचने के अतरंगी और बेहद लापरवाह तौर-तरीके देखकर हर कोई दंग रह गया। कॉपियों में साफ तौर पर देखा जा सकता है कि पूरे उत्तर विस्तार से लिखे होने के बावजूद भी छात्रों को 0 (शून्य) अंक थमा दिए गए हैं।
RTI के खुलासे से खुली कॉपियों के मूल्यांकन की पोल
LLB चौथे सेमेस्टर की परीक्षा देने वाले एक छात्र ने जब परिणाम घोषित होने के बाद RTI के माध्यम से अपने तीसरे प्रश्नपत्र की उत्तर पुस्तिका हासिल की, तो कॉपियों की जांच में बरती गई भारी लापरवाही उजागर हो गई। छात्र ने प्रत्येक प्रश्न का उत्तर बहुत ही विस्तारपूर्वक और सटीक लिखा था। इसके बावजूद, कॉपी जांचने वाले परीक्षक ने कई पन्नों पर सीधे 0 अंक अंकित कर दिए।
इसी तरह की विसंगति चौथे सेमेस्टर के ही चौथे प्रश्नपत्र में भी खुलकर सामने आई। इस प्रश्नपत्र का मूल्यांकन भी बेहद अजीब और मनमाने तरीके से किया गया था। पीड़ित छात्र का दावा है कि उसने उत्तर पुस्तिका में सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं को पूरी तरह से और सही तरीके से लिखा था, लेकिन परीक्षक ने मुख्य उत्तरों के सामने केवल खानापूर्ति करते हुए महज 1-1 नंबर देकर औपचारिकता पूरी कर दी।
12 हजार में से 3 हजार छात्र हुए फेल, कॉपियां जांचने की रफ्तार पर सवाल
इस परीक्षा में शामिल होने वाले छात्रों के आंकड़े भी मूल्यांकन की पूरी प्रक्रिया को संदेहास्पद बनाते हैं। LLB की इस परीक्षा में करीब 12 हजार छात्र सम्मिलित हुए थे, जिनमें से केवल 9 हजार के आसपास ही परीक्षा पास करने में सफल रहे। एक साथ 3 हजार छात्रों का अनुत्तीर्ण होना कोई सामान्य घटना नहीं है।
विश्वविद्यालय से संबद्ध विधि कॉलेजों के छात्रों का कहना है कि वर्तमान सत्र की परीक्षाओं के बाद से ही छात्र अच्छे परिणामों की उम्मीद कर रहे थे। अधिकांश छात्रों ने परीक्षा की तैयारी में कड़ी मेहनत की थी, इसलिए जब नतीजे घोषित हुए तो किसी को भी अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। एक ही विषय में इतनी बड़ी संख्या में छात्रों का फेल होना अपने आप में परीक्षक की कार्यशैली पर संदेह पैदा करता है। कॉपियों को देखने से स्पष्ट होता है कि उत्तरों को बिना पढ़े ही सीधे लाल कलम चला दी गई है।
पीड़ित छात्रों और छात्र संगठनों का स्पष्ट आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने कॉपियों को जांचने की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही जल्दबाजी और आनन-फानन में पूरा कराया है। इसी जल्दबाजी का खामियाजा अब होनहार छात्रों को भुगतना पड़ रहा है, और उनका पूरा शैक्षणिक करियर दांव पर लग गया है। छात्रों का कहना है कि यह किसी एक या दो विद्यार्थियों की निजी समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरी मूल्यांकन व्यवस्था में मौजूद गंभीर खामियों की ओर इशारा करता है।
छात्रों का आक्रोश बढ़ा, पुनर्मूल्यांकन की मांग को लेकर खोला मोर्चा
कॉपियों के मूल्यांकन में हुई इस बड़ी धांधली और मनमानेपन के खुलासे के बाद से ही छात्रों का गुस्सा चरम पर है। विश्वविद्यालय परिसर और उससे संबद्ध विभिन्न लॉ कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों ने अब इस अन्याय के खिलाफ आंदोलन की राह पकड़ ली है। छात्रों की मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं:
- स्वतंत्र विशेषज्ञों से पुनर्मूल्यांकन: पीड़ित छात्रों की मांग है कि उनकी प्रभावित उत्तर पुस्तिकाओं की जांच किसी अन्य स्वतंत्र विषय विशेषज्ञ से दोबारा करवाई जाए।
- निष्पक्ष जांच की आवश्यकता: छात्रों का कहना है कि जब तक पूरे बैच के मूल्यांकन की किसी स्वतंत्र समिति से निष्पक्ष जांच नहीं कराई जाती, तब तक उनके करियर पर लगा यह सवालिया निशान नहीं हटेगा।
- दोषी परीक्षकों पर कार्रवाई: जिन परीक्षकों ने उत्तर लिखे होने के बावजूद बिना पढ़े शून्य या एक अंक दिए हैं, उनकी पहचान कर उनके खिलाफ सख्त प्रशासनिक कार्रवाई की जाए।
कठोर नियमों के बीच छात्रों के साथ अन्याय पर उठे सवाल
इस पूरे प्रकरण पर कानून के विशेषज्ञों का भी मानना है कि विधि की परीक्षाओं में उत्तर लिखने की एक विशिष्ट शैली होती है। यदि छात्रों ने सही कानूनी धाराओं और संदर्भों का उल्लेख किया है, तो उन्हें शून्य अंक देना किसी भी दृष्टिकोण से न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। विश्वविद्यालय के इस कृत्य से छात्रों के शैक्षणिक वर्ष के खराब होने का खतरा पैदा हो गया है, जिससे छात्र बेहद मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं।
आमतौर पर विश्वविद्यालय प्रशासन परीक्षाओं की शुचिता बनाए रखने, सख्ती बरतने और सामूहिक नकल जैसी गतिविधियों पर लगाम लगाने के नाम पर बहुत कड़े नियम लागू करता है। लेकिन जब बात विश्वविद्यालय के स्तर पर उत्तर पुस्तिकाओं के सही, निष्पक्ष और समय पर मूल्यांकन की आती है, तो इस तरह की घोर लापरवाही सामने आती है। मूल्यांकन में की गई यह लापरवाही अंततः उन छात्रों के साथ सरासर अन्याय साबित होती है जो साल भर मेहनत करते हैं।
वर्तमान में प्रभावित परीक्षार्थी अपनी शिकायतों और साक्ष्यों को लेकर लगातार विश्वविद्यालय प्रशासन के उच्च अधिकारियों के पास पहुंच रहे हैं। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस गंभीर विवाद पर क्या रुख अपनाता है और पीड़ित छात्रों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए क्या सुधारात्मक कदम उठाता है।
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