जब कंगाली की कगार पर पहुंचा सुनील दत्त का परिवार: नरगिस को सिलने पड़े बच्चों के फटे मोजे, गुल्लक के सिक्कों से चला महीने भर का राशन

एक फिल्म की जिद ने सुनील दत्त को बांद्रा का बंगला गिरवी रखने और गाड़ियां बेचने तक पहुंचा दिया था, और हालत यह हुई कि नरगिस को बच्चों के फटे कपड़े सिलने पड़े और एक बार तो गुल्लक के सिक्के गिनकर महीने का खर्च निकालना पड़ा।

हिंदी सिनेमा के जिन कलाकारों को आज भी पूरे आदर के साथ याद किया जाता है, उनमें दिग्गज अभिनेता, निर्माता और निर्देशक सुनील दत्त का नाम बेहद ऊंचा है। उन्होंने बॉक्स ऑफिस की कामयाबी और नाकामी दोनों को बहुत करीब से देखा और जिया। मगर एक फिल्म ऐसी भी रही, जिसके चलते उन्हें अपना बांद्रा वाला बंगला गिरवी रखना पड़ा, अपनी कारें बेचनी पड़ीं और वे लगभग दिवालिया होने की हालत में आ गए।

एक नायाब कलाकार और निर्माता का सफर

भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसे कलाकार गिने-चुने ही हुए हैं, जिन्हें दुनिया उसी अदब और सम्मान से याद रखती है जो उनके दौर में उन्हें मिला करता था। सुनील दत्त इसी तरह के दुर्लभ हीरे थे। उन्होंने साल 1955 में अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की और जब सिनेमा की 'मदर इंडिया' यानी नरगिस से उनकी शादी हुई, तो घर-गृहस्थी की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई।

साल 1963 में फिल्म 'ये रास्ते हैं प्यार के' के साथ उन्होंने निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा। लेकिन वे ऐसे दरियादिल और भावुक निर्माता थे, जो खर्च का हिसाब-किताब रखने में कमजोर साबित होते थे। उनका यही जुनून साल 1971 में आई एक फिल्म के निर्माण के दौरान उन पर इतना भारी पड़ा कि वे पूरी तरह कंगाल हो गए।

'रेशमा और शेरा' की वह कहानी

यह बात आइकॉनिक फिल्म 'रेशमा और शेरा' की है, जिसने सुनील दत्त को अपना आलीशान बांद्रा वाला बंगला तक गिरवी रखने पर मजबूर कर दिया। इस मल्टी-स्टारर फिल्म में सुनील दत्त के साथ वहीदा रहमान, राखी और अमिताभ बच्चन प्रमुख भूमिकाओं में थे। इसमें अमिताभ बच्चन ने सुनील दत्त के गूंगे भाई का किरदार निभाया था, और इसके पीछे की वजह बेहद दिलचस्प है।

अमिताभ की कास्टिंग के पीछे का किस्सा

रिपोर्ट्स के अनुसार, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और नरगिस के बीच बहुत गहरी दोस्ती थी। इंदिरा गांधी की मां और अमिताभ की मां तेजी बच्चन भी इलाहाबाद के दिनों से एक-दूसरे के बेहद करीब रही थीं। इंदिरा गांधी की सिफारिश पर नरगिस ने सुनील दत्त से अमिताभ को फिल्म में लेने की बात कही।

लेकिन दत्त साहब को अमिताभ की आवाज बिल्कुल पसंद नहीं थी। यही कारण रहा कि उन्होंने अमिताभ को एक ऐसे किरदार में कास्ट किया, जो बोल ही नहीं सकता था।

15 दिन का शेड्यूल खिंचकर दो महीने पार

सुनील दत्त ने इस फिल्म को महज 15 दिनों में पूरा करने की योजना बनाई थी। करीब 100 लोगों के क्रू के साथ वे जैसलमेर से 80 मील दूर 'पोचिना' नाम के एक छोटे से गांव में तंबू गाड़कर रहने लगे। मगर परफेक्ट शॉट की तलाश में 15 दिन का शेड्यूल दो महीने से भी ज्यादा खिंच गया, जिसने फिल्म का बजट आसमान तक पहुंचा दिया।

काम में परफेक्शन को लेकर वे इस कदर अड़ियल थे कि इसकी कीमत उनके परिवार को चुकानी पड़ी। उनकी बेटी नम्रता दत्त ने अपनी किताब 'मिस्टर एंड मिसेज दत्त: मेमोरीज ऑफ अवर पेरेंट्स' में लिखा है—

एक सीन के लिए पापा को पूरे 100 ऊंट चाहिए थे, लेकिन सेट पर सिर्फ 99 ऊंट ही आ पाए। पापा इतने अड़ गए कि उन्होंने शूटिंग करने से साफ मना कर दिया।

अवॉर्ड मिले, पर आर्थिक तबाही नहीं रुकी

फिल्म जब पर्दे पर आई तो बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह नाकाम रही। हालांकि 'रेशमा और शेरा' ने 3 नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीते और यह ऑस्कर के लिए भारत की आधिकारिक प्रविष्टि भी बनी, लेकिन यह कामयाबी सुनील दत्त को आर्थिक तबाही से नहीं बचा सकी।

किश्वर देसाई की किताब 'डार्लिंगजी' के मुताबिक, सुनील दत्त दिवालिया होने की ऐसी कगार पर आ गए थे कि उन्हें अपनी कई गाड़ियां बेचनी पड़ीं। कर्ज चुकाने के लिए उन्होंने ताबड़तोड़ फिल्में साइन करनी शुरू कर दीं, जिनमें 'हीरा', 'प्राण जाए पर वचन न जाए' और 'गीता मेरा नाम' जैसी फिल्में शामिल थीं।

दफ्तर के कर्मचारियों से छंटनी की नौबत

दत्त परिवार के लिए वह दौर किसी बुरे सपने से कम नहीं था। हालात इतने खराब हो चुके थे कि सुनील दत्त ने अपने प्रोडक्शन ऑफिस के कर्मचारियों को बुलाकर कहा कि परिस्थितियां बेहद मुश्किल हैं और अकाउंटेंट को छोड़कर वे बाकी सभी को नौकरी से हटा रहे हैं। हालांकि उनके वफादार कर्मचारी मुफ्त में काम करने के लिए तैयार हो गए।

फटे मोजे और गुल्लक के सिक्के

नम्रता ने अपनी किताब में उन काले दिनों को याद करते हुए लिखा—

पापा अक्सर मां को हमारे स्कूल के फटे मोजे और यूनिफॉर्म सिलते हुए देखते थे, क्योंकि हमारे पास नए कपड़े खरीदने के पैसे नहीं थे। लेकिन मां ने कभी कोई शिकायत नहीं की। एक दिन जब घर में खाने तक के पैसे नहीं बचे, तो मां ने सिक्कों से भरा अपना एक लंबा गुल्लक का डिब्बा पलटा और बिस्तर पर सिक्के गिनने लगीं। कई घंटों की मशक्कत के बाद इतने पैसे निकल आए कि हमारा अगले 30 दिनों का राशन आ सके।

विनोद खन्ना ने थामा हाथ

जब दत्त परिवार इस भयंकर आर्थिक मंदी से जूझ रहा था, तब अभिनेता विनोद खन्ना को इसकी भनक लगी। गौरतलब है कि विनोद खन्ना को सुनील दत्त ने ही अपनी 1969 की फिल्म 'मन का मीत' से पहला ब्रेक दिया था। विनोद खन्ना ने सुनील दत्त की मदद की और उन्हें दोबारा फिल्में शुरू करने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद अभिनय और नए प्रोजेक्ट्स के सहारे धीरे-धीरे सुनील दत्त इस संकट से बाहर निकलने में कामयाब रहे।

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