राहुल गांधी ने जिस मुलाकात का किया जिक्र, उसमें इंदिरा गांधी को मिला था अमेरिका से धोखा

राहुल गांधी ने हाल ही में इंदिरा गांधी और रोनाल्ड रीगन की 1982 की मुलाकात का किस्सा साझा किया है, जिसने भारत-अमेरिका संबंधों के इतिहास को समझने का एक नया नजरिया दिया है। हालांकि यह यात्रा रिश्तों में सुधार का प्रयास थी, लेकिन इसके बाद भी भारत को कई बार अमेरिका की दोहरी नीति का सामना करना पड़ा था।

अमेरिका के साथ रिश्तों की कड़वाहट और इंदिरा गांधी का प्रयास

राहुल गांधी ने हाल ही में अपनी दादी और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ व्हाइट हाउस की एक पुरानी यात्रा का भावनात्मक किस्सा साझा किया। यह घटना साल 1982 की है, जब इंदिरा गांधी अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन से मिलने पहुंची थीं। यह वह दौर था जब भारत और अमेरिका के बीच कूटनीतिक संबंध काफी तनावपूर्ण थे। इंदिरा गांधी का यह प्रयास दोनों देशों के बीच जमी बर्फ को पिघलाने के लिए था, लेकिन इस मुलाकात के बावजूद कड़वाहट पूरी तरह से खत्म नहीं हो सकी। रीगन और इंदिरा गांधी के बीच बातचीत के दौरान कई सकारात्मक वादे किए गए, लेकिन अमेरिका की पुरानी आदत के अनुरूप, भारत को भविष्य में फिर से निराशा ही हाथ लगी। इंदिरा गांधी स्वयं उस समय अमेरिकी प्रशासन के भारत विरोधी रुख से काफी हताश और परेशान थीं।

वॉशिंगटन की ओर बढ़ा कदम

1970 के दशक में भारत और अमेरिका के बीच के संबंध बेहद ठंडे थे। दोनों लोकतांत्रिक देश होने के बावजूद एक दूसरे पर भरोसा नहीं कर पा रहे थे। साल 1982 में इंदिरा गांधी ने ठान लिया था कि अमेरिका के साथ रिश्तों को फिर से पटरी पर लाया जाए। वह अपने पोते राहुल गांधी के साथ व्हाइट हाउस पहुंचीं। यह केवल एक औपचारिक दौरा नहीं था, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। जुलाई 1982 में जब इंदिरा गांधी वॉशिंगटन पहुंचीं, तो रोनाल्ड रीगन और उनकी पत्नी नैन्सी रीगन ने उनका भव्य स्वागत किया। उस समय रोनाल्ड रीगन एक कट्टर दक्षिणपंथी नेता के रूप में जाने जाते थे और सोवियत संघ के धुर विरोधी थे। दूसरी ओर, इंदिरा गांधी को सोवियत संघ का करीबी माना जाता था। इसके बावजूद, दोनों नेता व्यावहारिक राजनीति को बखूबी समझते थे।

भारत और अमेरिका के बीच विवाद के मुख्य कारण

1982 के उस दौरे से पहले भारत और अमेरिका के बीच अविश्वास की खाई बहुत गहरी हो चुकी थी, जिसके पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण जिम्मेदार थे। पहला कारण शीत युद्ध की गुटबाजी थी। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की दुनिया दो गुटों में बंटी थी, लेकिन भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन के माध्यम से अपनी अलग पहचान बनाई थी। अमेरिका को यह लगता था कि भारत तटस्थ होने का नाटक कर रहा है और वास्तव में वह सोवियत संघ का समर्थक है।

दूसरा बड़ा कारण 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध था। उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और हेनरी किसिंजर ने खुले तौर पर पाकिस्तान का साथ दिया था। जब भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को परास्त किया, तो अमेरिका ने भारत पर दबाव बनाने के लिए अपने 7वें नौसैनिक बेड़े को बंगाल की खाड़ी में तैनात कर दिया था। इस घटना ने भारत के मन में अमेरिका के प्रति कभी न मिटने वाला अविश्वास पैदा कर दिया। तीसरा कारण 1974 का पोखरण परमाणु परीक्षण था। भारत द्वारा किए गए शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिका ने भारत पर कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे और तारापुर न्यूक्लियर पावर प्लांट के लिए जरूरी यूरेनियम की आपूर्ति भी रोक दी थी।

1982 की बैठक के बाद क्या बदलाव आए

इंदिरा गांधी और रोनाल्ड रीगन की उस मुलाकात ने कूटनीतिक स्तर पर कुछ बदलाव तो जरूर किए। सबसे पहले तारापुर परमाणु संयंत्र के लिए यूरेनियम की समस्या का हल निकाला गया। यह तय हुआ कि अमेरिका प्रत्यक्ष रूप से यूरेनियम नहीं देगा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा नियमों के दायरे में रहते हुए फ्रांस के माध्यम से इसकी आपूर्ति जारी रखी जाएगी। इसने उस समय के बड़े ऊर्जा संकट को टाल दिया।

इसके बाद दोनों देशों के बीच साइंस एंड टेक्नोलॉजी इनिशिएटिव की शुरुआत हुई। अमेरिका ने भारत को CRAY सुपरकंप्यूटर जैसे उन्नत उपकरण देने पर सहमति जताई। इसके साथ ही ISRO और DRDO जैसे संस्थानों के लिए अमेरिकी तकनीक के दरवाजे धीरे-धीरे खुलने लगे। आर्थिक मोर्चे पर भी कुछ पहल हुई, जिससे व्यापारिक समुदाय की रुचि भारत में जगी। इसी नींव के कारण आगे चलकर राजीव गांधी की अमेरिका यात्रा और 1991 के आर्थिक सुधारों का मार्ग प्रशस्त हुआ। साथ ही, भारतीय छात्रों और वैज्ञानिकों के लिए वीजा नियमों में थोड़ी ढील दी गई, जिससे आईटी प्रोफेशनल्स के लिए अमेरिका जाने के रास्ते खुले।

पर्दे के पीछे की कड़वी सच्चाई

भले ही यह दौरा एक टर्निंग पॉइंट रहा, लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं था कि सब कुछ ठीक हो गया था। इंदिरा गांधी के निजी रिकॉर्ड्स और सरकारी नोट्स से पता चलता है कि वह अमेरिकी प्रशासन के दोहरे रवैये से बेहद दुखी थीं। 28 मार्च 1983 के एक नोट में उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा था कि अमेरिका हर क्षेत्र में भारत विरोधी रुख अपना रहा है। उन्होंने यह भी लिखा कि राजनीतिक जोखिम उठाकर भी दोस्ती बढ़ाने का क्या फायदा, जब अमेरिका खालिस्तानी समर्थकों को संरक्षण दे रहा है। जगजीत सिंह चौहान को वीजा देना इंदिरा गांधी के लिए एक बड़ा झटका था। वह मानती थीं कि रोनाल्ड रीगन व्यक्तिगत रूप से मिलनसार हो सकते हैं, लेकिन उनकी नीतियां भारत के स्वाभिमान के खिलाफ थीं।

कूटनीतिक सबक और भारत का भविष्य

राहुल गांधी द्वारा याद किया गया वह किस्सा कूटनीति का एक बड़ा सबक है। 1982 के उस दौरे ने अविश्वास की दीवार में पहली दरार तो डाली, लेकिन अंततः भारत को अमेरिका से धोखा ही मिला। आज भारत उसी इतिहास से सबक लेते हुए किसी भी देश की शर्तों पर झुकने के बजाय, अपने राष्ट्रीय हितों को सबसे ऊपर रखता है। अमेरिका के साथ पुराने अनुभवों को ध्यान में रखते हुए, आज की भारतीय विदेश नीति अधिक सतर्क और आत्मनिर्भर है।

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