पंजाब में 2027 के चुनाव से पहले पंथक राजनीति का नया दौर, क्या बदल रही है राज्य की सियासत?

पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव के करीब आते ही पंथक मुद्दों और सिख कैदियों की पैरोल की मांग ने राज्य की राजनीति को फिर से गरमा दिया है। मुख्यमंत्री भगवंत मान से लेकर बीजेपी नेता रवनीत सिंह बिट्टू तक के बदलते सुर कई बड़े राजनीतिक संकेत दे रहे हैं।

पंजाब की राजनीति में वापसी करती पंथक धुरी

अमृतसर सहित पूरे पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव जैसे जैसे करीब आ रहे हैं, राज्य की सियासत में पंथक राजनीति यानी सिख धार्मिक और सामुदायिक मुद्दों का प्रभाव फिर से तेजी से बढ़ता दिख रहा है। वर्तमान में राजनीतिक गलियारों में चर्चा का सबसे मुख्य केंद्र पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के दोषी जगतार सिंह हवारा की पैरोल का मुद्दा बना हुआ है। दिलचस्प यह है कि इस संवेदनशील मामले पर विपक्षी विचारधारा रखने वाले दल भी एक सुर में बात करते नजर आ रहे हैं। राज्य के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भी स्पष्ट किया है कि वे मानवीय संवेदनाओं के आधार पर हवारा को पैरोल दिए जाने के पक्ष में हैं।

80 साल की मां का संघर्ष और मुख्यमंत्री की पहल

जगतार सिंह हवारा की 80 वर्षीय बुजुर्ग मां लंबे समय से गंभीर बीमारियों से जूझ रही हैं और उनकी एकमात्र इच्छा अपने बेटे से मिलने की है। इस मानवीय पहलू को केंद्र में रखते हुए मुख्यमंत्री भगवंत मान ने सक्रियता दिखाई है। बुधवार को चंडीगढ़ में राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया से मुलाकात कर मुख्यमंत्री ने इस पूरे मामले में हस्तक्षेप की गुहार लगाई। इससे कुछ दिन पूर्व भी उन्होंने राज्यपाल को एक औपचारिक पत्र लिखकर हवारा को कम से कम 10 दिन की पैरोल देने की पुरजोर वकालत की थी। मान के अनुसार, 31 साल के लंबे इंतजार के बाद अब मां की उम्मीदें जगी हैं। उन्होंने बताया कि उनकी मां की स्थिति काफी नाजुक और अर्धचेतन है, लेकिन जब भी उनके सामने हवारा का नाम लिया जाता है, तो वह एक सकारात्मक प्रतिक्रिया देती हैं जो उनकी भावुक स्थिति को दर्शाती है।

विरोधी दल भी आए साथ, रवनीत सिंह बिट्टू का रुख

इस पूरे मामले ने तब और अधिक ध्यान आकर्षित किया जब पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते और भारतीय जनता पार्टी के नेता रवनीत सिंह बिट्टू ने हवारा की पैरोल के समर्थन में अपनी आवाज उठाई। उन्होंने राज्यपाल द्वारा इस मामले में दिखाई गई सकारात्मकता का स्वागत करते हुए कहा कि उनके परिवार के लिए उनके दादा बेअंत सिंह का बलिदान हमेशा सर्वोच्च और श्रद्धेय रहेगा। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि एक बीमार मां के दर्द को देखते हुए करुणा और मानवता सर्वोपरि है। बिट्टू ने जोर देकर कहा कि समाज में शांति और भाईचारे के संदेश को बढ़ावा देने के लिए ऐसे मानवीय दृष्टिकोण जरूरी हैं।

हवारा का मामला और उसका राजनीतिक संदर्भ

जगतार सिंह हवारा को 31 अगस्त 1995 को चंडीगढ़ सिविल सचिवालय के बाहर हुए भीषण बम धमाके में मुख्य दोषी ठहराया गया था, जिसमें बेअंत सिंह सहित 17 लोगों की जान गई थी। प्रतिबंधित संगठन बब्बर खालसा से जुड़े रहे हवारा को उम्रकैद की सजा हुई है और वह फिलहाल दिल्ली की मंडोली जेल में बंद है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हत्या का दोषी होने के बावजूद, सिख समुदाय के कुछ तबकों में हवारा का प्रभाव आज भी कायम है। इसका प्रमाण 2015 में अमृतसर में हुई उस सभा से मिलता है, जहां उसे अकाल तख्त के समानांतर जत्थेदार के तौर पर घोषित किया गया था।

बंदी सिंहों की रिहाई की मांग का जोर

पंथक राजनीति के इस उफान का एक बड़ा आधार जेलों में बंद सिख कैदियों की रिहाई का मुद्दा है, जिसे 'बंदी सिंह' कहा जाता है। शिरोमणि अकाली दल और कौमी इंसाफ मोर्चा जैसे संगठनों ने इस आंदोलन को फिर से तेज कर दिया है। इनका तर्क है कि अनेक कैदी अपनी सजा की पूरी अवधि काटने के बाद भी जेलों में कैद हैं। इसी क्रम में, बेअंत सिंह हत्याकांड में ही सजा काट रहे बलवंत सिंह राजोआना की रिहाई का मुद्दा भी बार-बार उठाया जा रहा है। मंगलवार को शिरोमणि अकाली दल (पुनर सुरजीत) का एक प्रतिनिधिमंडल भी राज्यपाल से मिला और हवारा को मां से मिलने की अनुमति देने की मांग दोहराई।

अमृतपाल सिंह की पार्टी की सक्रियता

पंजाब की बदलती राजनीति में नए चेहरों और पार्टियों का उदय भी महत्वपूर्ण है। खडूर साहिब के सांसद अमृतपाल सिंह के नेतृत्व वाली 'वारिस पंजाब दे' पार्टी ने 2027 के चुनावों के लिए अपनी रणनीति साफ कर दी है। उन्होंने फतेहगढ़ साहिब जिले की बस्सी पठाना सीट से 61 वर्षीय सतवंत सिंह को अपना प्रत्याशी बनाया है। सतवंत सिंह, केहर सिंह के पुत्र हैं, जिन्हें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के मामले में फांसी की सजा दी गई थी। यह कदम संकेत देता है कि पंथक वोट बैंक पर पकड़ बनाने के लिए अब नए राजनीतिक संगठन भी अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं।

2027 के चुनाव और वोट बैंक का गणित

2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने उन सीटों पर भी जीत दर्ज की थी जिन्हें परंपरागत रूप से अकाली दल का पंथक गढ़ माना जाता था। इसी नुकसान से उबरने के लिए अब अलग-अलग अकाली गुट और कट्टरपंथी विचारधारा वाले संगठन सक्रिय हो गए हैं। करतारपुर कॉरिडोर, पंथक पहचान, बंदी सिंहों की रिहाई और कैदियों की पैरोल जैसे मुद्दे 2027 के चुनाव से पहले फिर से केंद्र में आ गए हैं। अब देखना यह है कि क्या यह बिखरा हुआ पंथक वोट बैंक किसी एक राजनीतिक दल के इर्द-गिर्द एकजुट हो पाएगा या यह विभिन्न गुटों के बीच विभाजित ही रहेगा।

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