कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को लेकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में आज भी कई तरह की भ्रांतियां फैली हुई हैं। कई बार लोग इसे शुरुआत में पहचान नहीं पाते हैं और जब तक इसके लक्षण खुलकर सामने आते हैं, तब तक बीमारी शरीर में काफी गहराई तक फैल चुकी होती है। ऐसे समय में इलाज बेहद जटिल हो जाता है। कुछ ऐसा ही अनोखा और चुनौतीपूर्ण मामला बिहार की राजधानी पटना से सामने आया है। यहां एक महिला की जीभ पर हुआ एक साधारण सा दिखने वाला छाला असल में कैंसर निकला। इसके बाद डॉक्टरों ने अपनी बेहतरीन चिकित्सा तकनीक का प्रदर्शन करते हुए महिला की कलाई के मांस और त्वचा का इस्तेमाल करके एक नई जीभ तैयार की।
मामूली छाला और कैंसर का सच
अक्सर लोग मुंह या जीभ पर होने वाले छालों को बहुत ही हल्के में लेते हैं और सोचते हैं कि यह पेट की गर्मी या किसी मामूली चोट की वजह से हुआ है। बिहार की रहने वाली एक 55 वर्षीय महिला ने भी ऐसा ही किया था। उनकी जीभ के बगल में एक नुकीला दांत था, जिससे उनकी जीभ पर बार-बार चोट लगती रहती थी। इसी चोट की वजह से वहां एक छोटा सा छाला बन गया था। मरीज को लगा कि यह सामान्य घाव है जो कुछ दिनों में अपने आप ठीक हो जाएगा। लेकिन जब एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी वह घाव ठीक नहीं हुआ, तो परिजनों ने उन्हें पटना के प्रसिद्ध जय प्रभा मेदांता सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल में दिखाने का फैसला किया।
अस्पताल में जब डॉक्टरों ने शुरुआती जांच की, तो उसकी रिपोर्ट ने सबको चौंका दिया। वह साधारण दिखने वाला छाला वास्तव में जीभ का कैंसर था। यह बीमारी मरीज की जीभ के आगे के करीब दो-तिहाई हिस्से तक फैल चुकी थी। कैंसर को पूरी तरह से खत्म करने के लिए डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि जीभ के उस बड़े प्रभावित हिस्से को काटकर अलग करना बेहद जरूरी हो गया था।
बिना तंबाकू सेवन के कैसे हुआ कैंसर?
आम तौर पर लोगों की धारणा होती है कि मुंह या जीभ का कैंसर केवल तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट या गुटखा खाने वालों को ही होता है। लेकिन इस मामले ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया। जय प्रभा मेदांता सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के ऑन्कोलॉजी सर्जरी विभाग के एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. संदीप कुमार ने बताया कि इस महिला मरीज ने अपने जीवन में कभी भी किसी भी रूप में तंबाकू का सेवन नहीं किया था।
डॉक्टरों के अनुसार, उनके कैंसर का मुख्य कारण उनकी जीभ के पास मौजूद एक नुकीला दांत था। वह दांत जीभ के उस हिस्से से बार-बार टकराता था, जिससे वहां लगातार चोट लगती रहती थी। इस निरंतर घर्षण और चोट के कारण वहां एक क्रॉनिक घाव यानी पुराना छाला बन गया। जब लंबे समय तक इस चोट का इलाज नहीं किया गया, तो वही घाव धीरे-धीरे कैंसर की कोशिकाओं में तब्दील हो गया। इसलिए यह समझना बहुत जरूरी है कि मुंह के अंदर किसी भी नुकीले दांत से होने वाली लगातार चोट कैंसर का कारण बन सकती है।
जटिल ऑपरेशन और नई जीभ का निर्माण
महिला की स्थिति को देखते हुए डॉक्टरों ने तय किया कि सर्जरी ही एकमात्र और सबसे सुरक्षित विकल्प है। सर्जरी से पहले डॉक्टरों की टीम ने मरीज और उनके परिवार के सदस्यों को पूरी स्थिति की गंभीरता से अवगत कराया। उन्हें समझाया गया कि जीभ का एक बड़ा हिस्सा निकाल दिए जाने के कारण शुरुआती दिनों में मरीज को बोलने, चबाने और निगलने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। परिजनों की सहमति मिलने के बाद डॉक्टरों ने सर्जरी की तैयारी शुरू की।
डॉ. संदीप कुमार के नेतृत्व में डॉक्टरों की टीम ने ऑपरेशन के दौरान जीभ के उस कैंसर ग्रस्त हिस्से को सुरक्षा मार्जिन को ध्यान में रखते हुए काटकर शरीर से अलग कर दिया। चूंकि कैंसर के गले की ग्रंथियों तक फैलने का खतरा बना हुआ था, इसलिए सुरक्षा के लिहाज से गले में मौजूद कुछ प्रभावित गांठों को भी सर्जरी के जरिए बाहर निकाल दिया गया।
इसके बाद सबसे बड़ा काम था मरीज को एक नई जीभ देना ताकि वह भविष्य में सामान्य रूप से बोल और खा सके। इसी ऑपरेशन के दौरान अस्पताल की प्लास्टिक सर्जरी टीम ने कमाल कर दिखाया। डॉक्टरों ने मरीज की खुद की कलाई से त्वचा और मांसपेशियों का एक हिस्सा लिया। इस हिस्से को बेहद सूक्ष्म और जटिल माइक्रोवैस्कुलर तकनीक की मदद से जीभ के कटे हुए हिस्से के साथ जोड़ा गया और एक नई जीभ का आकार दिया गया।
रिकवरी का शानदार सफर
इस बेहद जटिल और लंबी सर्जरी के बाद मरीज की रिकवरी की गति बहुत अच्छी रही। ऑपरेशन के बाद उन्हें विशेष देखरेख में रखा गया और महज एक सप्ताह के भीतर ही उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। डॉक्टरों की मेहनत और आधुनिक चिकित्सा तकनीक का ही असर था कि सर्जरी के लगभग एक महीने बाद महिला फिर से सामान्य तरीके से बातचीत करने लगीं और उनका खान-पान भी पहले जैसा सामान्य हो गया।
सर्जरी के बाद निकाले गए ट्यूमर और टिशू की बायोप्सी जांच कराई गई। बायोप्सी की रिपोर्ट के आधार पर डॉक्टरों की टीम ने यह तय किया कि कैंसर के दोबारा लौटने के खतरे को पूरी तरह समाप्त करने के लिए मरीज को कीमोथेरेपी और रेडिएशन थेरेपी की आवश्यकता है। मरीज ने डॉक्टरों की इस सलाह को गंभीरता से लिया और अपना पूरा इलाज कराया। उनका रेडिएशन का दौर करीब डेढ़ महीने तक चला।
कैंसर मुक्त जीवन जी रही हैं महिला
डॉ. संदीप कुमार ने बताया कि मरीज की इच्छाशक्ति और सही समय पर मिले सटीक इलाज का परिणाम आज सबके सामने है। इलाज के सभी चरणों को सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद महिला पिछले करीब दो वर्षों से पूरी तरह से कैंसर मुक्त हैं। वह अब पूरी तरह सामान्य जीवन जी रही हैं और हर तीन महीने में नियमित रूप से अस्पताल आकर अपना फॉलोअप कराती हैं, ताकि उनके स्वास्थ्य पर लगातार नजर रखी जा सके।
जीभ के छालों को लेकर डॉक्टरों की महत्वपूर्ण सलाह
इस सफल मामले को साझा करते हुए डॉ. संदीप कुमार ने आम लोगों को सचेत किया है कि मुंह के अंदर होने वाले किसी भी छाले को लंबे समय तक बिना इलाज के नहीं छोड़ना चाहिए। उन्होंने कुछ ऐसे प्रमुख लक्षणों के बारे में बताया है जिन पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है:
- अगर कोई छाला या घाव दो से तीन सप्ताह के भीतर अपने आप ठीक नहीं हो रहा हो।
- यदि मुंह या जीभ के घाव से लगातार या बार-बार खून आ रहा हो।
- मुंह के प्रभावित हिस्से में लगातार तेज या धीमा दर्द बना रहता हो।
- घाव या छाले के आकार और रंग में लगातार बदलाव दिखाई दे रहा हो।
- मुंह खोलने, खाना चबाने या जीभ हिलाने में अचानक तकलीफ महसूस होने लगी हो।
डॉक्टरों का कहना है कि कैंसर के इलाज में समय की बहुत बड़ी भूमिका होती है। यदि शुरुआती स्टेज में ही बीमारी की पहचान कर ली जाए, तो मरीज को पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है। इसके साथ ही केवल सर्जरी कराना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि सर्जरी के बाद डॉक्टर की सलाह के अनुसार कीमोथेरेपी, रेडिएशन और नियमित अंतराल पर फॉलोअप जांच कराना बेहद जरूरी है ताकि बीमारी के दोबारा पनपने की हर आशंका को पूरी तरह समाप्त किया जा सके।
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