राजनीति का नया केंद्र: Gen Z
उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनावों के माहौल के बीच राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी के भाषणों में आया हालिया बदलाव कोई इत्तेफाक नहीं है। उनके हावभाव और भाषा में आई तब्दीली एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। वे लगातार सरकार पर हमलावर हैं और 'बैलून फटने' या 'चौकीदार चोर' जैसे जुमलों के जरिए जनता के बीच अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। चर्चा में यह अहम सवाल उठाया गया कि क्या युवा मतदाताओं को लुभाने के चक्कर में विपक्षी दल अन्य बड़े मतदाता वर्गों से तो दूर नहीं हो रहे हैं।
Gen Z का चुनावी गणित
देश की कुल आबादी में 18 से 29 वर्ष की उम्र वाले युवाओं का हिस्सा करीब 25 प्रतिशत है। हालांकि, विशेषज्ञों का यह भी तर्क है कि केवल इस वर्ग की नाराजगी किसी चुनाव का पासा पलटने के लिए काफी नहीं है, क्योंकि बाकी 75 प्रतिशत मतदाता भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। युवाओं की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वे खुद तो अपनी राजनीतिक पसंद बदल ही सकते हैं, साथ ही वे अपने माता-पिता और अन्य परिजनों के मतदान के रुख को प्रभावित करने की क्षमता भी रखते हैं।
तमिलनाडु से क्या सीखा जा सकता है
इस संदर्भ में तमिलनाडु के चुनावों को एक उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है। वहां Instagram जैसे प्लेटफॉर्म ने चुनावी विमर्श को पूरी तरह बदल दिया था। युवाओं ने सोशल मीडिया पर बने नैरेटिव के जरिए अपने घर के बुजुर्गों को भी मतदान के प्रति प्रभावित किया। जंतर-मंतर पर होने वाले युवा प्रदर्शन और डिजिटल माध्यमों पर बन रहे एजेंडे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसी दिशा में अब संघ परिवार और सरकार भी युवाओं तक अपनी पहुंच मजबूत करने के लिए नए तरीके अपना रहे हैं।
योगी आदित्यनाथ का ध्रुवीकरण वाला दांव
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी पुरानी और सफल रणनीति पर ही टिके दिखते हैं। उनका 'बटोगे तो कटोगे' का नारा उसी ध्रुवीकरण की राजनीति का विस्तार है, जिसने उन्हें 2017 और 2022 में चुनावी विजय दिलाई थी। विश्लेषकों के अनुसार, अपनी इस स्थापित पिच को छोड़ना उनके लिए नुकसानदेह हो सकता है। कांवड़ यात्रा में युवाओं की भारी संख्या इस बात का सबूत है कि युवा वर्ग केवल शहरी सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है।
युवाओं को एक जैसा वोट बैंक मानना राजनीतिक भूल होगी। जाति, धर्म, गांव-शहर का अंतर, शिक्षा का स्तर और आर्थिक परिस्थितियां उनके फैसलों को प्रभावित करती हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों में उत्तर प्रदेश के भीतर बीजेपी के वोट प्रतिशत में 2019 की तुलना में जो कमी दिखी, उस पर भी गहन बहस जारी है।
रोजगार का सवाल और भविष्य की चुनौती
युवाओं के लिए रोजगार और बेरोजगारी सबसे बड़ा मुद्दा है। हालांकि, यह बात सामने आई है कि राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर जो बयान दिए, उनमें किसी ठोस रोजगार मॉडल या समाधान का अभाव दिखा। साथ ही, यह जिम्मेदारी सरकार की भी है कि वह अपनी आर्थिक नीतियों, रोजगार के अवसरों और उपलब्धियों को युवाओं के बीच प्रभावी ढंग से रखे।
यूपी चुनाव: क्या होंगे मुख्य मुद्दे
आगामी यूपी चुनाव में स्थानीय विधायकों के खिलाफ नाराजगी और प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे सत्ता विरोधी लहर का कारण बन सकते हैं। जहां विपक्ष का पूरा जोर जातीय समीकरणों को अपने पक्ष में करने पर होगा, वहीं सत्ताधारी दल हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के जरिए मुकाबले को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश करेगा। इसके अलावा राम मंदिर का मुद्दा, विभिन्न परीक्षाओं के पेपर लीक होने की घटनाएं और भ्रष्टाचार चुनावी चर्चाओं में छाए रहेंगे।
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